Foreign Divorce Decree: दिल्ली हाई कोर्ट ने विदेश में रह रहे भारतीय नागरिकों के लिए एक बड़ी राहत दी है।
पासपोर्ट रिकॉर्ड से पूर्व पत्नी का नाम हटाने का अनुरोध
हाईकोर्ट के जस्तित पुरुषेंद्र कुमार कौरव की सिंगल बेंच ने कनाडा में रह रहे एक भारतीय नागरिक की याचिका को स्वीकार करते हुए पासपोर्ट अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे उसके पासपोर्ट रिकॉर्ड से पूर्व पत्नी का नाम हटाने के अनुरोध पर तुरंत कार्रवाई करें। कोर्ट ने साफ किया है कि अगर किसी नागरिक के पास विदेशी अदालत से मिला वैध और आपसी सहमति वाला तलाक का डिक्री (Foreign Divorce Decree) है, तो पासपोर्ट अथॉरिटी पासपोर्ट अपडेट करने या पूर्व जीवनसाथी का नाम हटाने के लिए भारतीय अदालत से अलग से ‘घोषणात्मक डिक्री’ (Declaratory Decree) लाने की जिद नहीं कर सकती।
लकीर के फकीर न बनें पासपोर्ट अधिकारी: हाई कोर्ट
अदालत ने पासपोर्ट विभाग के ढुलमुल और मैकेनिकल रवैये पर टिप्पणी करते हुए 29 मई को अपने आदेश में कहा:”एक बार जब स्वतंत्र रूप से यह पाया जाता है कि विदेशी तलाक की डिक्री सीपीसी (CPC) की धारा 13 और सुप्रीम कोर्ट के तय सिद्धांतों (Y Narasimha Rao केस) की शर्तों को पूरा करती है, तो संबंधित अथॉरिटी बिना किसी कानूनी कमी को दिखाए, किताबी और यांत्रिक तरीके से (pedantic and mechanical manner) भारतीय अदालत से अलग से डिक्री लाने की जिद नहीं कर सकती।
क्या था पूरा मामला? (क्यों फंसा था पासपोर्ट?)
यह मामला एक ऐसे जोड़े का था जिनकी शादी 2017 में हुई थी और बाद में वे कनाडा शिफ्ट हो गए थे।
2024 में तलाक: साल 2022 से अलग रहने के बाद दोनों ने आपसी सहमति से एक सेपरेशन एग्रीमेंट किया और 2024 में ब्रिटिश कोलंबिया की सुप्रीम कोर्ट (कनाडा) से तलाक ले लिया।
पासपोर्ट नियमों का अड़ंगा: तलाक के बाद याचिकाकर्ता ने कनाडा में दूसरी शादी कर ली और अपने भारतीय पासपोर्ट को अपडेट कराना चाहा। लेकिन पासपोर्ट अधिकारियों ने पासपोर्ट मैनुअल के नियमों का हवाला देकर कनाडा के कोर्ट के फैसले को मानने से इनकार कर दिया। मैनुअल के मुताबिक, विदेशी तलाक को पहले भारतीय कोर्ट से प्रमाणित (Declaratory Order) कराना जरूरी था।
पारिवारिक अदालत का चक्कर: मजबूरन याचिकाकर्ता ने दिल्ली की फैमिली कोर्ट में केस किया, लेकिन फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए केस खारिज कर दिया कि यह मामला उनके क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र (Territorial Jurisdiction) में नहीं आता है। इसके बाद पीड़ित ने हाई कोर्ट का रुख किया।
कोर्ट का फैसला: क्यों वैध माना गया विदेशी तलाक?
हाई कोर्ट ने कानून की बारीकियों को स्पष्ट करते हुए याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसले के आधार को विस्तार से बताया।
आपसी सहमति और भागीदारी: कोर्ट ने नोट किया कि यह तलाक ‘एकतरफा’ (Ex-parte) नहीं था। दोनों पक्षों ने अपनी मर्जी से इसमें हिस्सा लिया था और पूर्व पत्नी ने इस विदेशी डिक्री पर कभी कोई सवाल या आपत्ति नहीं उठाई।
CPC की धारा 13 और 14: सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत, विदेशी अदालत के फैसले को तब तक वैध और अंतिम माना जाता है, जब तक कि दूसरा पक्ष उसमें कोई बड़ी कानूनी धोखाधड़ी या कमी साबित न कर दे।
हेग कन्वेंशन का हवाला: याचिकाकर्ता के वकील ने यह भी दलील दी कि भारत हेग कन्वेंशन (Hague Convention 1961) का हिस्सा है, जो विदेशी सार्वजनिक दस्तावेजों के सरलीकरण की बात करता है, इसलिए बार-बार भारतीय अदालतों के चक्कर लगवाना गलत है।
डिजिटल विश्लेषण: NRI नागरिकों के लिए इस फैसले के क्या हैं मायने?
| इम्पैक्ट एरिया | हाई कोर्ट का स्टैंड और राहत |
| प्रवासियों (NRIs) को बड़ी राहत | विदेश में रह रहे भारतीयों को अब विदेशी कोर्ट से वैध तलाक मिलने के बाद भारतीय अदालतों के चक्कर काटने और सालों तक केस लड़ने की जरूरत नहीं होगी। |
| पासपोर्ट सिस्टम में सुधार | यह फैसला पासपोर्ट अथॉरिटीज को ‘रेड टेपिस्म’ (लालफीताशाही) और लकीर के फकीर बनकर काम करने से रोकता है। अब उन्हें विदेशी डिक्री को सीधे स्वीकार करना होगा। |
| समय और पैसे की बचत | विदेशों में रहने वाले भारतीय जो वहां आपसी सहमति से अलग हो चुके हैं, वे अब बिना किसी मानसिक और कानूनी प्रताड़ना के आसानी से अपना पासपोर्ट री-इश्यू या अपडेट करा सकेंगे। |
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला उन प्रवासियों के लिए ‘लाइफ सेवर’ की तरह है जो विदेशी अदालतों से कानूनी रूप से अलग होने के बाद भी भारतीय ब्यूरोक्रेसी के कड़े नियमों में फंस जाते थे। कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि अगर विदेशी अदालत का फैसला दोनों पक्षों की सहमति से आया है और कानूनी रूप से सही है, तो सरकारी विभागों को प्रक्रियाओं को आसान बनाना चाहिए, न कि उसे और उलझाना चाहिए।

