Court Jurisdiction: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने देश भर की लोक अदालतों और विधिक सेवा प्राधिकरणों के अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और मार्गदर्शक फैसला सुनाया है।
फैमिली कोर्ट बनाम लोक अदालत की शक्तियां
हाईकोर्ट के जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने हाल ही में दिए अपने फैसले में कहा कि आपसी समझौते और सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए बनाई गई संस्थाएं एक सक्षम फैमिली कोर्ट (Family Court) की शक्तियों को अपने हाथ में नहीं ले सकतीं। अदालत ने स्पष्ट रूप से होल्ड किया है कि लोक अदालत (Lok Adalat) या जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को विवाह विच्छेद (Divorce/तलाक) की डिक्री देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
मामला क्या था? (The Dispute of Fake Settlement)
चुनौती: यह मामला उन्नाव की रहने वाली एक महिला द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिसने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA), उन्नाव द्वारा साल 2018 में पारित आदेशों को चुनौती दी थी।
पति का ‘प्री-लिटिगेशन’ दांव: साल 2018 में पति ने अदालत में मुकदमा जाने से पहले (Pre-litigation stage) सीधे DLSA का रुख किया था। मामले को उसी दिन मध्यस्थता (Mediation) के लिए भेज दिया गया और एक समझौता पत्र तैयार कर लिया गया।
धोखाधड़ी का आरोप: महिला का आरोप था कि उसके पति ने धोखाधड़ी से उसके हस्ताक्षर (Signatures) ले लिए और प्राधिकरण के सामने तलाक के समझौते के नियम तैयार करवा दिए। इसके बाद प्राधिकरण ने मामले का निपटारा कर दिया।
पति का दावा: पति ने बाद में लोक अदालत/DLSA के इसी आदेश और समझौते को आधार बनाकर यह दावा करना शुरू कर दिया कि उनका विवाह आपसी सहमति से कानूनी रूप से टूट चुका है।
हाई कोर्ट का हस्तक्षेप: महिला ने पहले DLSA में रिव्यू (पुनर्विचार) अर्जी डाली, जिसे खारिज कर दिया गया (हालांकि DLSA ने स्पष्ट किया कि उन्होंने शादी को शून्य घोषित नहीं किया था)। इसके बाद पीड़िता ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान तत्कालीन मध्यस्थ (जो वर्तमान में राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में रजिस्ट्रार हैं) ने भी हलफनामा देकर साफ किया कि उन्होंने केवल एक मध्यस्थ के रूप में काम किया था और उन्हें “तलाक देने, उसकी पुष्टि करने या आदेश पारित करने का कोई अधिकार नहीं था।
हाई कोर्ट की विधिक व्याख्या: कानून क्या कहता है?
लोक अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर है तलाक: खंडपीठ ने विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम (Legal Services Authorities Act) और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (लोक अदालत) विनियम, 2009 के प्रावधानों का गहराई से विश्लेषण किया। अदालत ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा, जब मूल कानून के तहत तलाक के मामले को लोक अदालत में भेजा ही नहीं जा सकता, तो यह समझ से परे है कि प्री-लिटिगेशन चरण में किसी भी लोक अदालत से तलाक की डिक्री देने की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
रेगुलेशन 17(7) का सख्त हवाला: हाई कोर्ट ने नालसा (NALSA) के रेगुलेशन 17(7) का हवाला दिया, जो विशेष रूप से लोक अदालतों द्वारा आपसी सहमति से भी तलाक दिए जाने पर रोक (Proscribes) लगाता है। कोर्ट ने कहा कि लोक अदालतों और प्राधिकारियों को अपनी सीमाओं के प्रति सचेत रहना चाहिए। इस प्रकार के अस्पष्ट (Cryptic) आदेश पारित करना कानूनी क्षमता से बाहर है, इसलिए पति का यह दावा कि लोक अदालत के आदेश से उनका तलाक हो गया, पूरी तरह निराधार और कानून शून्य है।
फैसला सुनाना लोक अदालत का काम नहीं: हाई कोर्ट ने लोक अदालतों की भूमिका को स्पष्ट करते हुए दो टूक कहा, लोक अदालतें केवल पक्षकारों के बीच समझौते की शर्तों को सुगम (Facilitate) बनाने के लिए सशक्त हैं। उनके पास विवादों का न्यायिक निर्णय (Adjudicate) करने या डिक्री/निर्देश जारी करने की शक्ति नहीं है।
बैकलॉग कम करने का मतलब शक्तियों को हड़पना नहीं
अदालत ने लोक अदालतों द्वारा न्याय प्रणाली में दिए जा रहे योगदान की सराहना तो की, लेकिन उन्हें अपनी लक्ष्मण रेखा भी याद दिलाई। यह कहना एक बात है कि लोक अदालत/DLSA ने न्यायपालिका के बढ़ते बैकलॉग (लंबित मुकदमों) को कम करने और लोगों तक न्याय प्रभावी ढंग से पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन यह कहना बिल्कुल अलग बात होगी कि लोक अदालत ने एक सक्षम नियमित न्यायालय की शक्तियों को ही हड़प (Usurp) लिया और ऐसे तरीके से काम किया जो मौजूदा कानून के तहत अधिकृत नहीं था। अदालत ने सचेत किया कि इन निकायों को उन क्षेत्रों में कदम नहीं रखना चाहिए जो विशेष रूप से नियमित अदालतों और न्यायाधिकरणों (Tribunals) के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
अदालत का अंतिम आदेश
कोई तलाक नहीं हुआ: हाई कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए स्पष्ट और कड़े शब्दों में घोषित किया रिकॉर्ड और कानून की नजर में याचिकाकर्ता (पत्नी) और प्रतिवादी (पति) के बीच आज की तारीख तक कोई औपचारिक या वैध तलाक नहीं हुआ है। दोनों आज भी कानूनी रूप से पति-पत्नी हैं।
कानूनी कार्रवाई की छूट: कोर्ट ने महिला को पूरी आजादी दी है कि वह अपने पति के खिलाफ धोखाधड़ी और अन्य कानूनी मामलों में कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई (Proceedings) करने के लिए स्वतंत्र है।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | विवरण |
| माननीय उच्च न्यायालय बेंच | जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी (इलाहाबाद हाई कोर्ट) |
| मुख्य कानूनी मुद्दा | क्या लोक अदालत या DLSA को विवाह विच्छेद (Divorce Decree) देने का अधिकार है? |
| प्रासंगिक कानून | विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम और नालसा (Lok Adalats) विनियम, 2009 का रेगुलेशन 17(7) |
| अदालत का विधिक सिद्धांत | लोक अदालत केवल समझौते करा सकती है, वह नियमित पारिवारिक न्यायालय (Family Court) के अधिकार क्षेत्र को नहीं हड़प सकती। |
| अंतिम निष्कर्ष | लोक अदालत द्वारा किया गया कथित ‘तलाक समझौता’ कानूनन अमान्य; दोनों के बीच कोई तलाक नहीं हुआ। |
निष्कर्ष (Takeaway)
यह फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ा झटका है जो कानूनी प्रक्रियाओं और लंबी अदालती कार्यवाहियों से बचने के लिए विधिक सेवा प्राधिकरणों या लोक अदालतों में शॉर्टकट के जरिए ‘तलाक के समझौते’ करा लेते हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि भारत में हिंदू विवाह अधिनियम या अन्य व्यक्तिगत कानूनों के तहत विवाह विच्छेद का अधिकार केवल और केवल सक्षम सिविल/फैमिली कोर्ट के पास ही सुरक्षित है।

