Monetary Relief: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवादों और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी मसले पर एक बड़ा और स्पष्ट फैसला सुनाया है।
यूपी के कौशाम्बी की एक अदालत का आदेश बरकरार रखा
हाईकोर्ट के जस्टिस गरिमा प्रशांत की एकल पीठ ने कौशाम्बी (Kaushambi) की एक अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए कि CrPC 125 के तहत मेंटेनेंस का आदेश पहले ही हो चुका है, मजिस्ट्रेट को घरेलू हिंसा अधिनियम (DV Act) के तहत आर्थिक राहत देने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने साफ कर दिया है कि यदि कोई पत्नी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत पहले से ही गुजारा भत्ता (Maintenance) पा रही है, तो भी वह घरेलू हिंसा अधिनियम (Domestic Violence Act) के तहत अतिरिक्त आर्थिक राहत की हकदार है।
यह रही हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, सिर्फ इसलिए कि CrPC की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता पहले ही दिया जा चुका है, यह घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत वित्तीय राहत देने के खिलाफ कोई पूर्ण रोक (Absolute Bar) पैदा नहीं करता है। दोनों कानून अलग-अलग वैधानिक क्षेत्रों (Distinct Statutory Spheres) में काम करते हैं, हालांकि दोनों का अंतिम उद्देश्य पीड़ित महिला को आर्थिक सुरक्षा देना ही है।”
क्या था पूरा मामला? (पति ने दी थी दोहरे मेंटेनेंस की दुहाई)
यह मामला कौशाम्बी की एक पारिवारिक अदालत से जुड़ा है, जहां शादी के तीन साल के भीतर ही पत्नी ने विवाद के बाद कानूनी रास्ते अपनाए थे।
पहला केस (CrPC 125): कोर्ट ने पति को आदेश दिया था कि वह अपनी पत्नी को 2000 रुपये प्रति माह और अपनी नाबालिग बेटी को 1500 रुपये प्रति माह का गुजारा भत्ता दे।
दूसरा केस (DV Act): इस आदेश के बावजूद, पत्नी ने घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत एक और मामला दर्ज कराया। इस कार्यवाही के दौरान ट्रायल कोर्ट ने पत्नी को 1500 रुपये प्रति माह का अतिरिक्त अंतरिम मेंटेनेंस देने का आदेश जारी कर दिया।
पति की हाई कोर्ट में दलील: पति ने इस अतिरिक्त मेंटेनेंस को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी। उसके वकील ने तर्क दिया कि एक ही समय में दो अलग-अलग कानूनों के तहत मेंटेनेंस देना ‘दोहरे लाभ’ (Duplication of Maintenance) जैसा है, जो पति के साथ गंभीर अन्याय है। पति ने यह भी दावा किया कि पत्नी ने पिछले मेंटेनेंस ऑर्डर की बात छिपाई थी।
सुप्रीम कोर्ट के ‘रजनीश बनाम नेहा’ फैसले का हवाला
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पति के तर्कों को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के ऐतिहासिक दिशा-निर्देशों का हवाला दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अलग-अलग कानूनों के तहत मेंटेनेंस का दावा तो किया जा सकता है, लेकिन अदालतों को ‘ओवरलैपिंग’ (Overlapping) से बचना होगा।
अदालतों का कर्तव्य: जब भी कोई अदालत (जैसे घरेलू हिंसा मामले की सुनवाई कर रहा मजिस्ट्रेट) बाद में कोई मेंटेनेंस का आदेश पारित करती है, तो उसे पहले से तय की गई राशि को ध्यान में रखना होगा।
समायोजन (Adjustment): बाद वाली अदालत को यह देखना होता है कि क्या पहले दी गई राशि महिला के भरण-पोषण के लिए काफी है या नहीं। यदि काफी नहीं है, तो वह अतिरिक्त राशि तय कर सकती है ताकि अनुचित दोहरा लाभ भी न हो और महिला की जरूरतें भी पूरी हों।
मौजूदा मामले में, हाई कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने पति की आर्थिक स्थिति—जैसे कि वह मुंबई में लॉन्ड्री का बिजनेस चलाता है और खेती से भी अतिरिक्त कमाई करता है, को देखने के बाद ही यह 1500 रुपये प्रति माह की बेहद मामूली (Modest) रकम तय की है, जिसे किसी भी पैमाने पर अत्यधिक या मनमाना नहीं कहा जा सकता।
विश्लेषण: दोनों कानूनों में मुख्य अंतर और वैधानिक स्थिति
अक्सर लोग भ्रमित हो जाते हैं कि जब एक कानून मौजूद है, तो दूसरे की क्या जरूरत है। हाई कोर्ट ने इसके पीछे के विधायी उद्देश्य को स्पष्ट किया है।
| कानूनी प्रावधान | मुख्य दायरा और उद्देश्य | इलाहाबाद हाई कोर्ट का निष्कर्ष |
| धारा 125 CrPC (अब BNSS) | यह मुख्य रूप से महिला को भुखमरी (Vagrancy) से बचाने और बुनियादी भरण-पोषण सुनिश्चित करने के लिए एक त्वरित आपराधिक-प्रकृति का उपाय है। | केवल इस आदेश के होने से मजिस्ट्रेट के अन्य क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) खत्म नहीं होते। |
| घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 | यह एक व्यापक सिविल/आपराधिक प्रकृति का कानून है, जो महिला को घरेलू हिंसा के खिलाफ सुरक्षा, साझा घर में रहने का अधिकार (Residence Order) और व्यापक मौद्रिक राहत (Monetary Relief) देता है। | दोनों कार्यवाही साथ-साथ चल सकती हैं। बाद की अदालतें पहली राशि को एडजस्ट कर अतिरिक्त राहत दे सकती हैं। |

