Veerappan Interview: करीब तीन दशक (30 साल) पुराने मानहानि के एक हाई-प्रोफाइल मामले में मद्रास हाई कोर्ट ने तमिल सिनेमा की मशहूर अभिनेत्री आर. सुकन्या (R Sukanya) के पक्ष में एक ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है।
निचली अदालत का आदेश बरकरार रखा
हाईकोर्ट के जस्टिस के. कुमारेश बाबू की सिंगल बेंच ने 5 जून को दिए अपने फैसले में साफ कहा कि चूंकि ब्रॉडकास्टर (सन टीवी) के पास कार्यक्रम को प्रसारित करने से पहले उसे एडिट (संपादित) करने की पूरी शक्ति थी, इसलिए यह उसकी कानूनी जिम्मेदारी थी कि वह चंदन तस्कर और डकैत वीरप्पन (Veerappan) द्वारा लगाए गए मानहानिकारक और झूठे आरोपों को हटाता या उनकी पुष्टि करता। कोर्ट ने सन टीवी नेटवर्क लिमिटेड (Sun TV Network Limited) की अपील को खारिज करते हुए उस पर 10.01 लाख रुपये का हर्जाना (Damages) देने का निचली अदालत का आदेश बरकरार रखा है।
क्या था पूरा मामला? (1996 का वो विवादित इंटरव्यू)
मामला: यह पूरा विवाद साल 1996 के आम चुनावों से ठीक पहले का है, जिसने उस दौर में देश की राजनीति और फिल्म इंडस्ट्री में तूफान ला दिया था।
‘नेरुक्कू नेर’ (फेस टू फेस) कार्यक्रम: 17 अप्रैल 1996 को सन टीवी पर वीरप्पन का एक इंटरव्यू प्रसारित किया गया था। यह इंटरव्यू ‘नक्कीरन’ (Nakkheeran) मैगजीन के संपादक आर.आर. गोपाल ने रिकॉर्ड किया था।
क्या थे सुकन्या पर आरोप: इस इंटरव्यू के दौरान वीरप्पन ने दावा किया था कि अभिनेत्री सुकन्या के देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के बेटे के साथ नाजायज संबंध हैं। वीरप्पन ने यह भी आरोप लगाया था कि इस संबंध का एक वीडियो टेप भी मौजूद है, जिसका इस्तेमाल 1996 के चुनावों में राजनीतिक सौदेबाजी (Political Bargaining) के लिए किया जा रहा था।
सुकन्या का कानूनी संघर्ष: सुकन्या ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे पूरी तरह झूठ, मनगढ़ंत और उनकी गरिमा व मान-प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाला बताया। उन्होंने कहा कि इस टेलीकास्ट की वजह से उनके करियर और मानसिक स्थिति पर बेहद बुरा असर पड़ा। हालांकि उन्होंने अपने नुकसान का आकलन 1 करोड़ रुपये से अधिक किया था, लेकिन कोर्ट में उन्होंने अपने दावे को 10,00,500 रुपये तक सीमित रखा।
एडिट करने की ताकत थी, तो जिम्मेदारी से कैसे बच सकते हैं?: हाई कोर्ट
दलील: सन टीवी ने हाई कोर्ट में दलील दी थी कि उन्होंने खुद यह इंटरव्यू रिकॉर्ड नहीं किया था, बल्कि नक्कीरन मैगजीन से लेकर सिर्फ इसे प्रसारित (Broadcast) किया था। चैनल ने यह भी तर्क दिया कि सुकन्या का करियर इस शो के बाद भी चलता रहा, इसलिए उनकी प्रतिष्ठा को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। हाई कोर्ट ने सन टीवी के इन सभी तर्कों को खारिज करते हुए एडिटोरियल कंट्रोल (संपादकीय नियंत्रण) पर बेहद महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत तय किया।
