Wednesday, July 22, 2026
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Tis Hazari Court: कोर्ट स्टाफ को मेडिकल बिल का पूरा पैसा नहीं दिया व सैलरी भी काट लिया गया…यह तो बेहद परेशान करने वाला रवैया है, पढ़ें केस

Tis Hazari Court: दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार के कर्मचारी को वैध मेडिकल क्लेम देने के मामले में तल्ख रवैया अपनाया है।

काटी गई सैलरी संग छह फीसदी सालाना ब्याज के साथ राशि वापस करें

हाईकोर्ट की जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की एकल पीठ ने अपने फैसले में दिल्ली सरकार के अड़ियल रुख की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने आदेश दिया कि कर्मचारी को इलाज में खर्च हुए पूरे पैसे दिए जाएं और जो सैलरी काटी गई थी, उसे 6% सालाना ब्याज के साथ वापस किया जाए। कोर्ट की टिप्पणी किया कि एक कर्मचारी जो अपनी पत्नी की जान बचाने के लिए लड़ रहा था, उसके वैध मेडिकल क्लेम के साथ सरकार ने जैसा बर्ताव किया, वह बेहद परेशान करने वाला (Deeply Troubling) और अमानवीय है।

अदालती कर्मचारी के मेडिकल रीइंबर्समेंट का मामला

हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार के उस फैसले को रद्द कर दिया,  जिसमें एक अदालती कर्मचारी (Court Staff) के मेडिकल रीइंबर्समेंट पर कैपिंग (सीमा) लगा दी गई थी और पैसे वसूलने के लिए उसकी सैलरी तक काट ली गई थी।

क्या था पूरा मामला? (20 साल पुरानी कानूनी लड़ाई)

यह मामला तीस हजारी कोर्ट (Tis Hazari Court) में अहलमद (Ahlmad – कोर्ट रिकॉर्ड कीपर) के पद पर तैनात जीत सिंह से जुड़ा है। मामला साल 2006 का है, जब उनकी पत्नी लिवर फेलियर (Liver Failure) के कारण कोमा की स्थिति में सर गंगा राम अस्पताल में भर्ती हुई थीं।

एडवांस मिला, बिल कम आया: आपातकालीन स्थिति को देखते हुए तीस हजारी कोर्ट प्रशासन ने इलाज के लिए ₹2,25,000 का एडवांस स्वीकृत (Sanction) किया था। अस्पताल का अंतिम बिल ₹1,89,324 आया। जीत सिंह ने ईमानदारी दिखाते हुए बची हुई एडवांस राशि तुरंत विभाग को लौटा दी।

सरकार का तकनीकी पेंच और रिकवरी नोटिस: इसके बाद दिल्ली सरकार ने एक क्रूर प्रशासनिक रुख अपनाया। सरकार ने साल 2002 के पुराने रेट शेड्यूल (Reimbursement Ceiling) का हवाला देते हुए क्लेम को केवल ₹1,17,456 पर कैप कर दिया।

सैलरी से कटौती: सरकार ने कहा कि जो पैसा एडवांस में ज़्यादा दिया गया है, उसकी वसूली की जाएगी। इसके लिए तीस हजारी कोर्ट के जिला एवं सत्र न्यायाधीश के माध्यम से कर्मचारी को ₹71,868 वापस करने का डिमांड नोटिस थमा दिया गया और उनकी सैलरी से पैसे काटने शुरू कर दिए गए। पीड़ित कर्मचारी ने 2007 में हाई कोर्ट का रुख किया। हाई कोर्ट ने तब इस वसूली नोटिस पर स्टे लगाया था, जिसे 2011 में एब्सोल्यूट (स्थायी) कर दिया गया और अब 2026 में जाकर इस पर अंतिम न्याय आया है।

हाई कोर्ट की दिल्ली सरकार को कड़ी फटकार (3 मुख्य टिप्पणियां)

2002 के रेट से 2006 का इलाज कैसे होगा?: जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने दिल्ली सरकार के इन तर्कों को कानूनी और संवैधानिक रूप से पूरी तरह गलत (Legally Unsustainable) ठहराया।  कोर्ट ने कहा कि सरकार के पास ऐसा कोई तर्क या आधार नहीं है जो यह साबित करे कि 2002 का रेट शेड्यूल, साल 2006 में एक स्पेशलाइज्ड अस्पताल में हुए आपातकालीन आईसीयू (ICU) इलाज के वास्तविक खर्च से मेल खाता हो। महँगाई और इलाज के खर्च समय के साथ बदलते हैं।

