SARFAESI Act: मद्रास हाई कोर्ट ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों द्वारा लोन न चुकाने वाले डिफॉल्टर्स की संपत्ति पर कब्जा (Possession) लेने की प्रक्रिया में होने वाली प्रशासनिक और अदालती देरी पर मद्रास एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
तय समय सीमा के भीतर निपटाने के लिए राज्यव्यापी निर्देश
हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की डिवीजन बेंच ने साफ किया कि धारा 14 के तहत मजिस्ट्रेटों का काम केवल एक ‘प्रशासनिक/लिपिकीय’ (Ministerial Function) है। वे बैंकों और कर्जदारों के आपसी विवादों में जज बनकर फैसला (Adjudication) नहीं सुना सकते। कोर्ट ने पूरे तमिलनाडु में सरफेसी एक्ट (SARFAESI Act) की धारा 14 के तहत आने वाले आवेदनों के तुरंत रजिस्ट्रेशन और उन्हें तय समय सीमा के भीतर निपटाने के लिए राज्यव्यापी (State-wide) निर्देश जारी किए हैं।
समझिए सरफेसी एक्ट की धारा 14? (क्यों होती है मजिस्ट्रेट की जरूरत?)
जब कोई व्यक्ति बैंक का लोन नहीं चुका पाता (Default), तो बैंक सरफेसी एक्ट के तहत उसकी बंधक रखी गई संपत्ति (Secured Asset) को जब्त कर उसे नीलाम करने की प्रक्रिया शुरू करता है।
धारा 14 का काम: यदि कर्जदार या कोई तीसरा पक्ष आसानी से संपत्ति का कब्जा बैंक को नहीं सौंपता, तो बैंक उस जिले के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) या जिला मजिस्ट्रेट (DM) के पास भौतिक कब्जे (Physical Possession) के लिए पुलिस सुरक्षा और प्रशासनिक मदद की गुहार लगाता है।
30 से 60 दिनों में निपटाएं मामला, कर्जदार को नोटिस देना भी जरूरी नहीं: हाई कोर्ट
निर्देश: मद्रास हाई कोर्ट ने पाया कि पूरे राज्य में इन आवेदनों को महीनों तक बिना नंबर दिए (रजिस्टर किए) पेंडिंग रखा जाता है, जो कानून की भावना के खिलाफ है। कोर्ट ने सख्त निर्देश जारी किए।
तुरंत रजिस्ट्रेशन: बैंकों द्वारा दाखिल किए गए धारा 14 के आवेदनों को बिना किसी देरी के तुरंत रजिस्टर किया जाए। रजिस्ट्रेशन से पहले किसी भी तरह की बहस या सुनवाई की जरूरत नहीं है।
समय सीमा (Statutory Timeline): मजिस्ट्रेट को आवेदन मिलने के 30 दिनों के भीतर इस पर आदेश पारित करना होगा। असाधारण परिस्थितियों में, लिखित कारणों के साथ इसे बढ़ाया जा सकता है, लेकिन किसी भी हाल में 60 दिनों से ज्यादा की देरी नहीं होनी चाहिए।
कर्जदार को नोटिस नहीं: आदेश पारित करने से पहले कर्जदार (Borrower), गारंटर या किसी तीसरे पक्ष को नोटिस जारी करने की कोई कानूनी जरूरत नहीं है (सिवाय उन मामलों के जहां पहले से वैध किराएदार का वास्तविक दावा हो)।
मामला जिसने खोली सिस्टम की पोल: नीलाम हो चुकी प्रॉपर्टी पर 1 साल से कब्जा नहीं
यह आदेश विजयानंद श्रीनिवासन नामक एक व्यक्ति की याचिका पर आया। उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक (PNB) द्वारा नीलाम की गई एक संपत्ति को खरीदा (Auction Purchaser) था।
पूरी रकम देने के बाद भी इंतजार: याचिकाकर्ता ने 3 जून 2025 को पूरी रकम चुका दी और बैंक ने उनके पक्ष में ‘सेल सर्टिफिकेट’ भी जारी कर दिया। लेकिन उन्हें संपत्ति का भौतिक कब्जा नहीं मिला।