कांट्रैक्ट की शर्तों का हवाला: कोर्ट ने पाया कि सन टीवी और नक्कीरन के बीच हुए समझौते में साफ लिखा था कि सन टीवी के पास कार्यक्रम के किसी भी हिस्से को काटने, छांटने, बदलने या हटाने का ‘असीमित अधिकार’ था।
सत्यापन का कर्तव्य (Duty to Verify): जज ने कहा कि जब आपके पास इतनी व्यापक संपादकीय शक्तियां थीं, तो प्रसारण से पहले सामग्री की सत्यता जांचना आपका कर्तव्य था। सन टीवी ने न तो सुकन्या से कोई स्पष्टीकरण मांगा और न ही किसी तीसरे पक्ष से जांच कराई।
कॉमर्शियल फायदा: कोर्ट ने यह भी नोट किया कि सन टीवी ने इस सनसनीखेज इंटरव्यू के दौरान विज्ञापनों (Advertisements) के जरिए भारी व्यावसायिक मुनाफा कमाया था, इसलिए वह इसके परिणामों से पल्ला नहीं झाड़ सकता।
माफीनामे के तरीके पर भी कोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल
सन टीवी ने कोर्ट में यह भी दलील दी थी कि उन्होंने बाद में एक तमिल पत्रिका में इस घटना को लेकर ‘खेद’ (Regret) प्रकट कर दिया था। अदालत ने इस पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, अगर चैनल ने अपने ही टीवी स्क्रीन पर माफी या खेद प्रसारित किया होता, तो वह उन्हीं दर्शकों तक पहुंचता जिन्होंने उस विवादित इंटरव्यू को देखा था। लेकिन चैनल ने अपनी गलती सुधारने के लिए अपने प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल न करके एक तीसरे पक्ष के तमिल दैनिक/मैगजीन को चुना, जिसकी पहुंच टीवी दर्शकों जितनी नहीं थी। यह कृत्य चैनल की दुर्भावना (Malice) को दर्शाता है।
विश्लेषण: मीडिया घरानों और ब्रॉडकास्टर्स के लिए इस फैसले का सबक
| कानूनी और नैतिक पहलू | मद्रास हाई कोर्ट का रुख और इसका प्रभाव |
| सिर्फ ‘कैरियर चालू रहने’ से मानहानि कम नहीं होती | कोर्ट ने कहा कि सुकन्या का फिल्मी करियर बाद में भी जारी रहना उनकी स्थापित प्रतिष्ठा को दिखाता है, इसका मतलब यह नहीं कि उन पर लगे कीचड़ से उन्हें मानसिक और सामाजिक ठेस नहीं पहुंची। |
| ‘प्लेटफॉर्म’ की जिम्मेदारी तय | यह फैसला सोशल मीडिया और आज के न्यूज चैनलों के दौर में बहुत बड़ा है। आप यह कहकर नहीं बच सकते कि “बयान हमारा नहीं था, हमने तो सिर्फ दिखाया था।” अगर आप दिखा रहे हैं, तो जिम्मेदारी आपकी है। |
| स्थायी रोक (Permanent Injunction) | हाई कोर्ट ने निचली अदालत के उस आदेश को भी बरकरार रखा है, जिसके तहत सन टीवी या किसी भी अन्य माध्यम पर वीरप्पन के इस इंटरव्यू के मानहानिकारक हिस्सों को दोबारा दिखाने पर हमेशा के लिए रोक लगा दी गई है। |
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला भारतीय मीडिया जगत के लिए एक कड़ा संदेश है। सनसनी और टीआरपी (TRP) के चक्कर में किसी भी व्यक्ति, विशेषकर महिला की गरिमा और चरित्र पर बिना सोचे-समझे कीचड़ उछालने की इजाजत नहीं दी जा सकती। भले ही न्याय मिलने में 30 साल का लंबा वक्त लगा, लेकिन अदालत ने साफ कर दिया कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर एडिटोरियल राइट्स का इस्तेमाल जिम्मेदारी से मुकरने के लिए नहीं किया जा सकता। सन टीवी को अब अभिनेत्री सुकन्या को हर्जाने की पूरी राशि का भुगतान करना होगा।

