Counterfeit Note: साल 2016 में देश में हुई नोटबंदी (Demonetisation) के ठीक बाद एक बैंक में 1000 रुपये के 6 नकली नोट जमा करने की कोशिश के मामले में ठाणे सेशंस कोर्ट ने एक 38 वर्षीय बिजनेसमैन को पूरी तरह बरी (Acquit) कर दिया है।
जाली नोट को इंसान आंखों से नहीं पहचान सकता
मुंबई की एक अदालत के एडिशनल सेशंस जज आर. एस. भाकरे ने 30 मई को दिए अपने फैसले (जिसकी कॉपी शुक्रवार को उपलब्ध हुई) में एक बेहद व्यावहारिक टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि नोटबंदी के उस दौर में जब चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल था, एक आम इंसान नग्न आंखों (Naked Eye) से यह पहचान नहीं सकता था कि नोट असली हैं या नकली। अदालत ने माना कि आरोपी का इस मामले में कोई भी आपराधिक इरादा (No Criminal Intent) नहीं था और न ही उसे इस बात की कोई पूर्व जानकारी थी कि वे नोट नकली हैं।
जाली नोट चलाने वाला बाजार चुनेगा, बैंक की मशीन नहीं: कोर्ट का तर्क
अदालत ने आरोपी नदीम शेख को बरी करते हुए अपराध के पीछे की सामान्य मानवीय समझ (Logics) को रेखांकित किया। कहा, यदि किसी व्यक्ति को यह पक्का पता होगा कि उसके पास नकली नोट (Counterfeit Notes) हैं, तो वह तार्किक रूप से उन्हें सीधे बैंक में जमा करने कभी नहीं जाएगा, जहां नोटों की जांच आधुनिक स्कैनिंग मशीनों के जरिए की जाती है। ऐसा व्यक्ति उन नोटों को खपाने के लिए खुले बाजार (Market) का इस्तेमाल करता, न कि सीधे बैंक का रुख करता। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि आरोपी को नोटों के जाली होने की जानकारी थी।
क्या था पूरा मामला? (नोटबंदी के दौर की घटना)
यह मामला 9 दिसंबर 2016 का है, जब देश में 500 और 1000 रुपये के नोटों को बंद किए हुए महज एक महीना हुआ था।
बैंक में जमा करने पहुंचे थे पैसे: आरोपी नदीम शेख ठाणे के एक निजी बैंक में कुल 23000 रुपये जमा कराने गए थे।
कैशियर ने पकड़े जाली नोट: जब बैंक का कैशियर पैसों की प्रोसेसिंग कर रहा था, तब वेरिफिकेशन मशीन की जांच में 1000 रुपये के 6 नोट नकली पाए गए। इसके बाद बैंक प्रबंधन की शिकायत पर नदीम के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।
आईपीसी की धाराओं में केस: नदीम शेख के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 489(B) (नकली नोटों को असली के रूप में चलाना) और धारा 489(C) (नकली नोटों को जानबूझकर अपने पास रखना) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था।
जब जांच अधिकारी (IO) खुद नहीं पहचान पाए नकली नोट
इस केस की सुनवाई के दौरान तब एक दिलचस्प मोड़ आया जब खुद केस के जांच अधिकारी (Investigating Officer) ने क्रॉस-एग्जामिनेशन (जिरह) के दौरान यह स्वीकार किया कि वे भी केवल देखकर या छूकर यह नहीं बता सकते थे कि जब्त किए गए नोट नकली हैं।
अदालत का निष्कर्ष
जज ने नोट किया कि जब खुद पुलिस अधिकारी और विशेषज्ञ बिना मशीन के इन नोटों की पहचान करने में असमर्थ थे, तो एक आम नागरिक से यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह इसकी पहचान कर ले। कोर्ट ने कहा, “इस साक्ष्य से साबित होता है कि जब्त किए गए जाली नोट नग्न आंखों से सामान्य रूप से नकली नहीं दिखते थे। इसलिए आरोपी के खिलाफ दोष साबित नहीं होता।”
विश्लेषण: नकली नोट मामलों (IPC 489) में ‘अपराध के इरादे’ का महत्व
| कानूनी पहलू | कोर्ट का स्टैंड और इसका प्रभाव |
| ‘मेन्स रिया’ (Mens Rea) अनिवार्य | आपराधिक कानून का बुनियादी सिद्धांत है कि किसी को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता जब तक उसका इरादा (Mens Rea) गलत न हो। सिर्फ जेब में नकली नोट होना अपराध नहीं है, बशर्ते आपको उसकी जानकारी न हो। |
| नोटबंदी का संदर्भ (Context) | कोर्ट ने माना कि २०१६ के अंत में लोग अपने पास जमा नकदी को जैसे-तैसे बैंक में जमा करा रहे थे। ऐसे में किसी व्यापारिक लेनदेन से आए जाली नोट अनजाने में बैंक पहुंचना स्वाभाविक था। |
| व्यापारियों को बड़ी राहत | यह फैसला उन ईमानदार व्यापारियों के लिए एक बड़ी नजीर है जो अनजाने में ग्राहकों से नकली नोट ले लेते हैं और बाद में पुलिस केस के चक्कर में फंस जाते हैं। |
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
ठाणे अदालत का यह फैसला इस बात की याद दिलाता है कि कानून अंधा हो सकता है, लेकिन न्याय की नजरें व्यावहारिक होनी चाहिए। कोर्ट ने साफ कर दिया कि बैंक में सीधे जाकर पैसे जमा कराने की पारदर्शिता ही यह साबित करने के लिए काफी है कि आरोपी के मन में कोई चोर नहीं था। नदीम शेख को पिछले 10 साल से चल रहे इस मानसिक और कानूनी तनाव से अब पूरी तरह मुक्ति मिल गई है।