अदालत में पेंडिंग पड़े थे 200 केस: बैंक ने कोर्ट को बताया कि उसने अगस्त 2025 में ही चेंगलपट्टू के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के पास धारा 14 का आवेदन दिया था, लेकिन लगभग एक साल बीतने को आया और कोर्ट ने इसे अब तक नंबर (Register) भी नहीं किया था। चेंगलपट्टू कोर्ट में ऐसे करीब 200 मामले धूल फांक रहे थे।
मद्रास हाई कोर्ट ने चेंगलपट्टू के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को इस बैंक के आवेदन पर 30 दिनों के भीतर अंतिम फैसला लेने और बिना ठोस वजह के सुनवाई न टालने का आदेश दिया है।
‘मजिस्ट्रेट जज न बनें, केेवल कागजात की जांच करें
हाई कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में मजिस्ट्रेटों को उनकी शक्तियों की सीमा याद दिलाई कि धारा 14 के तहत जांच का दायरा केवल प्रशासनिक है, न कि न्यायिक। नामित प्राधिकारी (Designated Authority) को बैंक और कर्जदार या किसी तीसरे पक्ष के बीच के विवादों पर फैसला सुनाने का कोई अधिकार नहीं है, बल्कि ऐसा करने पर सख्त रोक है। यदि कर्जदार को कोई आपत्ति है, तो वह इसके खिलाफ डेट्स रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) की धारा 17 के तहत अपील दायर करे।
मजिस्ट्रेट को केवल ये 4 चीजें जांचनी होंगी
- क्या वह संपत्ति उनके क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र (Territory) में आती है?
- क्या बैंक ने कर्जदार को सरफेसी एक्ट की धारा 13(2) का नोटिस दिया था?
- क्या बैंक ने जरूरी शपथ पत्र (Affidavit) दाखिल किया है?
- क्या यह मामला सरफेसी एक्ट की धारा 31 (अपवाद वाले मामलों) के दायरे से बाहर है?
विश्लेषण: बैंकिंग सेक्टर और रिकवरी प्रक्रिया पर इस फैसले के मायने
| प्रभाव का क्षेत्र | हाई कोर्ट के निर्देशों के बाद बड़े बदलाव |
| बैंकों और खरीदारों को राहत | नीलामी में संपत्ति खरीदने वाले आम लोगों को अब अपनी ही खरीदी हुई प्रॉपर्टी के लिए सालों भटकना नहीं पड़ेगा। बैंकों का फंसा हुआ पैसा (NPA) जल्दी रिकवर हो सकेगा। |
| अदालतों का बोझ कम होगा | हाई कोर्ट ने नाराजगी जताई कि अधिकारियों की सुस्ती के कारण बैंकों को हाई कोर्ट में रिट याचिकाएं लगानी पड़ती हैं। इस आदेश से ऊपरी अदालतों में अनावश्यक मुकदमों की बाढ़ रुकेगी। |
| सिस्टम में जवाबदेही | हाई कोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया है कि वे इस आदेश की कॉपी तमिलनाडु के सभी जिला जजों और राज्य के मुख्य सचिव (Chief Secretary) को भेजें ताकि इसे सभी कलेक्टर्स और जिला मजिस्ट्रेटों तक लागू कराया जा सके। |
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
मद्रास हाई कोर्ट का यह निर्देश बैंकों और वित्तीय प्रणाली को मजबूत करने वाला एक व्यावहारिक कदम है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कानून के कड़े प्रावधानों को लालफीताशाही (Red Tapism) और न्यायिक सुस्ती की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता। लोन न चुकाने वालों को तकनीकी कमियों का फायदा उठाकर कब्जा रोकने की अनुमति नहीं मिलेगी और मजिस्ट्रेटों को तय समय सीमा के भीतर ही काम करना होगा।

