Section 377: सबूतों के अभाव में अप्राकृतिक यौन शोषण के आरोपी पति को बेंगलुरु कोर्ट ने किया बरी; उठाए जांच पर सवाल
बेंगलुरु की एक मजिस्ट्रेट अदालत (Magistrate Court) ने वैवाहिक विवाद और अप्राकृतिक यौन शोषण (Unnatural Sex) के एक गंभीर मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
पति आईआईटी बंबई में रिसर्च स्कॉलर है
अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट गिरीश चटनी (ACJM Girish Chatni) ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आपराधिक कानून में किसी भी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए ‘संदेह से परे सबूतों’ (Proof Beyond Reasonable Doubt) की आवश्यकता होती है, जिसका इस मामले में पूरी तरह अभाव था। कोर्ट ने आईआईटी मुंबई (IIT Mumbai) के एक रिसर्च स्कॉलर (पति) को अपनी अलग रह रही पत्नी द्वारा लगाए गए क्रूरता और जबरन अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने के सभी आरोपों से बरी (Acquit) कर दिया है।
साल 2015 में विवाह के बंधन में बंधे थे जोड़े
यह मामला साल 2015 में विवाह के बंधन में बंधे एक जोड़े से जुड़ा है, जो शादी से पहले आईआईटी मुंबई में शोधार्थी (Research Scholars) थे। पत्नी ने 2017 में शिकायत दर्ज कराई थी कि उसके पति ने उसके साथ गाली-गलौज की और शादी के बाद जबरन अप्राकृतिक संबंध बनाए। साथ ही, बिना सहमति के उसकी निजी तस्वीरें फेसबुक और व्हाट्सएप पर उसके पिता और दोस्तों को भेजने का भी आरोप था। अदालत ने मामले की गहन समीक्षा करने के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) का मामला कानूनी रूप से बेहद कमजोर था। कोर्ट ने बरी करने के पीछे निम्नलिखित मुख्य कारण गिनाए:
कड़े कानूनी मानक (Strict Ingredients of Section 377)
मजिस्ट्रेट कोर्ट ने रेखांकित किया कि वयस्कों (Adults) के मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 के तहत किसी को दोषी ठहराने के लिए अभियोजन पक्ष को दो बातें अनिवार्य रूप से साबित करनी होती हैं। इसमें शारीरिक अंतर्प्रवेश (Penetration) हुआ था और दूसरा यह कृत्य पूरी तरह से गैर-सहमति (Non-consensual) से किया गया था। न्यायाधीश ने कहा, “इनमें से प्रत्येक घटक अनिवार्य है। किसी एक भी घटक को साबित करने में विफलता आरोप को खारिज करने के लिए पर्याप्त है।” इस मामले में कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष न तो अंतर्प्रवेश साबित कर सका और न ही सहमति का अभाव।
बयानों में विरोधाभास और मेडिकल साक्ष्यों की कमी
- बयानों में बदलाव: कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता महिला द्वारा पुलिस को दिए गए शुरुआती बयानों और अदालत में दी गई गवाही (Oral Testimony) में गंभीर विसंगतियां और बदलाव थे। ये बदलाव सतही नहीं, बल्कि घटना के क्रम और तरीके से जुड़े थे।
- कोई समकालीन चिकित्सा रिकॉर्ड नहीं: महिला ने दावा किया कि उसे इस कृत्य से काफी दर्द हुआ था, लेकिन 2015 के कथित घटनाक्रम के दौरान का कोई अस्पताल का पर्चा, क्लिनिकल जांच या इलाज का रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया। 2017 में हुए मेडिकल टेस्ट में भी डॉक्टरों ने अप्राकृतिक सेक्स को लेकर कोई ‘निश्चित राय’ (Definite Opinion) नहीं दी थी।
