Tenancy Act: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट बार एसोसिएशन और डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन (चंडीगढ़) ने संयुक्त रूप से एक बड़ा कानूनी कदम उठाया है।
6 मई 2026 को जारी अधिसूचना से आपत्ति
दोनों बार एसोसिएशनों ने केंद्र सरकार की 6 मई 2026 की उस अधिसूचना (Notification) को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में चुनौती दी है, जिसके तहत ‘असम किरायेदारी अधिनियम, 2021’ (Assam Tenancy Act, 2021) को केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ पर लागू कर दिया गया है। यह याचिका मुख्य न्यायाधीश शील नागू और जस्टिस संजीव बेरी की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आई थी, जिन्होंने इसे रोस्टर के अनुसार उपयुक्त खंडपीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है। केंद्र सरकार ने इस अधिसूचना के जरिए चंडीगढ़ में 4 नवंबर 1972 से लागू पुराने किरायेदारी कानून ‘इस्ट पंजाब अर्बन रेंट रेस्ट्रिक्शन एक्ट, 1949’ को पूरी तरह निरस्त (Repeal) कर दिया है। बार एसोसिएशनों ने इस फैसले को असंवैधानिक बताते हुए इसके खिलाफ कई मजबूत कानूनी तर्क पेश किए हैं।
क्या केंद्र सरकार के पास कानून रद्द करने की शक्ति है? (Jurisdictional Issue)
- धारा 87 का दुरुपयोग: याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता चेतन मित्तल ने दलील दी कि केंद्र सरकार ने ‘पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966’ की धारा 87 का हवाला देकर यह कदम उठाया है। यह धारा केंद्र को पंजाब में लागू किसी भी कानून को चंडीगढ़ में विस्तारित करने की शक्ति देती है।
- निरस्त करने का अधिकार नहीं: वकीलों का तर्क है कि यह धारा केंद्र सरकार को चंडीगढ़ में पहले से लागू किसी कानून को संशोधित करने, नया कानून बनाने या पुराने कानून को निरस्त करने का अधिकार नहीं देती। इस संबंध में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘दिल्ली लॉ एक्ट (1912)’ और ‘रमेश बिरिच बनाम भारत संघ’ मामलों के संविधान पीठ के फैसलों का हवाला दिया है।
कार्यपालिका बनाम न्यायपालिका: शक्तियों के पृथक्करण पर चोट (Separation of Powers)
- अधिवक्ताओं ने नए कानून के तहत विवादों का निपटारा करने वाली अथॉरिटी (अधिकारियों) के चयन पर सबसे गंभीर आपत्ति जताई है।
- प्रशासनिक अधिकारियों को न्यायिक शक्ति: ‘असम किरायेदारी अधिनियम’ के तहत तहसीलदार को ‘रेंट अथॉरिटी’ (धारा 30) और अतिरिक्त उपायुक्त (ADC) को ‘अपॉलेट अथॉरिटी/रेंट कोर्ट’ (धारा 33) नामित किया गया है।
- पहले क्या व्यवस्था थी?: पुराने कानून के तहत किरायेदारी के विवादों का फैसला न्यायिक पृष्ठभूमि के अधिकारियों द्वारा किया जाता था, जिसमें ‘सब जज प्रथम श्रेणी’ रेंट कंट्रोलर के रूप में और ‘जिला जज’ अपीलीय प्राधिकारी के रूप में कार्य करते थे।
- संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन: याचिका में कहा गया है कि स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों के अनुसार, न्यायिक कार्य केवल न्यायिक दिमाग वाले जजों द्वारा ही किए जाने चाहिए। इन शक्तियों को प्रशासनिक/कार्यकारी अधिकारियों (Executive Officers) को नहीं सौंपा जा सकता, खासकर तब जब इस अधिनियम की कार्यवाही को खुद “न्यायिक कार्यवाही” परिभाषित किया गया है।
असम कानून चंडीगढ़ के ढांचे के अनुकूल नहीं
- याचिका में कहा गया है कि असम का यह कानून चंडीगढ़ के स्थानीय विकास कानूनों और कानूनी ढांचे को पूरी तरह नजरअंदाज करता है।
- परिभाषाओं में अंतर: अधिनियम में औद्योगिक परिसरों, होटलों, धर्मशालाओं आदि की जो परिभाषाएं और छूट दी गई हैं, वे चंडीगढ़ के स्थानीय शहरी विकास नियमों से मेल नहीं खातीं, जहां भवनों का उपयोग केवल उपयोगकर्ता-आधारित (User-based) नहीं होता।
- आपत्तियों की अनदेखी: बार ने मई 2025 में ही इस संबंध में अपनी लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं, लेकिन प्रशासन ने बिना किसी एक भी आपत्ति पर सुनवाई किए या उसका समाधान किए यह अधिसूचना जारी कर दी, जो “दिमाग का इस्तेमाल न करने” (Non-application of mind) को दर्शाता है।
किरायेदारों के लिए बेहद सख्त और दंडात्मक प्रावधान
- वकीलों ने तर्क दिया कि रेंट एक्ट मूल रूप से किरायेदारों के हितों की रक्षा करने वाला एक कल्याणकारी कानून (Beneficial Legislation) होता है, लेकिन नया कानून मकान मालिकों को अस्पष्ट आधारों पर बेदखली की अनुमति देता है।
- जुर्माने की दर अत्यधिक: यदि कोई किरायेदार अवधि समाप्त होने के बाद परिसर खाली नहीं करता है, तो उसे पहले दो महीनों के लिए दोगुना किराया और उसके बाद चार गुना किराया देना होगा। कोर्ट में दलील दी गई कि यह प्रावधान बहुत कठोर और दंडात्मक (Penal) प्रकृति का है।
मामले का सारांश (Quick Highlights)
| मुख्य विवादित बिंदु | बार एसोसिएशनों की आपत्तियां |
| अधिसूचना की तारीख | 6 मई 2026 (केंद्र सरकार द्वारा जारी) |
| अधिकार क्षेत्र पर सवाल | केंद्र के पास पुराने कानून (1949 एक्ट) को निरस्त कर दूसरा कानून थोपने की विधायी शक्ति नहीं है। |
| अदालत का ढांचा | विवाद सुलझाने का हक जजों से छीनकर तहसीलदारों और एडीसी (ADC) को देना गलत है। |
| वर्तमान संकट | पुराना कानून रद्द हो चुका है और नए कानून के नियम (Rules) अभी तक नहीं बने हैं, जिससे चंडीगढ़ में किरायेदारी से जुड़े नए मामले दर्ज होना पूरी तरह ठप हो गए हैं। |
कानूनी अनिश्चितता का माहौल
याचिकाकर्ताओं ने मामले को अत्यंत आकस्मिक (Urgent) बताते हुए कहा कि असम में भी इस कानून को जमीन पर उतारने और इसके नियम (Rules) बनाने में 2021 से 2026 तक का समय लग गया था। चंडीगढ़ में बिना नियम बनाए पुराना कानून रद्द करने से एक बड़ा कानूनी शून्य (Legal Vacuum) पैदा हो गया है, जिससे मकान मालिकों और किरायेदारों दोनों के नए विवाद अधर में लटक गए हैं। अब हाई कोर्ट की अंतिम सुनवाई पर ही इस कानून का भविष्य निर्भर करेगा।

