Foreign Tour: आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने अहम सवाल क्या सिर्फ किसी आपराधिक मामले (Criminal Case) के लंबित होने की वजह से किसी नागरिक को विदेश जाने से रोका जा सकता है? पर फैसला सुनाया।
इंटरनेशनल मेडिकल कॉन्फ्रेंस में जाने के लिए दायर की थी याचिका
हाईकोर्ट के जस्टिस तुहिन कुमार गेडेला की सिंगल बेंच ने कहा, सिर्फ केस पेंडिंग होना किसी का विदेश जाने का मौलिक अधिकार (Fundamental Right) छीनने का ऑटोमेटिक आधार नहीं हो सकता। अदालत ने विजयवाड़ा के एक नामी कार्डियोलॉजिस्ट (दिल के डॉक्टर) को बड़ी राहत देते हुए पासपोर्ट अधिकारियों को उनका पासपोर्ट तुरंत रिन्यू करने का आदेश दिया। डॉक्टर साहब को जुलाई 2026 में अमेरिका में एक इंटरनेशनल मेडिकल कॉन्फ्रेंस में शामिल होना था, लेकिन पासपोर्ट रिन्यू न होने के कारण उनका जाना अधर में लटका हुआ था।
पासपोर्ट रिन्यू करने पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं: हाई कोर्ट
जस्टिस तुहिन कुमार गेडेला की सिंगल बेंच ने पासपोर्ट एक्ट के तकनीकी नियमों और संविधान के बीच संतुलन बिठाते हुए 28 मई को अपने फैसले में कहा, पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 6(2)(f) के तहत अगर भारत में कोई आपराधिक मामला लंबित है, तो अथॉरिटी पासपोर्ट जारी करने से इनकार कर सकती है। लेकिन इस कानून को ध्यान से पढ़ने पर साफ होता है कि पासपोर्ट के रिन्यूअल (नवीनीकरण) पर कोई पूर्ण प्रतिबंध (Absolute Bar) नहीं है। महज केस पेंडिंग होने को पासपोर्ट रोकने का बहाना नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने याद दिलाया कि विदेश यात्रा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 (Right to Life and Liberty) के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक अभिन्न हिस्सा है, जिसे राज्य मनमाने ढंग से नहीं छीन सकता।
क्या था पूरा मामला? (क्यों अड़ गया था पासपोर्ट ऑफिस?)
याचिकाकर्ता डॉक्टर का पासपोर्ट 21 जून को एक्सपायर होने वाला था, जिसके लिए उन्होंने अप्रैल में रिन्यूअल एप्लीकेशन डाली थी।
पुलिस वेरिफिकेशन में अड़ंगा: पुलिस वेरिफिकेशन के दौरान पासपोर्ट अथॉरिटी को पता चला कि डॉक्टर के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं, जिनका जिक्र उन्होंने ऑनलाइन फॉर्म में (अनजाने में) नहीं किया था।
पासपोर्ट ऑफिस की शर्त: विजयवाड़ा के रीजनल पासपोर्ट ऑफिसर (RPO) ने 1993 के एक सरकारी नोटिफिकेशन का हवाला देते हुए डॉक्टर से कहा कि जब तक वे संबंधित क्रिमिनल कोर्ट से विदेश जाने की ‘लिखित अनुमति’ नहीं लाते, तब तक उनका पासपोर्ट रिन्यू नहीं होगा।
डॉक्टर की दलील: डॉक्टर के वकील ने कोर्ट को बताया कि जिन मामलों का हवाला दिया जा रहा है, उनमें से एक केस (2020 का) में सुप्रीम कोर्ट से उन्हें राहत मिली हुई है और दूसरे केस (2024 का) पर खुद हाई कोर्ट ने स्टे (Stay) लगा रखा है।n चूंकि डॉक्टर को जुलाई 2026 में अमेरिका में एक वैज्ञानिक बैठक में हिस्सा लेना था, इसलिए पासपोर्ट न मिलने से उनके करियर और अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक प्रतिबद्धताओं को बड़ा नुकसान हो रहा था।
ऐतिहासिक फैसलों का हवाला (Maneka Gandhi से Vangala Kasturi तक)
हाई कोर्ट ने अपने फैसले को मजबूत करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों (जैसे मेनका गांधी बनाम भारत संघ और वांगला कस्तूरी रंगाचार्युलु बनाम सीबीआई) का हवाला दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक आरोपी व्यक्ति भी अपने मौलिक अधिकारों का हकदार रहता है। अदालतों का काम आरोपी की मौजूदगी सुनिश्चित करना है, लेकिन इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता की कीमत पर नहीं किया जा सकता। यात्रा पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध निष्पक्ष, तर्कसंगत और कानूनी रूप से सही होने चाहिए, न कि मैकेनिकल।
हाई कोर्ट का निर्देश: अदालत ने रिट याचिका का निपटारा करते हुए क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी (RPO) को आदेश दिया कि वे दो सप्ताह के भीतर डॉक्टर के पासपोर्ट रिन्यूअल की प्रक्रिया को पूरा कर उचित आदेश जारी करें।
विश्लेषण: इस फैसले के बड़े मायने
| इम्पैक्ट एरिया | हाई कोर्ट का स्टैंड और राहत |
| प्रोफेशनल्स को बड़ी राहत | डॉक्टर, इंजीनियर या बिजनेसमैन जैसे प्रोफेशनल्स, जो छोटे-मोटे या आपसी विवाद के केस झेल रहे हैं, वे अब पासपोर्ट मैनुअल के चक्रव्यूह में फंसे बिना अपने अंतरराष्ट्रीय दौरों पर जा सकेंगे। |
| अथॉरिटीज के लिए गाइडलाइन | पासपोर्ट दफ्तरों को कड़ा संदेश है कि वे ‘लकीर के फकीर’ बनकर हर पेंडिंग केस वाले की फाइल न रोकें, बल्कि केस की गंभीरता और कोर्ट के पुराने आदेशों को भी देखें। |
| राइट टू ट्रैवल (Right to Travel) | कोर्ट ने एक बार फिर स्थापित किया है कि विदेश जाना कोई ‘विशेषाधिकार’ (Privilege) नहीं बल्कि एक ‘मौलिक अधिकार’ है, जिसे सरकारी बाबू अपनी मर्जी से नहीं रोक सकते। |
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का यह फैसला उन हजारों लोगों के लिए उम्मीद की किरण है जिनके पासपोर्ट सिर्फ इसलिए रोक दिए जाते हैं क्योंकि उन पर कोई केस चल रहा है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कानून का मकसद किसी आरोपी को तब तक बांधकर रखना नहीं है जब तक कि वह सचमुच भगोड़ा साबित न हो जाए। मौलिक अधिकार सर्वोपरि हैं।