- फॉरेंसिक साक्ष्यों का शून्य होना: जांच के दौरान पुलिस ने आईआईटी बॉम्बे के सीसीटीवी फुटेज, कोई जैविक नमूने (Biological Samples), कपड़े या बेडशीट आदि जैसी किसी भी चीज को फॉरेंसिक लैब (FSL) जांच के लिए नहीं भेजा था।
शिकायत दर्ज करने में 3 साल की देरी (Delay in Reporting)
- अदालत ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि कथित घटनाओं के तीन साल बाद शून्य एफआईआर (Zero FIR) दर्ज कराई गई थी।
- दोनों के साथ रहने के दौरान या 2016 में अलग होने के तुरंत बाद कोई शिकायत नहीं की गई थी।
- एफआईआर मार्च 2017 में तब दर्ज कराई गई, जब फरवरी 2017 में पति की तरफ से दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना (Restitution of Conjugal Rights) के तहत नोटिस मिला।
- कोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में “इतनी लंबी देरी केवल एक सामान्य बात नहीं रह जाती, बल्कि यह यह आंकने का एक प्रासंगिक कारक बन जाती है कि कहानी कहीं बढ़ा-चढ़ाकर या मनगढ़ंत तो नहीं बनाई गई है।”
‘बेडरूम की निजता’ के नाम पर सबूत का बोझ नहीं बदला जा सकता
पुलिस जांच की कमियों को उजागर करते हुए कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी ने महिला के पड़ोसियों के बयान तक दर्ज नहीं किए। कोर्ट ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, “यह मान लेना कि कथित कृत्य वैवाहिक बेडरूम की निजता में हुआ था, इस आधार पर बुनियादी तथ्यों की अनिवार्यता को बदला नहीं जा सकता। सेटिंग की निजता (Privacy of Setting) का उपयोग सबूत के बोझ को उलटने (Reverse the Burden of Proof) के लिए नहीं किया जा सकता।” यानी बेडरूम का मामला होने मात्र से पति को खुद को बेकसूर साबित करने का बोझ नहीं दिया जा सकता; दोष साबित करने की जिम्मेदारी हमेशा अभियोजन की ही रहेगी। इसके अतिरिक्त, अदालत ने धारा 498ए (क्रूरता) और धारा 201 (सबूत मिटाने) के आरोपों को भी खारिज कर दिया, क्योंकि पुलिस यह साबित करने में नाकाम रही कि इंटरनेट से डिलीट हुई तस्वीरें वास्तव में किस रूप में और कब मौजूद थीं।
मामले का सारांश (Quick Highlights)
| मुख्य कानूनी बिंदु | बेंगलुरु मजिस्ट्रेट अदालत का निर्णय |
| माननीय न्यायाधीश | एडिशनल चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट गिरीश चटनी |
| आरोपी की पृष्ठभूमि | आईआईटी मुंबई के रिसर्च स्कॉलर (पति) |
| लगाए गए आरोप | आईपीसी धारा 498A (क्रूरता), 377 (अप्राकृतिक यौन संबंध), 201 और आईटी एक्ट। |
| फैसले का मुख्य आधार | बयानों में भारी विरोधाभास, 3 साल की देरी, फॉरेंसिक व पुख्ता मेडिकल रिपोर्ट का अभाव। |
| अंतिम आदेश | संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) देते हुए आरोपी पति को सभी आरोपों से ससम्मान बरी किया गया। |
निष्पक्ष जांच का महत्व
यह फैसला रेखांकित करता है कि वैवाहिक विवादों में लगाए गए आरोपों की गंभीरता चाहे कितनी भी अधिक हो, अदालतें बिना किसी ठोस वैज्ञानिक, फॉरेंसिक या समकालीन मेडिकल साक्ष्यों के केवल एकतरफा बयानों के आधार पर सजा नहीं सुना सकतीं। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि पुलिस की सुस्त और त्रुटिपूर्ण जांच का नुकसान आरोपी को नहीं भुगतना चाहिए, बल्कि उसका लाभ (Benefit of Doubt) आरोपी को ही मिलना चाहिए।

