The Marital Rift: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवादों और दहेज प्रताड़ना के मामलों में आपसी समझौते को प्राथमिकता देते हुए एक अहम फैसला सुनाया है।
महिला की ओर से क्रूरता और दहेज उत्पीड़न की एफआईआर
हाईकोर्ट के जस्टिस संदीप शर्मा की एकल पीठ ने 22 मई 2026 को यह आदेश जारी करते हुए कहा कि चूंकि शादी अब पूरी तरह से टूट चुकी है और दोनों पक्षों ने स्वेच्छा से विवाद सुलझा लिया है, इसलिए आपराधिक कार्यवाही को जारी रखने का कोई सार्थक उद्देश्य (Fruitful Purpose) नहीं रह जाता। अदालत ने एक महिला द्वारा अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ दर्ज कराई गई क्रूरता और दहेज उत्पीड़न की एफआईआर (FIR) को इस आधार पर रद्द (Quash) कर दिया कि दोनों पक्षों के बीच 24 लाख रुपये के स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony) पर समझौता हो चुका है।
मामला और कानूनी विवाद (The Marital Rift & Litigation)
- शादी और अलगाव: जोड़े की शादी साल 2017 में हुई थी, लेकिन वैवाहिक कलह के कारण वे जून 2022 से अलग रहने लगे।
- दहेज का मामला: दिसंबर 2023 में पत्नी ने पति, ससुर और परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ क्रूरता और दहेज उत्पीड़न के गंभीर आरोपों के तहत एफआईआर दर्ज कराई थी।
- हाई कोर्ट में अपील: साल 2024 में पति और उसके परिवार ने इस एफआईआर को रद्द कराने के लिए हाई कोर्ट का रुख किया। याचिका के लंबित रहने के दौरान ही दोनों पक्षों ने आपसी बातचीत से एक व्यापक समझौता (Comprehensive Settlement) कर लिया।
समझौते की शर्तें और अदालत की कार्यवाही
24 लाख रुपये की एलिमनी: अदालत की कार्यवाही के दौरान कई महत्वपूर्ण तथ्य रिकॉर्ड पर लिए गए। पति अपनी अलग रह रही पत्नी को स्थायी गुजारा भत्ते के रूप में 24 लाख रुपये का भुगतान करने पर सहमत हुआ।
आपसी सहमति से तलाक: दोनों पक्षों ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13B (Divorce by Mutual Consent) के तहत संबंधित फैमिली कोर्ट में संयुक्त रूप से तलाक की अर्जी दाखिल करने का निर्णय लिया।
अदालत में पत्नी की गवाही: शिकायतकर्ता पत्नी स्वयं अदालत कक्ष में उपस्थित हुई। उसने न्यायाधीश के सामने बयान दिया कि उसने यह समझौता बिना किसी दबाव के, अपनी मर्जी से किया है। उसने स्पष्ट किया कि यदि उसे तय राशि मिल जाती है, तो उसे एफआईआर रद्द करने पर कोई आपत्ति नहीं है और वह अपने सारे केस वापस ले लेगी।
ससुर का बयान: महिला के ससुर ने कोर्ट में बयान दिया कि उनके पास अपने बेटे और परिवार के अन्य आरोपी सदस्यों की तरफ से बयान दर्ज कराने का पूरा अधिकार (Authority) है, जिसे कोर्ट ने रिकॉर्ड पर लिया।
हाई कोर्ट की विधिक टिप्पणियां: यह नैतिक अधमता का मामला नहीं
गंभीर या जघन्य अपराध नहीं: जस्टिस संदीप शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न मार्गदर्शक सिद्धांतों का हवाला देते हुए एफआईआर को रद्द करने के पक्ष में विधिक तर्क दिए। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि मौजूदा मामले में, याचिकाकर्ताओं (आरोपियों) द्वारा किए गए कथित अपराध नैतिक अधमता (Moral Turpitude) या किसी गंभीर/जघन्य अपराध (Heinous Crime) की श्रेणी में नहीं आते हैं, बल्कि ये व्यक्तिगत वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले हैं। अतः इस स्थिति में एफआईआर और उसके बाद की सभी कार्यवाहियों को रद्द करना पूरी तरह उपयुक्त है।
सजा की संभावना बेहद कम: कोर्ट ने नोट किया कि जब मुख्य शिकायतकर्ता (पत्नी) ने खुद समझौता कर लिया है और वह मुकदमे को आगे नहीं बढ़ाना चाहती, तो ऐसी स्थिति में भविष्य में आरोपियों को सजा होने की संभावना (Chances of Conviction) बेहद कम और धुंधली हो जाती है। ऐसे में मुकदमे को खींचना केवल अदालत के समय की बर्बादी होगी।
कूलिंग-ऑफ पीरियड में छूट का निर्देश: कोर्ट ने माना कि दोनों पक्षों के बीच सुलह की कोई गुंजाइश नहीं बची है और रिश्ता अपरिवर्तनीय रूप से टूट चुका है। इसलिए हाई कोर्ट ने संबंधित फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि जब यह जोड़ा आपसी सहमति से तलाक की अर्जी दाखिल करे, तो उनके कानूनन अनिवार्य कूलिंग-ऑफ पीरियड (Cooling-off Period – 6 महीने का इंतजार) को माफ करने पर सकारात्मक रूप से विचार किया जाए।
अदालत की कडी चेतावनी: समझौता टूटा तो केस दोबारा जिंदा होगा
हाई कोर्ट ने आरोपियों को राहत देते हुए इस फैसले में एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी सुरक्षा कवच (Caveat) भी जोड़ा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह एफआईआर इस शर्त पर रद्द की जा रही है कि दोनों पक्ष समझौते की शर्तों का पूरी तरह पालन करेंगे। यदि किसी भी कारण से यह समझौता विफल (Fail) होता है या पति तय की गई राशि का भुगतान करने और शर्तों को मानने से मुकरता है, तो यह रद्द की गई आपराधिक कार्यवाही (Criminal Proceedings) स्वचालित रूप से (Automatically) पुनर्जीवित (Revive) हो जाएगी और कानून अपना काम करेगा।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | विवरण |
| माननीय उच्च न्यायालय बेंच | जस्टिस संदीप शर्मा (हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय) |
| फैसले की तारीख | 22 मई 2026 |
| समझौते की कुल राशि | ₹24 लाख (स्थायी गुजारा भत्ता) |
| मुख्य कानूनी प्रावधान | हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13B (आपसी सहमति से तलाक) |
| राज्य का पक्ष | अतिरिक्त अधिवक्ता जनरल राजन कहोल और विशाल पंवार (कहा- केस चलाने का कोई औचित्य नहीं)। |
| अदालत का अंतिम आदेश | एफआईआर और सभी कानूनी कार्यवाहियां रद्द; आरोपी दोषमुक्त। |
निष्कर्ष (Takeaway)
यह फैसला दर्शाता है कि भारतीय न्यायपालिका वैवाहिक विवादों में फौजदारी (Criminal) मुकदमों को खींचने के बजाय सौहार्दपूर्ण समाधान और पक्षकारों के पुनर्वास को अधिक महत्व देती है। 24 लाख रुपये के इस समझौते ने न केवल दोनों पक्षों को वर्षों लंबी और कड़वाहट से भरी अदालती लड़ाई से बचाया, बल्कि उनके लिए जीवन में आगे बढ़ने का रास्ता भी साफ कर दिया।

