Clear Policy: दिल्ली हाईकोर्ट ने अदालती मुकदमों में होने वाले खर्च और उसके बाद रिफंड (Refund) की कछुआ चाल पर एक बेहद राहत भरा फैसला सुनाया है।
रकम वापस पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं कटवाने चाहिए
हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की डिवीजन बेंच ने साफ कहा कि जब पक्षों के बीच विवाद खत्म हो जाता है, तो नागरिकों को अपनी ही रकम वापस पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं कटवाने चाहिए। कोर्ट ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया है कि आपसी समझौते या सेटलमेंट के बाद लिटिगेंट्स (मुकदमेबाजों) को उनकी कोर्ट फीस तेजी से वापस मिल सके, इसके लिए 4 महीने के भीतर एक स्पष्ट और पुख्ता नीति (Clear Policy) तैयार की जाए।
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अदालत का रुख: ‘लंबे इंतजार का कोई तार्किक कारण नहीं’
डिवीजन बेंच ने रिफंड प्रक्रिया में होने वाली देरी पर कड़ा रुख अपनाते हुए टिप्पणी की, एक बार जब अदालत में लाया गया मुकदमा पक्षों के बीच सुलझ जाता है, तो ऐसा कोई कारण नहीं है कि उस वादी (Litigant) को कोर्ट फीस की वापसी के लिए कठिनाइयों और लंबे समय का सामना करना पड़े। अदालत ने रेखांकित किया कि कोर्ट फीस एक्ट, 1870 की धारा 16 और 16A के तहत आने वाले रिफंड दावों को आसान और सुव्यवस्थित बनाने के लिए एक ‘प्रॉपर और कोडिफाइड सिस्टम’ (Codified System) यानी संहिताबद्ध व्यवस्था का होना बेहद जरूरी है।
क्या है पूरा मामला? (The PIL & Practical Issues)
- यह निर्देश एडवोकेट दीपक सिंह ठाकुर और एक अन्य वादी द्वारा दायर एक जनहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL) पर सुनवाई के दौरान आया।
- 1.5 से 2 साल का लंबा इंतजार: सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को जमीनी हकीकत से रूबरू कराया। उन्होंने बताया कि मौजूदा रिफंड प्रक्रिया इतनी जटिल और कछुआ चाल वाली है कि एक बार आवेदन करने के बाद पैसा वापस आने में डेढ़ से दो साल (1.5 to 2 Years) का समय लग जाता है।
- कोई तय मानक नहीं: याचिका में दलील दी गई कि वर्तमान व्यवस्था न केवल धीमी है, बल्कि इसमें एकरूपता (Uniform Standards) का भी पूरी तरह अभाव है। अलग-अलग मामलों में अलग-अलग समय लगता है, जिससे वादियों को मानसिक और आर्थिक परेशानी उठानी पड़ती है।
- कोर्ट की सहमति: हाई कोर्ट की बेंच ने इस बात को स्वीकार किया कि इस तरह की अत्यधिक देरी नागरिकों के लिए अनावश्यक रूप से कठिनाई पैदा करती है।
हाई कोर्ट का दिल्ली सरकार को स्पष्ट निर्देश
- दिल्ली हाई कोर्ट ने इस प्रशासनिक ढुलमुलपन को सुधारने के लिए समय-सीमा तय कर दी है।
- 4 महीने की डेडलाइन: दिल्ली सरकार को अगले चार महीनों के भीतर एक पारदर्शी और त्वरित (Faster) रिफंड नीति तैयार करनी होगी।
- आपसी समन्वय: सरकार को यह नीति स्वतंत्र रूप से नहीं, बल्कि हाई कोर्ट प्रशासन (High Court Administration) के साथ उचित परामर्श और तालमेल के साथ बनानी होगी ताकि तकनीकी अड़चनों को पहले ही दूर किया जा सके।
फैसले का मुख्य सारांश (Key Takeaways at a Glance)
| मुख्य बिंदु | दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश / अवलोकन |
| मुख्य समस्या | आपसी समझौते (Settlement) के बाद कोर्ट फीस रिफंड होने में 1.5 से 2 साल की देरी। |
| संबंधित कानून | कोर्ट फीस एक्ट, 1870 की धारा 16 और 16A (Sections 16 & 16A of Court Fees Act). |
| अदालती आदेश | दिल्ली सरकार को 4 महीने के भीतर एक सुव्यवस्थित और तेज रिफंड पॉलिसी बनाने का निर्देश। |
| उद्देश्य | मुकदमों का बोझ कम करने के लिए ‘आउट-ऑफ-कोर्ट सेटलमेंट’ (जैसे मध्यस्थता/लोक अदालत) को बढ़ावा देना और वादियों को आर्थिक राहत देना। |
निष्कर्ष (Analysis Summary)
यह फैसला दिल्ली के कानूनी इतिहास में ‘ईज ऑफ जस्टिस’ (Ease of Justice) की दिशा में एक बड़ा कदम है। अक्सर अदालतों में मुकदमों के बोझ को कम करने के लिए कोर्ट के बाहर समझौते (Alternative Dispute Resolution – ADR) को बढ़ावा दिया जाता है। ऐसे में अगर कोई नागरिक समझौता कर लेता है, तो उसकी कोर्ट फीस तुरंत वापस मिलना उसका अधिकार है। दिल्ली हाई कोर्ट के इस सख्त रुख के बाद अब उम्मीद है कि आने वाले समय में कोर्ट फीस का रिफंड सीधे और ऑनलाइन माध्यम से बेहद कम समय में वादियों के बैंक खातों में पहुंच सकेगा।

