Thursday, October 15, 2026
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Conman Sukesh: सुप्रीम कोर्ट के जज का फर्जी रूप धारण करने वाले महाठग सुकेश चंद्रशेखर; तीस हजारी कोर्ट से आया फैसला, इसे जरूर पढ़ें

मुख्य बिंदु (Key Indicators)

  • घटना का ब्योरा: अप्रैल 2017 में सुकेश पुलिस हिरासत में था। उसने पुलिस कांस्टेबल मंजीत के मोबाइल का इस्तेमाल कर विशेष जज पूनम चौधरी के आधिकारिक लैंडलाइन और मोबाइल पर कॉल किया। पहले खुद को सुप्रीम कोर्ट जज का पीए बताया, फिर दूसरे व्यक्ति ने जज बनकर गृह मंत्रालय और कॉलेजियम का हवाला देते हुए सुकेश को तुरंत जमानत देने का निर्देश दिया।
  • सत्यापन से खुला पोल: संबंधित महिला जज ने संदेह होने पर सीधे सुप्रीम कोर्ट संपर्क किया, जहां पता चला कि ऐसा कोई फोन नहीं किया गया था और न ही उस नाम का कोई सचिव वहां कार्यरत है।
  • दिल्ली पुलिस की ढीली जांच पर फटकार: कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की जांच को “अत्यंत सतही, लापरवाह और उदासीन” करार दिया। पुलिस न तो फोन बरामद कर सकी, न ही क्राइम ब्रांच का सीसीटीवी फुटेज हासिल कर पाई।
  • कांस्टेबल की भूमिका पर दोबारा जांच का आदेश: कोर्ट ने कहा कि पुलिस कांस्टेबल मंजीत केवल पीड़ित नहीं था, बल्कि उसने सुकेश को फोन उपलब्ध कराया हो सकता है। पुलिस आयुक्त (CP) या संबंधित DCP को निर्देश दिया गया कि वे कांस्टेबल की भूमिका की फिर से जांच करें।

नई दिल्ली: दिल्ली की तीस हजारी अदालत ने बहुचर्चित ठग सुकेश चंद्रशेखर को जमानत पाने के इरादे से सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा न्यायाधीश का फर्जी रूप धारण करने (Impersonation) और एक न्यायिक अधिकारी को धमकाने के मामले में दोषी ठहराया है।

तीस हजारी कोर्ट की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) हर्षिता मिश्रा ने सुकेश चंद्रशेखर को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 170 (लोक सेवक का प्रतिरूपण), धारा 189 (लोक सेवक को चोट पहुंचाने की धमकी) और धारा 507 (गुमनाम संचार द्वारा आपराधिक धमकी) के तहत दोषी पाया। इसके साथ ही अदालत ने हिरासत में सुकेश को फोन मुहैया कराने में दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल की भूमिका की नए सिरे से जांच करने का आदेश दिया। अदालत ने इस पूरे कृत्य को सुकेश द्वारा रचा गया एक “हास्यास्पद नाट्य मंचन” (Absurd Theatrical Production) करार दिया।

अदालत की सख्त और दार्शनिक टिप्पणियां

पीठ ने न्यायिक प्रणाली को प्रभावित करने के दुस्साहस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा: “अपने इस बेहद बेतुके नाट्य मंचन में, जहां उसने चल रही न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करने के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय के एक मौजूदा जज का रूप धारण किया, उसने न केवल सीमा लांघी, बल्कि उसने संस्थागत अतिक्रमण के दायरे में घातक छलांग लगा दी। उसने गलत मान लिया था कि न्यायपालिका उसके अन्य कॉर्पोरेट लक्ष्यों की तरह चुपचाप झुक जाएगी। फोन स्क्रीन के पीछे से गैर-मौजूद न्यायिक ताकत दिखाने की कोशिश में उसने अपने ही ताश के महल को ढहा दिया।”

अदालती फैसलों की शुचिता पर अदालत ने कहा: “अदालत के आदेश कोर्ट रूम में पारित किए जाते हैं, गुप्त टेलीफोन कॉलों पर निर्देशित नहीं होते। न्यायिक विवेक न्यायिक रिकॉर्ड के आधार पर तय होता है, फोन करने वाले के पद या दर्जे के आधार पर नहीं। न्याय के मंदिर में पिछले दरवाजे (धोखे, धमकी या फर्जी अधिकार) से प्रवेश नहीं किया जा सकता।”

मामले की पृष्ठभूमि और फर्जी कॉल की घटना (अप्रैल 2017)

