Saturday, July 25, 2026
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Access to Justice: लंदन में सीजेआई…न्याय सिर्फ अमीरों के लिए नहीं हो सकता, जनता का भरोसा किसी भी संस्था को थाली में सजाकर नहीं मिलता

Access to Justice: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कहा, न्याय सिर्फ अमीरों के लिए नहीं हो सकता, ऐसा हुआ तो कोर्ट अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं निभा रहा
है।

छात्रों और कानूनविदों के बीच थे सीजेआई

एक ऐसी अदालत जो केवल उन लोगों के अधिकारों की रक्षा करती है जो मुकदमा लड़ने का खर्च उठा सकते हैं, वह अपने संवैधानिक कार्य को पूरा (Fulfill) नहीं कर रही है, बल्कि केवल उसका दिखावा या औपचारिकता (Performing) कर रही है। यह बेहद गंभीर और दूरगामी टिप्पणी भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने की है। लंदन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी में ‘सेंटर फॉर कमर्शियल लॉ’ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में छात्रों और कानूनविदों से बात करते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने भारतीय न्यायिक प्रणाली, न्याय तक आम आदमी की पहुंच (Access to Justice), और भविष्य की चुनौतियों पर खुलकर बात की। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यायपालिका को केवल अधिकारों का संरक्षक (Guardian) नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे इतना सुलभ होना चाहिए कि वह संरक्षण वास्तविक लगे।

अचूक दिखने से नहीं, गलतियां सुधारने से मजबूत होती हैं संस्थाएं

संवैधानिक लोकतंत्र में न्यायपालिका पर जनता का भरोसा बनाए रखने के सवाल पर सीजेआई ने आत्मनिरीक्षण की बात कही। बोले, जनता का भरोसा किसी भी संस्था को थाली में सजाकर नहीं मिलता। इसे पारदर्शिता, निरंतरता और खुद को सुधारने के साहस (Courage to be self-correcting) के जरिए लगातार कमाना पड़ता है। मैं खुले तौर पर कहता हूं कि न्यायिक ताकत कभी भी ‘अचूक होने के भ्रम’ (Appearance of infallibility) से नहीं आती। संस्थाएं तब मजबूत होती हैं जब वे सीखने और अपनी गलतियों को सुधारने के लिए तैयार रहती हैं। कहा कि लोकतंत्र में न्यायपालिका जवाबदेही की आखिरी कतार है, लेकिन इसे खुद संविधान और जनता के प्रति जवाबदेह होना होगा। इसी वजह से वे ‘एकसमान राष्ट्रीय न्यायिक नीति’ (Uniform National Judicial Policy) पर जोर दे रहे हैं ताकि अदालतों के फैसलों में एकरूपता और स्थिरता आए।

सीजेआई सूर्यकांत के लिए ‘न्याय’ के व्यक्तिगत मायने क्या हैं?

जब छात्रों ने उनसे पूछा कि उनके लिए न्याय की व्यक्तिगत परिभाषा क्या है, तो सीजेआई ने इसे एक गहरा मानवीय दर्शन बताया।

मशीनी कानून बनाम मानवीय हकीकत: क्या न्याय का मतलब ‘आंख के बदले आंख’ है? या फिर इसका मतलब कानून की किताबों में लिखे नियमों को मशीनी तरीके से लागू कर देना है? सीजेआई ने कहा कि न्याय इन दोनों छोरों के बीच में कहीं बसता है।

राजा सुलेमान जैसी बुद्धिमानी: उन्होंने ‘किंग सोलोमन’ (राजा सुलेमान) के न्याय का उदाहरण देते हुए कहा कि कानून को मानवीय वास्तविकताओं को समझते हुए लागू किया जाना चाहिए।

तटस्थता और संवेदनशीलता का संतुलन: उनके लिए न्याय का सार वस्तुनिष्ठता (Objectivity) और विषयनिष्ठता (Subjectivity) के बीच की पतली लकीर पर संतुलन बनाकर चलना है। एक जज को कानून के दायरे में रहते हुए मानवीय संवेदनाओं और विवेक का इस्तेमाल करना ही चाहिए।

आज की न्याय प्रणाली के सामने 3 सबसे बड़ी चुनौतियां

सीजेआई सूर्यकांत ने वर्तमान समय में कानूनी व्यवस्था के सामने खड़ी तीन सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों को रेखांकित किया।

चुनौतियां (Challenges)सीजेआई का दृष्टिकोण और विश्लेषण
1. मामलों का भारी बोझ (Crisis of Volume)विशेष रूप से भारतीय उपमहाद्वीप में, अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या का वॉल्यूम एक बहुत बड़ा संकट बन चुका है।
2. रफ्तार बनाम सही न्याय (Speed vs Careful Reasoning)त्वरित फैसलों का भारी दबाव है, और यह दबाव गलत भी नहीं है क्योंकि ‘देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है’। लेकिन, जल्दबाजी के चक्कर में अगर गहन तार्किकता की बलि दे दी जाए, तो वह अपने आप में एक बड़ा नुकसान है। इस संतुलन को ईमानदारी से साधना होगा।
3. तकनीक का बदलता स्वरूप (Technology Disruption)तकनीक यह बदल रही है कि विवाद कैसे शुरू होते हैं, डिजिटल सबूत कैसे बनते हैं और अदालतों को कैसे काम करना चाहिए।

तकनीक बनेगी न्याय का माध्यम और ‘स्वदेशी न्यायशास्त्र’ (Swadeshi Jurisprudence)

तकनीक एक इनेबलर के रूप में: सीजेआई ने भविष्य का एक ऐसा खाका खींचा जहां तकनीक न्याय को अधिक सुलभ, अदालती कार्यवाही को कुशल और संस्थाओं को पारदर्शी बनाएगी, लेकिन इस दौरान उन बुनियादी मानवीय मूल्यों को सुरक्षित रखा जाएगा जो कानून के शासन की नींव हैं।

स्वदेशी न्यायशास्त्र (Swadeshi Jurisprudence): उन्होंने गर्व से उल्लेख किया कि आजादी के बाद से भारत की न्यायप्रणाली ने कॉमन लॉ (ब्रिटिश व्यवस्था) की ताकतों को बनाए रखते हुए अपनी एक विशिष्ट भारतीय संवैधानिक पहचान विकसित की है। भारतीय अदालतें अब देश की अनूठी सामाजिक वास्तविकताओं, सांस्कृतिक विविधताओं और संवैधानिक आकांक्षाओं को ध्यान में रखकर फैसले लेती हैं, जिसे ‘स्वदेशी न्यायशास्त्र’ कहा जाता है।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का यह संबोधन भारतीय अदालतों के लिए एक नए विजन को दर्शाता है। उनका यह साफ संदेश है कि अदालतें केवल कागजी औपचारिकताओं या संपन्न लोगों की जागीर बनकर नहीं रह सकतीं। न्याय की सार्थकता इसी बात में है कि समाज के सबसे हाशिए पर खड़े और बेआवाज (Margised and Voiceless) व्यक्ति को भी यह महसूस हो कि अदालत में उसकी बात सुनी गई है। जब एक आम नागरिक बिना किसी आर्थिक डर के कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकेगा, तभी न्यायपालिका अपने वास्तविक संवैधानिक कर्तव्यों को पूरा कर पाएगी।

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