Pipra Ghat Funeral Ground: मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार केवल जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मृत्यु के बाद भी जारी रहता है। हर व्यक्ति का यह मौलिक अधिकार है कि मृत्यु के बाद उसका अंतिम संस्कार पूरे सम्मान और उचित आदर के साथ किया जाए।”
लखनऊ के एक सार्वजनिक श्मशान घाट पर स्थिति भयावह
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अब्धेश कुमार चौधरी की पीठ ने एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए लखनऊ के प्रशासनिक अधिकारियों को श्मशान घाट की तत्काल मरम्मत और कायाकल्प करने का आदेश दिया है। लखनऊ के एक सार्वजनिक श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार के बाद इंसानी अवशेषों (अस्थियों/अधजले शवों) को लावारिस पशुओं द्वारा नुकसान पहुंचाए जाने की रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है।
क्या था पूरा मामला? (पिपरा घाट श्मशान भूमि की भयावह हकीकत)
मामला: यह मामला लखनऊ छावनी (Cantonment) क्षेत्र में स्थित ‘पिपरा घाट श्मशान भूमि’ से जुड़ा है। स्थानीय नागरिक शिव गुप्ता द्वारा दायर जनहित याचिका में श्मशान घाट की बदहाली का जिक्र करते हुए कोर्ट के सामने बेहद चौंकाने वाले और विचलित करने वाले तथ्य रखे गए।
बाउंड्री वॉल न होने का नतीजा: श्मशान घाट की बाउंड्री वॉल (चारदीवारी) पूरी तरह टूटी हुई है। इसके चलते बंदर, आवारा कुत्ते और गाय-भैंसें आसानी से श्मशान के भीतर घूमते रहते हैं और वहां गंदगी फैलाते हैं।
शवों की बेअदबी (भयावह दावा): याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि जब मृतक के परिजन मुखाग्नि देने के बाद (लकड़ियों के जलते रहने के दौरान ही) वहां से चले जाते हैं, तो बाउंड्री न होने के कारण आवारा जानवर वहां पहुंच जाते हैं। ये जानवर जलती चिताओं से “इंसानी अवशेषों और अधजले अंगों को नोचते हैं, चाटते हैं और उन्हें यहां-वहां बिखेर देते हैं।”
बुनियादी सुविधाओं का अभाव: इस प्रमुख श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार में शामिल होने आने वाले लोगों के लिए पीने के पानी की व्यवस्था, शौचालय (वॉशरुम) या बैठने के लिए कोई शेड तक नहीं है।
हाई कोर्ट का आदेश: 4 हफ्ते के भीतर लाएं आधुनिक श्मशान का टेंडर
निंदा: इस भयावह और अमानवीय स्थिति पर गहरी चिंता और नाराजगी व्यक्त करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि यह मामला बेहद गंभीर है और इसमें तुरंत सुधारात्मक कदम उठाने की जरूरत है। अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले ‘गरिमापूर्ण अंतिम संस्कार के मौलिक अधिकार’ का सीधा उल्लंघन माना। सुनवाई के दौरान जब कैंटोनमेंट बोर्ड के वकील ने कोर्ट को बताया कि वहां एक ‘आधुनिक श्मशान घाट’ (Modern Crematorium) बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिल चुकी है, तो पीठ ने कड़े निर्देश जारी किए।
तत्काल टेंडर: कोर्ट ने आदेश दिया कि आधुनिक श्मशान घाट के निर्माण के लिए 4 सप्ताह के भीतर हर हाल में टेंडर जारी कर दिया जाए।
तात्कालिक राहत: जब तक नया कॉम्प्लेक्स नहीं बनता, तब तक वर्तमान में चल रहे श्मशान घाट पर पीने के पानी और बुनियादी स्वच्छता की व्यवस्था तुरंत सुनिश्चित की जाए और बाउंड्री वॉल की मरम्मत हो, ताकि जानवरों के प्रवेश को रोका जा सके।
विश्लेषण: अनुच्छेद 21 और मृत शरीर के अधिकार
भारतीय न्यायशास्त्र (Jurisprudence) में यह सिद्धांत पूरी तरह स्थापित है कि कानूनन एक शव (Dead Body) के भी अपने अधिकार होते हैं, जिन्हें राज्य को सुरक्षित रखना होता है।
| कोर्ट का सैद्धांतिक रुख (अनुच्छेद 21) | जमीनी हकीकत (प्रशासनिक लापरवाही) |
| मृत्यु के बाद गरिमा: सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट्स ने बार-बार कहा है कि ‘Right to Life’ (जीने का अधिकार) में सम्मानजनक तरीके से अंतिम संस्कार पाने का हक भी शामिल है। | संवेदनहीनता: राजधानी लखनऊ के बीचों-बीच स्थित एक बड़े श्मशान घाट पर बाउंड्री वॉल तक न होना प्रशासन की घोर संवेदनहीनता और लापरवाही को उजागर करता है। |
| पवित्रता की रक्षा: अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया और उस स्थान की पवित्रता को बनाए रखना स्थानीय नगर निकायों/बोर्ड की वैधानिक जिम्मेदारी है। | धार्मिक और मानवीय ठेस: शवों के अवशेषों को जानवरों द्वारा गरिमाविहीन तरीके से नोचा जाना, अंतिम संस्कार करने आए दुखी परिजनों की धार्मिक भावनाओं और मानवीय संवेदनाओं पर गहरी चोट है। |
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह दखल इस बात की याद दिलाता है कि विकास की बड़ी-बड़ी बातों के बीच समाज के सबसे बुनियादी और संवेदनशील हिस्सों की अनदेखी नहीं की जा सकती। अदालत ने साफ संदेश दिया है कि प्रशासनिक अमला केवल जीवित नागरिकों के प्रति ही जवाबदेह नहीं है, बल्कि इस मिट्टी से विदा हो चुके इंसानों की आख़िरी गरिमा की रक्षा करना भी उसी की संवैधानिक जिम्मेदारी है। लखनऊ प्रशासन को अब अगले 4 हफ्तों में पिपरा घाट की सूरत बदलने के लिए कागजी कार्रवाई से आगे बढ़कर जमीन पर काम दिखाना होगा।

