Tuesday, September 1, 2026
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NTA Case: NEET-UG 2026 फिर से किस मोड में कराई जाए…RJD सांसद के इस मांग वाली याचिका पर पढ़िए क्या रहा निर्णय, यहां पर पूरा केस

NTA Case: सुप्रीम कोर्ट ने 21 जून को होने वाली नेशनल एलिजिबिलिटी-कम-एंट्रेंस टेस्ट (NEET-UG 2026) की पुनः परीक्षा को लेकर एक अंतरिम फैसला सुनाया है।

परीक्षा को कंप्यूटर-आधारित टेस्ट करने की मांग

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सांसद सुधाकर सिंह द्वारा दायर इस याचिका पर सुनवाई करते हुए मामले को जुलाई तक के लिए टाल दिया, जिससे परीक्षा से ठीक पहले सीबीटी मोड में माइग्रेशन की मांग कर रहे परीक्षार्थियों को कोई तात्कालिक राहत नहीं मिली। अदालत ने इस परीक्षा को कंप्यूटर-आधारित टेस्ट (CBT) मोड में आयोजित करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। इसका सीधा मतलब यह है कि आगामी 21 जून की परीक्षा अपने पूर्व निर्धारित पेन-एंड-पेपर (ओएमआर शीट) फॉर्मेट में ही आयोजित की जाएगी।

अदालत की मुख्य टिप्पणी: एजेंसियों पर पहले से ही भारी दबाव

सुनवाई के दौरान जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत पहले भी इस तरह की समान याचिकाओं को खारिज कर चुकी है। उन्होंने कहा, आप जानते हैं कि हम किस तरह की समस्याओं का सामना कर रहे हैं। परीक्षा रद्द कर दी गई थी, अब इसे दोबारा आयोजित किया जा रहा है… परीक्षा कराने वाली एजेंसियों पर इस समय जिस तरह का भारी दबाव है, उसे देखते हुए हम ऐसी (ऐन वक्त पर नियम बदलने वाली) याचिकाओं को पहले ही खारिज कर चुके हैं।

एनटीए (NTA) के ढांचे और जवाबदेही पर उठे गंभीर सवाल

कार्यप्रणाली: इससे पहले, 29 मई को जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने हाल ही में हुए नीट-यूजी 2026 पेपर लीक और उसके बाद परीक्षा रद्द होने से उपजे हालातों पर सुनवाई करते हुए नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली पर बेहद सख्त टिप्पणियां की थीं।

व्यक्तिगत जवाबदेही तय हो: कोर्ट ने कहा कि जब तक व्यवस्था के भीतर व्यक्तिगत रूप से अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं की जाएगी, तब तक यह समस्या खत्म नहीं होगी। कोर्ट ने कहा, “असली समस्या तब तक नहीं रुकेगी जब तक वास्तविक जवाबदेही तय नहीं होती… जब तक आप जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों की पहचान नहीं करेंगे, तब तक यह एक बिखरा हुआ दायित्व बना रहेगा।”

छात्रों और परिवारों के लिए “दर्दनाक”: कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को छात्रों और उनके परिवारों के लिए बेहद “दर्दनाक” (Traumatic) बताया। जजों ने कहा, “हम अपने छात्रों को निराश नहीं कर सकते। यह केवल छात्र की बात नहीं है, बल्कि उसके पूरे परिवार की बात है… इसमें भावनाएं, प्यार, समय और सालों की कड़ी मेहनत जुड़ी होती है।”

पीएम मोदी कर रहे हैं निगरानी: केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को आश्वस्त किया कि जवाबदेही तय की जाएगी और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व्यक्तिगत रूप से इस पूरी स्थिति की निगरानी (Supervising) कर रहे हैं।

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इसरो (ISRO) के पूर्व प्रमुख से कोर्ट के तीखे सवाल

