अदालत की मुख्य टिप्पणियां
- CJI की टिप्पणी – जनहित बनाम AI दुरुपयोग:शुरुआत में CJI सूर्यकांत ने पूछा कि जब वीडियो फर्जी (AI जनित) नहीं है और वास्तविक सुनवाई का है, तो छिपाने की आवश्यकता क्यों है:“यदि आप खुले कोर्ट में इतनी निडरता से अपने शब्दों का प्रयोग कर सकते हैं, तो अब क्यों छिपना चाहते हैं? आपने यह नहीं कहा कि उन्होंने आपकी छवि खराब करने के लिए AI या किसी फर्जी तकनीक का उपयोग किया है।” — CJI सूर्यकांत
- कानूनी उपचार (Legal Remedies) का उपयोग:न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची ने कहा कि याचिकाकर्ता ने सीधे सुप्रीम कोर्ट आने से पहले उपलब्ध वैधानिक उपायों का पूरा उपयोग नहीं किया है:“यह एक समय से पहले (Premature) दायर की गई याचिका है। IT अधिनियम की धारा 69A के तहत जब कानून घोषित हो जाता है, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए इसका उल्लंघन करना प्रतिबंधित है। यदि वे टेकडाउन नोटिस का पालन नहीं करते हैं, तब आप हमारे पास आ सकते हैं।” — न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग (Live Streaming), सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बहस की ऑडियो-वीडियो क्लिप्स के प्रसार और आईटी नियमों के तहत ‘टेकडाउन’ (Takedown/सामग्री हटाने) की निर्धारित प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण विधिक रुख अपनाया है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने याचिका को ‘समयपूर्व’ (Premature) करार देते हुए वकील को स्वतंत्रता (Liberty) दी कि यदि सेवा प्रदाता उसके हटाने के अनुरोध का अनुपालन नहीं करते हैं, तब वह अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। शीर्ष अदालत ने एक वकील द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (X, Google, Meta) और डिजिटल समाचार पोर्टलों के खिलाफ दायर याचिका पर सीधे कोई निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को पहले सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) और मध्यवर्ती दिशानिर्देशों के तहत संबंधित सोशल मीडिया कंपनियों के पास अपनी टेकडाउन शिकायत दर्ज करानी चाहिए।
शीर्ष अदालत की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
1. खुली अदालत में बहस और छिपने की प्रवृत्ति पर मुख्य न्यायाधीश का सवाल याचिकाकर्ता द्वारा वीडियो हटाए जाने की मांग पर मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने मौखिक रूप से तीखी टिप्पणी की: “यदि आप इतने साहसी हैं कि खुली अदालत में अनुचित शब्दों का चयन कर सकते हैं और इस प्रकार की बहस कर सकते हैं, तो अब आप छिपना (Hide) क्यों चाहते हैं और कतरा क्यों रहे हैं? आपने यह आरोप नहीं लगाया है कि समाचार पोर्टलों ने आपकी छवि खराब करने के लिए सामग्री में कोई हेरफेर (Doctored) किया है या AI (डीपफेक) का उपयोग किया है।”
- पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालती कार्यवाही का व्यावसायिक दोहन या अदालत के आदेश का उल्लंघन अदालत की अवमानना (Contempt) के दायरे में आ सकता है, लेकिन जब तक शब्दों को विकृत या फर्जी न किया गया हो, तब तक इसे गंभीर आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता।
2. वैकल्पिक उपचार की अनिवार्यता (Exhaustion of Legal Remedies) न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची ने डिजिटल डोमेन में उपलब्ध विधिक प्रक्रियाओं पर जोर देते हुए कहा: “यह क्षति व्यक्तिगत स्वरूप (In personam damage) की है। सेवा प्रदाताओं (सोशल मीडिया बिचौलियों) के पास पहले टेकडाउन के कदम उठाएं। यदि वे आपके टेकडाउन अनुरोधों का अनुपालन नहीं करते हैं, तब हमारे पास आइए। आपको अपने कानूनी उपचारों को पहले आजमाना (Exhaust) होगा। कानून डिजिटल डोमेन में अस्वीकार्य प्रकाशनों के संबंध में स्पष्ट उपाय प्रदान करता है। यह याचिका समयपूर्व (Premature) है।”
3. ‘हर्षिता ग्रोवर’ फैसले की रोक और आईटी एक्ट की धारा 69A
- जब वकील के वकील ने तर्क दिया कि हर्षिता ग्रोवर मामले में अदालती क्लिपिंग साझा करने पर रोक 24 जुलाई से लगाई गई थी, जबकि उनकी सुनवाई 2 जुलाई की थी, तो न्यायमूर्ति बागची ने स्पष्ट किया:
- अदालत ने जानबूझकर सोशल मीडिया मध्यवर्तियों के खिलाफ अलग से आदेश जारी नहीं किया था, क्योंकि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A और मध्यवर्ती नियम पहले से ही इस स्थिति का ध्यान रखते हैं।
