Jurisdiction Area: देश में वक्फ संपत्तियों और उनके अधिकारों को लेकर चल रही कानूनी बहसों के बीच मद्रास हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस के. गोविंदराजन थिलाकवादी की एकल पीठ ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि वक्फ बोर्ड को किसी भी जमीन पर अपना नियंत्रण या क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) का दावा करने से पहले कानूनी रूप से उसका मालिकाना हक साबित करना होगा। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी जमीन पर केवल एक दरगाह या मजार (Grave) का अस्तित्व होने मात्र से वह जमीन स्वचालित रूप से वक्फ बोर्ड (Waqf Board) के नियंत्रण में नहीं आ जाती।
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा, किसी दरगाह का महज अस्तित्व होना वक्फ बोर्ड को तब तक उस पर अधिकार नहीं देता, जब तक कि उस संस्थान को कानून के अनुसार ‘वक्फ’ के रूप में स्थापित या अधिसूचित न किया गया हो। हर कब्र या दरगाह स्वचालित रूप से वक्फ संपत्ति नहीं होती। इसके लिए किसी मुस्लिम व्यक्ति द्वारा मुस्लिम कानून के तहत मान्यता प्राप्त पवित्र, धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्य के लिए संपत्ति का स्थायी समर्पण (Permanent Dedication) होना अनिवार्य है।
क्या था पूरा विवाद? (चेन्नई के ट्रिप्लिकेन की दरगाह का मामला)
यह मामला चेन्नई के ट्रिप्लिकेन (Triplicane) में कामराज रोड पर स्थित ‘सरकार सैयद हबीबुल्लाह शाह खदारी आरिफ रब्बानी हजरत दरगाह’ से जुड़ा है।
याचिकाकर्ता (मुतवल्ली) का दावा: याचिकाकर्ता के परिवार का कहना था कि यह दरगाह २४० साल पुरानी है और उनका परिवार पिछले ४० वर्षों से इसका रख-रखाव कर रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि दरगाह जिस जमीन पर है, वह असल में लोक निर्माण विभाग (PWD) यानी सरकारी जमीन है, वक्फ बोर्ड की नहीं।
वक्फ बोर्ड की कार्रवाई: तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने बिना किसी आधिकारिक सर्वे के इस दरगाह को वक्फ अधिनियम के तहत पंजीकृत (Register) करने का निर्देश दे दिया और अपनी मर्जी से ‘ए. शैनशाह’ नाम के व्यक्ति को इस दरगाह का नया ‘मुतवल्ली’ (प्रबंधक) नियुक्त कर दिया।
PWD (सरकार) का स्टैंड: लोक निर्माण विभाग ने कोर्ट में वक्फ बोर्ड के दावों की हवा निकाल दी। सरकारी वकील ने बताया कि यह जमीन राजस्व रिकॉर्ड में ‘सरकारी पोरम्बोक’ (Government Poramboke – बंजर/सार्वजनिक जमीन) के रूप में वर्गीकृत है और इसे ‘भारत स्काउट्स एंड गाइड्स’ को बिना किराए के आवंटित किया गया था।
‘बिना गजट नोटिफिकेशन और सर्वे के वक्फ का दावा अवैध’: कोर्ट
हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि इस विवादित जमीन को कभी भी वक्फ संपत्तियों (Auqaf) की आधिकारिक सूची में शामिल नहीं किया गया था और न ही सरकारी गजट (Government Gazette) में इसे वक्फ संपत्ति के रूप में अधिसूचित किया गया था।
अदालत ने वक्फ बोर्ड की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करते हुए कहा, किसी संपत्ति को वक्फ घोषित करने से पहले उसका आधिकारिक सर्वेक्षण (Survey) किया जाना ‘साइन क्वा नॉन’ (Sine Qua Non – एक अनिवार्य शर्त) है। यदि किसी दरगाह का कभी सर्वे, पंजीकरण या अधिसूचना नहीं हुई है, तो वक्फ बोर्ड सिर्फ इसलिए उस पर कब्जा या नियंत्रण नहीं ले सकता क्योंकि वह एक मुस्लिम धार्मिक संस्थान है। अदालत ने यह भी साफ किया कि कानून को एक ‘निजी पारिवारिक मकबरे’ (Private Family Tomb) और ‘सार्वजनिक धार्मिक बंदोबस्त’ (Public Religious Endowment) के रूप में बनाए रखी जाने वाली किसी सूफी संत की मजार के बीच स्पष्ट अंतर करना चाहिए।
विश्लेषण: मद्रास हाई कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु
अदालत ने तमिलनाडु वक्फ बोर्ड के उस प्रस्ताव को पूरी तरह रद्द (Set Aside) कर दिया जिसके तहत नया मुतवल्ली नियुक्त किया गया था।
| कानूनी बिंदु | मद्रास हाई कोर्ट की व्याख्या |
| मुतवल्ली की नियुक्ति | कोर्ट ने कहा कि किसी मुतवल्ली की नियुक्ति की पूर्व-शर्त ही यह है कि वह संपत्ति कानूनी रूप से ‘वक्फ’ होनी चाहिए। जब वक्फ होना ही साबित नहीं है, तो बोर्ड मुतवल्ली नियुक्त नहीं कर सकता। |
| वक्फ एक्ट की धारा 36(4) | बोर्ड द्वारा दरगाह को धारा 36(4) के तहत सीधे पंजीकृत करने का आदेश अवैध है क्योंकि इसके लिए आवश्यक प्रारंभिक वैधानिक प्रक्रियाएं (जैसे प्रारंभिक सर्वे) पूरी नहीं की गईं। |
| विवाद का निपटारा कहां हो? | चूंकि जमीन के मालिकाना हक पर याचिकाकर्ता, वक्फ बोर्ड और पीडब्ल्यूडी (सरकार) तीनों के अलग-अलग दावे हैं, इसलिए इस जटिल दीवानी विवाद को पहले एक सक्षम सिविल कोर्ट (Competent Civil Court) द्वारा सुलझाया जाना चाहिए। |