  • पुलिस हिरासत में कॉल: अप्रैल 2017 में सुकेश भ्रष्टाचार के एक मामले में पुलिस हिरासत में था, जिसकी सुनवाई विशेष जज पूनम चौधरी की अदालत में चल रही थी।
  • सुप्रीम कोर्ट के जज के नाम से धमकी: सुकेश ने कांस्टेबल मंजीत के मोबाइल फोन का उपयोग करके संबंधित जज के लैंडलाइन और निजी मोबाइल पर कॉल किया। पहले कॉलर ने खुद को सुप्रीम कोर्ट के एक जज (जिन्हें फैसले में ‘KJ’ कहा गया) का निजी सचिव बताया। फिर दूसरे व्यक्ति ने जज बनकर बात की और दावा किया कि वह गृह मंत्रालय और सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम की ओर से बात कर रहा है।
  • जमानत देने का दबाव: कॉलर ने जज को सुकेश को तुरंत नियमित या अंतरिम जमानत देने का निर्देश दिया और ऐसा न करने पर गंभीर पेशेवर परिणाम भुगतने की धमकी दी।
  • सच्चाई का खुलासा: जज ने सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री से संपर्क किया, जहां पुष्टि हुई कि ऐसा कोई कॉल नहीं किया गया था और जिस नाम से निजी सचिव का दावा किया गया था, वह व्यक्ति वहां कार्यरत ही नहीं था।

दिल्ली पुलिस की ‘लापरवाह’ जांच पर अदालत की फटकार

अदालत ने जहां साक्ष्यों और कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDR) के आधार पर सुकेश को दोषी ठहराया, वहीं दिल्ली पुलिस की जांच प्रक्रिया की तीखी आलोचना की:

  • जांच में गंभीर खामियां: पुलिस मोबाइल फोन जब्त करने, क्राइम ब्रांच परिसर की सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने और महत्वपूर्ण गवाहों की समय पर जांच करने में पूरी तरह विफल रही।
  • कांस्टेबल की भूमिका की जांच का आदेश: अदालत ने कहा कि परिस्थितियां दर्शाती हैं कि कांस्टेबल मंजीत केवल एक पीड़ित नहीं था जिसका फोन इस्तेमाल हुआ, बल्कि उसने जानबूझकर फोन उपलब्ध कराया हो सकता है।
  • वर्दी ढाल नहीं बन सकती: अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस की वर्दी किसी जांच के खिलाफ ढाल नहीं बन सकती। पुलिस कमिश्नर या संबंधित डीसीपी को निर्देश दिया गया कि वे कांस्टेबल की भूमिका की नए सिरे से जांच करें और तय करें कि क्या कोई नई विभागीय या आपराधिक कार्यवाही बनती है।

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अदालत की सख्त टिप्पणियां

तीस हजारी कोर्ट की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट हर्षिता मिश्रा ने फैसले में कहा: “यह सुकेश का सबसे हास्यास्पद थियेट्रिकल प्रोडक्शन (Absurd Theatrical Production) था, जिसमें उसने एक चालू न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज का स्वांग रचा। उसने केवल सीमा पार नहीं की, बल्कि संस्थागत मर्यादा को पूरी तरह लांघ दिया। सुकेश को लगा कि झूठ जितना बड़ा होगा, कानून का शासन अपना सिर झुका लेगा। लेकिन अदालतें बंद कमरों में कानून के आधार पर आदेश देती हैं, किसी गुप्त फोन कॉल के आधार पर नहीं।”

अदालती जिरह में इन वकीलों ने की पैरवी

राज्य सरकार (अभियोजन) की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक अमित यादव पेश हुए, जबकि दोषी सुकेश चंद्रशेखर की ओर से अधिवक्ता प्रवीण डबास ने पक्ष रखा। अदालत ने कहा कि पुलिस की जांच में खामियों के बावजूद रिकॉर्ड पर मौजूद अकाट्य साक्ष्य सुकेश के अपराध को पूरी तरह साबित करते हैं।

Conman Sukesh: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)

विवरणजानकारी
मामला/केससुप्रीम कोर्ट जज की फर्जी पहचान बनाकर जमानत की मांग करना (2017)
संबंधित अदालततीस हजारी कोर्ट, दिल्ली (Tis Hazari Courts, Delhi)
पीठासीन न्यायाधीशमुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट हर्षिता मिश्रा (CJM Harshita Mishra)
मुख्य आरोपीसुकेश चंद्रशेखर
अदालत का फैसलाIPC की धारा 170, 189 और 507 के तहत दोषी करार; पुलिस की ढिलाई पर जांच का निर्देश।
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