- जब सुप्रीम कोर्ट कानून की घोषणा करता है, तो वह मध्यवर्तियों द्वारा प्रकाशन और प्रसार पर स्वतः एक विधिक निषेध बन जाता है। उसके उल्लंघन पर पीड़ित व्यक्ति को संबंधित प्लेटफॉर्म्स को औपचारिक नोटिस देना अनिवार्य है।
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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (पिता की जमानत में बार लाइसेंस की पेशकश)
- विवाद की उत्पत्ति: याचिकाकर्ता वकील ने अपने पिता की जमानत के लिए अदालत के समक्ष जमानतदार (Surety) के रूप में अपना ‘बार लाइसेंस’ (Bar Council License) प्रस्तुत करने की असामान्य पेशकश की थी। खुली अदालत में उनके तर्कों और आचरण की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग सोशल मीडिया और समाचार पोर्टलों पर तेजी से वायरल हो गई।
- याचिका में मांगी गई राहत: वकील ने एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड विशाल अरुण मिश्रा के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की:
- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (‘X’, Google, Meta) और डिजिटल समाचार पोर्टलों को उसकी पेशी से संबंधित सभी पोस्ट, वीडियो और क्लिप्स तुरंत हटाने/डिलीट करने का निर्देश दिया जाए।
- अदालती कार्यवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग को डार्क वेब (Dark Web) या अनधिकृत चैनलों पर लीक होने से रोकने के लिए स्थायी नियामक उपाय किए जाएं।
- देश भर की अदालतों की वीडियो क्लिपिंग्स को सोशल मीडिया से सामूहिक रूप से हटाने का व्यापक आदेश दिया जाए।
- देशव्यापी क्लिप्स हटाने की प्रार्थना खारिज: अदालत ने देश भर की सभी न्यायिक कार्यवाहियों की क्लिप्स हटाने के सामान्य निर्देश देने की मांग को सिरे से अस्वीकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
- सीधे आदेश से इनकार: सर्वोच्च न्यायालय ने समाचार पोर्टलों और सोशल मीडिया मध्यवर्तियों के खिलाफ सीधे रिट जारी करने से इनकार कर दिया।
- बिचौलियों के पास जाने की छूट: याचिकाकर्ता को संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (मध्यवर्तियों) के समक्ष आईटी नियमों के तहत सामग्री हटाने (Takedown) का औपचारिक आवेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी गई।
- पुनः अदालत आने की अनुमति: अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि सोशल मीडिया मध्यवर्ती वैधानिक सूचना और अदालत के पूर्व दिशा-निर्देशों के बावजूद क्लिप्स हटाने से इनकार करते हैं या शिकायत का समाधान नहीं होता है, तो वह पुनः सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: अदालती लाइव स्ट्रीमिंग क्लिप्स टेकडाउन याचिका [सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स एवं समाचार पोर्टल विवाद]
- प्रासंगिक कानून: सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69A एवं धारा 79 (मध्यवर्ती संरक्षण और सेफ हार्बर की शर्तें); सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021; भारत का संविधान – अनुच्छेद 19(1)(a), अनुच्छेद 21 एवं अनुच्छेद 32
- संबद्ध न्यायिक नजीर:
- स्वप्निल त्रिपाठी बनाम सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया (2018) — ‘अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग के दिशा-निर्देश’
- हर्षिता ग्रोवर वाद — ‘अदालत कक्ष की कार्यवाहियों की अनधिकृत व सनसनीखेज सोशल मीडिया क्लिपिंग्स पर रोक’
- विधिक प्रतिनिधित्व: एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AoR) विशाल अरुण मिश्रा (याचिकाकर्ता की ओर से)
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (सर्वोच्च न्यायालय)
Live Streaming: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ (Bench) | CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| याचिकाकर्ता की मांग | ‘X’, गूगल, मेटा और न्यूज पोर्टलों से अदालती सुनवाई के वीडियो हटाने और डार्क वेब पर प्रसार रोकने का निर्देश। |
| मुख्य कानूनी आधार | सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A (IT Act Section 69A) और हर्षिता ग्रोवर मामला। |
| अदालत का फैसला | याचिका अपरिपक्व (Premature); याचिकाकर्ता पहले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से संपर्क करे, समाधान न होने पर अदालत आ सकता है। |

