Friday, July 31, 2026
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Case Disposal: हम वकीलों से दुश्मनी नहीं मोल लेना चाहते, वे हमारे दोस्त हैं… और फिर तारीख-पर-तारीख वाले केस का रोचक जिरह पूरी तरह पढ़ डालें

Case Disposal: देश की अदालतों में मुकदमों की सुस्त रफ्तार और बार-बार मिलने वाली तारीख-पर-तारीख को नियंत्रित करने के लिए गाइडलाइंस बनाने की मांग वाली एक जनहित याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस वी. मोहाना की पीठ ने संक्षिप्त सुनवाई के बाद याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अदालतें इस तरह के नियम बनाकर वकीलों के साथ अपने संबंधों को खराब नहीं करना चाहतीं। बेंच ने हल्के-फुल्के लेकिन स्पष्ट लहजे में कहा, नहीं भाई, हम वकीलों से दुश्मनी नहीं मोल लेना चाहते। वकील हमारे दोस्त हैं।

सुनवाई की शुरुआत: एडवोकेट बैंड पर कोर्ट की आपत्ति

सुनवाई की शुरुआत में ही कोर्ट का ध्यान याचिकाकर्ता के पहनावे पर गया। याचिकाकर्ता स्वयं एक वकील थे और अपनी याचिका की पैरवी व्यक्तिगत रूप से (In-Person) कर रहे थे, लेकिन उन्होंने गले में वकीलों वाला एडवोकेट बैंड पहन रखा था।

जस्टिस नाथ का सवाल: आपने याचिकाकर्ता के रूप में पेश होते हुए एडवोकेट बैंड क्यों पहना है?

याचिकाकर्ता का जवाब: “हुजूर, एक वकील केवल तभी बैंड पहन सकता है जब वह किसी मुवक्किल की तरफ से कोर्ट में वकालत कर रहा हो, खुद अपनी याचिका के लिए पेश होते समय नहीं।”

कोर्ट का तंज: जब याचिकाकर्ता ने कहा कि उन्हें इस नियम की जानकारी नहीं थी, तो जस्टिस नाथ ने टिप्पणी की, “लेकिन आपको यह बखूबी पता है कि पूरी न्यायिक व्यवस्था को कैसे चलना चाहिए, स्थगन कैसे दिए जाने चाहिए और इसके लिए क्या पॉलिसी बननी चाहिए। अपनी मांगी गई राहतों को तो देखिए। जस्टिस नाथ ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वे इन सुधारों के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI), स्टेट बार काउंसिल या विभिन्न बार एसोसिएशनों के पास जाएं।

याचिकाकर्ता की मांगें क्या थीं? (तारीख-पर-तारीख पर लगाम की कोशिश)

याचिकाकर्ता ने अपनी रिट याचिका के माध्यम से भारतीय अदालतों की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए तीन मुख्य मांगें रखी थीं।

स्थगन (Adjournments) पर सख्त गाइडलाइंस: कोर्ट में तारीख केवल असाधारण और बेहद जरूरी (Bona fide) परिस्थितियों में ही दी जाए। हर स्थगन के लिए जज को लिखित में विस्तृत कारण (Written Reasons) दर्ज करने होंगे। केस में अब तक दोनों पक्षों को कुल कितनी तारीखें मिल चुकी हैं, इसका रिकॉर्ड दोनों पक्षों को डिस्क्लोज किया जाए। बेवजह तारीख मांगने वाले पक्ष पर भारी और दंडात्मक हर्जाना (Deterrent Costs) लगाया जाए। सीपीसी (CPC) और नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के तहत स्थगन से जुड़े नियमों को कड़ाई से लागू किया जाए।

मामलों के निपटारे के लिए समय-सीमा (Time-Bound Disposal): मुकदमों की श्रेणी के हिसाब से उनके निपटारे के लिए एक बाहरी समय-सीमा (Outer Timeline) तय हो। मुकदमे की शुरुआत में ही केस मैनेजमेंट की अनिवार्य सुनवाई हो। तय समय-सीमा से ज्यादा देरी होने पर जजों को इसका लिखित कारण बताना पड़े।

यूनिफॉर्म नेशनल केस फ्लो मैनेजमेंट पॉलिसी: पूरे देश की अदालतों के लिए एक समान ‘केस फ्लो मैनेजमेंट पॉलिसी’ बने। गंभीर और उपयुक्त मामलों में लगातार और रोजाना (Day-to-Day) सुनवाई हो। सालों से लंबित और पुराने मुकदमों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाया जाए।

कानूनी व व्यावहारिक विश्लेषण: ‘बार’ और ‘बेंच’ के बीच का संतुलन

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न्यायशास्त्र (Jurisprudence) के उस व्यावहारिक पहलू को रेखांकित करता है जहां अदालती सुधारों को थोपने के बजाय वकीलों और जजों के बीच आपसी तालमेल (Bar & Bench Harmony) को ज्यादा तरजीह दी जाती है।

याचिकाकर्ता का दृष्टिकोण (सैद्धांतिक)सुप्रीम कोर्ट का रुख (व्यावहारिक)
सुधारों की जरूरत: अदालतों में लंबित करोड़ों मुकदमों और बार-बार तारीख मिलने से आम जनता परेशान है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को कड़े दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए।स्वायत्तता और व्यावहारिक दिक्कतें: न्याय व्यवस्था केवल आदेशों से नहीं, बल्कि वकीलों के सहयोग से चलती है। वकीलों की अपनी व्यावहारिक मजबूरियां होती हैं (जैसे एक ही दिन दो अदालतों में केस होना), जिन पर जबरन प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।
सिस्टम पर नियंत्रण: जजों और वकीलों की जवाबदेही तय करने के लिए सख्त नियमावली और समय-सीमा अनिवार्य है।बार काउंसिलों का क्षेत्र: यह काम सीधे अदालत का नहीं है। वकीलों के नियमन और न्यायिक सुधारों के प्रस्तावों के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और बार एसोसिएशन ही सही मंच हैं।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

हालांकि याचिकाकर्ता के सुझाव देश की कानूनी व्यवस्था में सुस्ती (Delay) को दूर करने के लिए काफी व्यावहारिक और नेक नीयत वाले प्रतीत होते हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि वह न्यायपालिका के दूसरे सबसे मजबूत स्तंभ वकीलों (The Bar) की मर्जी और सहमति के बिना उन पर ऐसे कड़े प्रशासनिक नियम नहीं थोपना चाहता। अदालत का मानना है कि ‘तारीख-पर-तारीख’ की बीमारी को कड़े कानूनों या हर्जाने से ज्यादा, बार और बेंच के आपसी सहयोग और समझदारी से ही सुधारा जा सकता है।

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