Private Settlement: दहेज उत्पीड़न और धोखाधड़ी की शिकायत पर प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने के बजाय निजी समझौता (Private Settlement) कराने की कोशिश करने पर मद्रास हाईकोर्ट (मदुरै पीठ) ने कड़ा रुख अपनाया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संज्ञेय अपराध (Cognizable Offences) का खुलासा होने पर पुलिस अधिकारियों का प्राथमिक कर्तव्य कानून लागू करना और एफआईआर दर्ज करना है, न कि निजी मध्यस्थ बनकर मामलों को दबाना। अदालत ने अलंगुलम महिला पुलिस थाने (AWPS) की दो महिला पुलिस अधिकारियों (निरीक्षक और उप-निरीक्षक) को कर्तव्य में लापरवाही बरतने के लिए शिकायतकर्ता को 1-1 लाख रुपये (कुल ₹2 लाख) का मुआवजा देने का अंतिम आदेश दिया है।
मामला क्या था?: सगाई में 10 लाख रुपये का दहेज और समझौता
शिकायतकर्ता का दावा: एक पिता ने अपनी बेटी की शादी क्वेस्ट ग्लोबल प्राइवेट लिमिटेड में कार्यरत सीनियर इंजीनियर से तय की थी। 18 अप्रैल को सगाई के दौरान लड़के वालों ने 10 लाख रुपये दहेज के रूप में ले लिए।
शादी रद्द और धोखाधड़ी: बाद में और अधिक दहेज की मांग पूरी न होने पर लड़के वालों ने 8 जून को तय शादी को एकतरफा रद्द कर दिया।
पुलिस का रवैया: जब पीड़ित पिता शिकायत लेकर अलंगुलम महिला पुलिस स्टेशन पहुंचे, तो अधिकारियों ने एफआईआर दर्ज करने के बजाय मामला सुलझाने की मध्यस्थता शुरू कर दी। उन्होंने 5 लाख रुपये वापस करवाए, बाकी 5 लाख के लिए एक महीने का समय दिया और बिना कोई कानूनी कार्रवाई किए शिकायत बंद कर दी।
मद्रास हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणियां
“पुलिस का काम मध्यस्थता करना नहीं है”
जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी की मुख्य टिप्पणी: जब किसी शिकायत में संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) का खुलासा होता है, तो पुलिस अधिकारी न तो कोई आर्बिट्रेटर (Arbitrator) हैं और न ही निजी मध्यस्थ (Private Mediator)। उनका कानूनी दायित्व कानून को लागू करना है, न कि वित्तीय सौदेबाजी करवाकर अपराध को कमजोर करना। पुलिस अधिकारी संज्ञेय अपराधों को निजी मौद्रिक समझौतों में बदलने का अधिकार क्षेत्र खुद नहीं ले सकते।”
सार्वजनिक कानून जवाबदेही (Public Law Accountability)
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि अधिकारियों ने बाद में सुधारात्मक कदम उठाए, लेकिन कर्तव्य की इस गंभीर अवहेलना के लिए 1-1 लाख रुपये का मुआवजा अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही के रूप में बरकरार रहेगा और यह राशि पीड़ित पिता को दी जाएगी।
हाई कोर्ट के आदेश के बाद हुई कार्रवाइयां
कार्रवाई और एफआईआर: मद्रास हाई कोर्ट की फटकार के बाद दोनों पुलिस अधिकारियों को निलंबित (Suspend) कर दिया गया और आरोपी लड़के व उसके परिवार के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज की गई।
दहेज प्रतिषेध अधिकारी को मामला स्थानांतरित: मामले को आगे की आधिकारिक जांच के लिए Tenkasi के जिला दहेज प्रतिषेध अधिकारी (District Dowry Prohibition Officer) के पास भेज दिया गया है।
निलंबन बहाली की अनुमति: अदालत ने जिला पुलिस अधीक्षक (SP) को 20 जुलाई से दोनों अधिकारियों का निलंबन वापस लेने (Revoke) की अनुमति भी प्रदान की।
केस मैट्रिक्स: Madras HC Ruling on Police Mediation in Cognizable Offences
| कानूनी और प्रशासनिक पहलू | विवरण / अदालत का फैसला |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (मदुरै पीठ) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी (Justice L. Victoria Gowri) |
| मुख्य कानूनी मुद्दा | क्या संज्ञेय अपराध (दहेज उत्पीड़न) में पुलिस एफआईआर दर्ज किए बिना निजी मध्यस्थता करवा सकती है? |
| अदालत का निर्णय | नहीं; पुलिस मध्यस्थ नहीं है। एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। |
| दंडात्मक आदेश | दोनों महिला पुलिस अधिकारियों पर 1-1 लाख रुपये (कुल ₹2 लाख) का व्यक्तिगत जुर्माना/मुआवजा। |