अदालत ने वर्ष 2024 के नीट विवाद के बाद गठित की गई हाई-पावर कमेटी के अध्यक्ष और इसरो के पूर्व प्रमुख के. राधाकृष्णन से भी समिति की सिफारिशों के क्रियान्वयन को लेकर सवाल किए। कोर्ट ने कहा कि यदि आपकी निगरानी के बावजूद यह (2026 का पेपर लीक) दोबारा हुआ है, तो या तो सिफारिशों में कोई कमी है या फिर ठीक से मॉनिटरिंग नहीं की गई। इस पर राधाकृष्णन ने अदालत को सूचित किया कि समिति द्वारा लगभग 60 सिफारिशें की गई थीं, जिनमें से अधिकांश को लागू किया जा चुका है और कुछ प्रक्रिया में हैं। हालांकि, कोर्ट ने जोर दिया कि बार-बार होने वाली विफलताओं से सबक लेते हुए NTA को तदर्थ (Ad-hoc) व्यवस्था के बजाय एक स्थायी विशेषज्ञ-संचालित संस्थागत तंत्र की आवश्यकता है।

अदालत के समक्ष लंबित अन्य मुख्य मांगें (Pending Pleas Before SC)

मांगे: विभिन्न डॉक्टरों और मेडिकल एसोसिएशनों (जैसे FAIMA और यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट) ने एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AoR) तन्वी दुबे के माध्यम से याचिकाएं दायर कर बड़ी मांगें उठाई हैं, जिन पर आने वाले समय में सुनवाई होगी।

NTA का पुनर्गठन या विघटन: परीक्षाओं की विश्वसनीयता खोने के कारण वर्तमान स्वरूप में एनटीए को भंग करने या उसकी जगह एक अधिक तकनीकी रूप से उन्नत और स्वायत्त निकाय (Autonomous Body) बनाने की मांग।

डिजिटल लॉकिंग प्रणाली: शारीरिक रूप से प्रश्नपत्रों के परिवहन और कस्टडी के दौरान होने वाले जोखिमों को कम करने के लिए प्रश्नपत्रों की डिजिटल लॉकिंग और भविष्य में सीबीटी मॉडल पर पूरी तरह से शिफ्ट होना।

न्यायिक समिति की निगरानी: सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय निगरानी समिति (जिसमें साइबर सुरक्षा और फोरेंसिक विशेषज्ञ शामिल हों) का गठन करना, जो परीक्षा और जांच की निगरानी करे।

CBI स्टेटस रिपोर्ट: फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन (FAIMA) ने मांग की है कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को चार सप्ताह के भीतर एक स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया जाए, जिसमें पेपर लीक के नेटवर्क, गिरफ्तारियों और अभियोजन की स्थिति का पूरा ब्योरा हो।

NEET-UG 2026 संकट: एक नजर में (Core Matrix)

पैरामीटरवर्तमान स्थिति / चुनौतीसुप्रीम कोर्ट का रुख (2026)
21 जून की परीक्षा का मोडपेपर लीक के बाद पुन: परीक्षा के मोड को ऑनलाइन (CBT) करने की मांग थी।खारिज; 21 जून को परीक्षा पारंपरिक पेन-एंड-पेपर (OMR) मोड में ही होगी।
प्रशासनिक जवाबदेहीNTA का ढीला ढांचा और संस्थागत विफलताएं।कोर्ट ने कहा- संस्थागत नहीं, व्यक्तिगत अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
छात्रों पर प्रभावदेश के 22 लाख से अधिक मेडिकल उम्मीदवार और उनके परिवार अनिश्चितता के दौर में हैं।कोर्ट ने इसे “बेहद दर्दनाक” माना और भविष्य में स्थायी विशेषज्ञ तंत्र बनाने पर जोर दिया।
अग्रिम कानूनी कार्रवाईCBI जांच और NTA के पुनर्गठन की मांग।इस मामले को विस्तृत सुनवाई के लिए जुलाई तक के लिए टाल दिया गया है।

निष्कर्ष (Takeaway)

सुप्रीम कोर्ट का 21 जून की परीक्षा को सीबीटी मोड में न बदलने का फैसला व्यावहारिक दृष्टिकोण पर आधारित है, क्योंकि ऐन वक्त पर देश के 22 लाख से अधिक छात्रों के लिए ऑनलाइन परीक्षा का बुनियादी ढांचा तैयार करना और परीक्षा का पैटर्न बदलना प्रशासनिक रूप से लगभग असंभव और अधिक अफरा-तफरी पैदा करने वाला होता। हालांकि, कोर्ट ने NTA को जो कड़ी चेतावनी दी है, वह साफ करती है कि आने वाले दिनों में देश की इस सबसे बड़ी परीक्षा प्रणाली में बहुत बड़े और बुनियादी संरचनात्मक (Structural) बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

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