Quit India Movement: देश की आजादी के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता दिखाते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और भावुक फैसला सुनाया है।
स्वतंत्रता सैनिक सम्मान पेंशन जारी करने के दिए आदेश
अदालत ने केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि वह 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (Quit India Movement) में हिस्सा लेने वाले एक स्वतंत्रता सेनानी की विधवा को तुरंत स्वतंत्रता सैनिक सम्मान पेंशन जारी करे। अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि प्रशासनिक तंत्र और अधिकारियों की अपनी ढिलाई व लेत-लतीफी के कारण यदि किसी स्वतंत्रता सेनानी को उसके जीवनकाल में पेंशन की औपचारिक मंजूरी नहीं मिल पाई, तो उसकी मृत्यु के बाद उसकी आश्रित पत्नी को हक से वंचित नहीं किया जा सकता।
केंद्र सरकार ने तकनीकी आधार पर पेंशन को किया था खारिज
चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा, “यह योजना उन लोगों के प्रति राष्ट्र की ‘कृतज्ञता’ (Gratitude) का प्रतीक है जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए कष्ट सहे, बलिदान दिए और यह कृतज्ञता उनके परिवारों के प्रति भी है। इस तरह के एक कल्याणकारी उपाय की व्याख्या ऐसी होनी चाहिए जो इसके उद्देश्य को आगे बढ़ाए। इस मामले में स्वतंत्रता सेनानी को उनके जीवनकाल में औपचारिक मंजूरी न मिलने का एकमात्र कारण खुद अधिकारियों द्वारा की गई अत्यधिक देरी थी। यह आदेश स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय रामा नंद सिंह (आर. एन. सिंह) की पत्नी मृदुला देवी द्वारा दायर अपील पर आया है, जिनकी पेंशन याचिका को केंद्र सरकार ने तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया था।
6 दशकों का लंबा संघर्ष: 1942 से 2026 तक की कानूनी गाथा
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, यह मामला भारतीय स्वतंत्रता इतिहास और प्रशासनिक उदासीनता की एक लंबी दास्तान बयां करता है।
1942 का आंदोलन और फरारी: आर. एन. सिंह ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। 10 अगस्त 1942 को बिहार के मधुबनी के सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट द्वारा उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। गिरफ्तारी से बचने के लिए वे मार्च 1945 में ‘घोषित अपराधी’ (Proclaimed Offender) बने और दिसंबर 1946 तक भूमिगत (Underground) रहकर देश के लिए काम करते रहे।
1981 में आवेदन, 2010 में खारिज: उन्होंने 25 दिसंबर 1981 को ‘स्वतंत्रता सैनिक सम्मान पेंशन योजना’ के तहत आवेदन किया। मार्च 1945 में बिहार सरकार ने इसकी सिफारिश भी की, लेकिन केंद्र सरकार ने जनवरी 2010 (लगभग 29 साल बाद) इस दावे को खारिज कर दिया।
अदालती लड़ाई के बीच सेनानी का निधन: इस फैसले के खिलाफ आर. एन. सिंह ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लेकिन न्याय का इंतजार करते-करते 30 जनवरी 2011 को उनका निधन हो गया। इसके बाद उनकी पत्नी मृदुला देवी इस कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ाती रहीं।
2024 में मिला सेनानी का दर्जा: सालों की कानूनी लड़ाई और रिकॉर्ड्स के पुन: सत्यापन के बाद आखिरकार 6 अगस्त 2024 को दिल्ली हाई कोर्ट ने आर. एन. सिंह को एक वैध स्वतंत्रता सेनानी के रूप में मान्यता दी और उनके बकाया एरियर के भुगतान का आदेश दिया।
नया विवाद: “जीवित रहते पेंशनभोगी नहीं थे, इसलिए पत्नी को पेंशन नहीं”
जब मृदुला देवी ने अपने पति को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा मिलने के बाद ‘पारिवारिक पेंशन’ (Family Pension) के लिए दावा किया, तो केंद्र सरकार के अधिकारियों ने एक नया और अजीब तकनीकी रोड़ा अटका दिया।
सरकार का कुतर्क: सरकार की ओर से पेश सीनियर पैनल काउंसिल निधि बंगा ने तर्क दिया कि यह योजना केवल सम्मान देने के लिए है, यह कोई वैधानिक सर्विस पेंशन नहीं है। चूंकि रामा नंद सिंह अपने जीवनकाल में “आधिकारिक तौर पर स्वीकृत पेंशनभोगी” नहीं थे, इसलिए उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी के लिए कोई नया हक (Derivative Claim) पैदा नहीं होता।
कोर्ट की फटकार (अधिकारी अपनी गलती का फायदा नहीं उठा सकते): हाई कोर्ट ने सरकार के इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि जब 2011 में सिंह की मृत्यु हुई, तब मामला कोर्ट में लंबित था और देरी अधिकारियों की तरफ से हुई थी। “कोई भी प्राधिकारी (Authority) अपनी खुद की चूक या ढिलाई का फायदा उठाकर किसी नागरिक को उसके वैध अधिकार से वंचित नहीं कर सकता।” अगर ऐसा किया गया तो इस कल्याणकारी योजना का मूल उद्देश्य ही समाप्त (Nugatory) हो जाएगा।
विश्लेषण: ‘स्वतंत्रता सैनिक सम्मान पेंशन योजना’ के तहत पात्रता
दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मृदुला देवी कानूनी रूप से इस पेंशन की हकदार क्यों हैं।
| पात्रता के वैधानिक मानक | मृदुला देवी के मामले में स्थिति |
| स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा | कोर्ट ने अगस्त २०२४ के आदेश में स्वर्गीय आर. एन. सिंह को आधिकारिक तौर पर स्वतंत्रता सेनानी मान लिया था। |
| आश्रित होने का प्रमाण | मृतका की पत्नी (विधवा) होना और उनके आश्रित होने के दर्जे पर सरकार को कोई संदेह नहीं है। |
| पुनर्विवाह न करने की शर्त | योजना के नियमों के अनुसार, पत्नी को तब तक पेंशन मिलती है जब तक वह दूसरा विवाह न करे। रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है जो दर्शाए कि उन्होंने पुनर्विवाह किया है। |