कर्मचारी पर ‘फर्जीवाड़े’ का आरोप शर्मनाक: सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार ने कर्मचारी पर मेडिकल खर्च के आकलन में ‘धोखाधड़ी/फर्जीवाड़ा’ (Fraud) करने का बेहद गंभीर आरोप तक लगा दिया। कोर्ट ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा, अस्पताल का अंतिम बिल अनुमानित राशि से कम होना धोखाधड़ी नहीं, बल्कि कर्मचारी की ईमानदारी (Bona fides) को दर्शाता है क्योंकि उसने बची हुई रकम तुरंत विभाग को लौटा दी थी। अपनी पत्नी की जान बचाने के लिए संघर्ष करने वाले कर्मचारी पर ऐसा बेबुनियाद आरोप लगाना पूरी तरह निराधार है, क्योंकि सरकार इलाज या खर्च पर सवाल नहीं उठा रही, बल्कि सिर्फ रीइंबर्समेंट की सीमा पर अड़ी है।”

यह अमानवीय और यांत्रिक रवैया है: हाई कोर्ट ने कहा कि रेट सीलिंग के नाम पर पूरा पैसा देने से मना करना और सैलरी काटना पूरी तरह मनमाना (Arbitrary) है। सुप्रीम कोर्ट ने भी पहले साफ कहा है कि चिकित्सा दावों में ऐसा यांत्रिक और संवेदनहीन रवैया नहीं अपनाया जा सकता।

हाई कोर्ट का अंतिम आदेश: ब्याज समेत लौटानी होगी रकम

दिल्ली हाई कोर्ट ने कर्मचारी जीत सिंह की याचिका को पूरी तरह स्वीकार करते हुए दिल्ली सरकार के डिमांड नोटिस को क्वैश (रद्द) कर दिया है। कोर्ट ने निर्देश दिए कि पीड़ित कर्मचारी को इलाज के वास्तविक खर्च की पूरी राशि यानी ₹1,89,324 का भुगतान सुनिश्चित किया जाए। सरकार द्वारा रिकवरी के नाम पर कर्मचारी की सैलरी से जो भी पैसा काटा गया था, उसे 6% प्रति वर्ष के साधारण ब्याज (Simple Interest) के साथ वापस लौटाया जाए। जिला अदालत को इस आदेश का पालन करने और पैसे रिफंड करने के लिए 8 हफ्ते (दो महीने) का समय दिया गया है।

विश्लेषण: सरकारी कर्मचारियों के मेडिकल राइट्स पर बड़ा आदेश

यह फैसला देश के उन लाखों सरकारी कर्मचारियों (Central & State Government Employees) के लिए एक नजीर है, जिन्हें ‘सेंट्रल सर्विसेज (मेडिकल अटेंडेंस) रूल्स, 1944’ के तहत मेडिकल बेनिफिट्स मिलते हैं, लेकिन वित्त विभाग के पुराने नियमों के चलते वे परेशान होते हैं।

सरकारी विभाग का रवैयादिल्ली हाई कोर्ट का सुरक्षा कवच
सरकारी नियम: अस्पताल चाहे जो भी बिल बनाए, हम सरकारी नोटिफिकेशन (चाहे वह कितना भी पुराना हो) के तय रेट के हिसाब से ही पैसा देंगे।अदालत का नियम: आपातकालीन स्थिति में अस्पताल का वास्तविक खर्च (Actual Expenditure) सर्वोपरि है। पुराने रेट कार्ड्स के आधार पर नागरिकों के स्वास्थ्य के अधिकार को सीमित नहीं किया जा सकता।
प्रशासनिक रवैया: क्लेम में अंतर होने पर कर्मचारी को ही दोषी मानकर उसकी सैलरी से रिकवरी शुरू कर देना।अदालत का नियम: बिना किसी ठोस सबूत के कर्मचारी पर धोखाधड़ी का आरोप लगाना और सैलरी काटना पूरी तरह अवैध और मानसिक प्रताड़ना है।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

दिल्ली हाई कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला वेलफेयर स्टेट (कल्याणकारी राज्य) की मूल भावना को याद दिलाता है। सरकार का काम अपने कर्मचारियों के संकट के समय उनके साथ खड़ा होना है, न कि मुंशी की तरह दशकों पुराने नियमों की फाइलें खोलकर उनके पैसों की कटौती करना। अदालत ने साफ कर दिया है कि जीवन रक्षा का अधिकार और स्वास्थ्य का अधिकार किसी भी प्रशासनिक रेट-सीलिंग से कहीं अधिक बड़ा और संवैधानिक है।

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