Monday, October 26, 2026
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Doctrine of Severability: बहिष्कार विरोधी कानून को पूरी तरह रद्द नहीं किया जाना चाहिए था…वर्ष 1962 के एक फैसले को क्यों किया याद, यहां समझें

Doctrine of Severability: देश की सर्वोच्च अदालत ने ऐतिहासिक सबरीमाला संदर्भ (Sabarimala Reference) की सुनवाई के दौरान एक बेहद महत्वपूर्ण मौखिक टिप्पणी की है।

सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की संविधान पीठ ने माना कि साल 1962 में ‘सरदार सैयदना ताहिर सैफुद्दीन साहब बनाम बॉम्बे राज्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट का तत्कालीन फैसला गलत था, जिसने समुदाय से बाहर निकालने (Excommunication/सामाजिक बहिष्कार) पर रोक लगाने वाले बॉम्बे के कानून को पूरी तरह से असंवैधानिक घोषित कर दिया था। पीठ का नेतृत्व कर रहे सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, वर्ष 1962 के फैसले में अदालत को ‘पृथक्करणीयता का सिद्धांत’ (Doctrine of Severability) या ‘रीडिंग डाउन’ (कानून के दायरे को सीमित करना) की पद्धति अपनानी चाहिए थी। अदालत को यह व्यवस्था देनी चाहिए थी कि किसी सदस्य का धार्मिक कारणों के अलावा किसी अन्य सामाजिक या धर्मनिरपेक्ष कारण से बहिष्कार नहीं किया जा सकता।

क्या था 1962 का ‘सरदार सैयदना’ फैसला?

साल 1962 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से ‘बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ एक्सकम्यूनिकेशन एक्ट, 1949’ को रद्द कर दिया था।

बहुमत का फैसला: दाऊदी बोहरा समुदाय के धार्मिक प्रमुख (दामी/Dai) ने इस कानून को चुनौती दी थी। तब अदालत ने माना था कि संविधान के अनुच्छेद 26(b) के तहत किसी भी धार्मिक संप्रदाय को अपने मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार है। धार्मिक प्रमुख के पास अपने सदस्यों में अनुशासन बनाए रखने के लिए बहिष्कार करने की शक्ति होनी चाहिए।

अल्पमत का फैसला (Dissent): तत्कालीन सीजेआई बी.पी. सिन्हा ने इस फैसले से असहमति जताई थी। उन्होंने कहा था कि यह कानून अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत एक आवश्यक सामाजिक सुधार (Social Reform) है, जो मानवीय गरिमा की रक्षा करता है।

“संविधान पीठ ‘लक्ष्मण रेखा’ तय करने में विफल रही”: सीजेआई

9 जजों की पीठ के समक्ष केंद्रीय दाऊदी बोहरा समुदाय के बोर्ड की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने दलील दी कि व्यावहारिक रूप से यह बहिष्कार केवल धार्मिक उल्लंघन पर नहीं, बल्कि सामाजिक और धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों के लिए भी किया जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि धार्मिक प्रमुख की मर्जी के खिलाफ सहकारी समितियां बनाने, अपनी पसंद से शादी करने या महज कुछ पत्रिकाएं पढ़ने पर भी लोगों को समाज से बेदखल कर दिया गया।

यहां सीजेआई ने स्पष्ट किया

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने बेहद गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा, “जब तक यह धार्मिक प्रथाओं की अवहेलना या उल्लंघन का परिणाम है, तब तक [बहिष्कार की अनुमति दी जा सकती है]। लेकिन जिस क्षण यह ‘सामाजिक सुधारों’ की लक्ष्मण रेखा को पार करता है, इसे कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता। पूरे सम्मान के साथ, वर्ष 1962 की वह संविधान पीठ यहीं पर विफल रही। सीजेआई ने स्पष्ट किया कि अदालत को ‘एक ही हथौड़े से’ (Just one hammer) पूरे कानून को सिर्फ इसलिए ध्वस्त नहीं कर देना चाहिए था कि यह अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन करता है। अदालत को कानून की आनुपातिकता और तर्कसंगतता की जांच करनी चाहिए थी।

विश्लेषण: सुनवाई के दौरान उठे 2 बड़े मुद्दे

इस सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने दोपहर से पहले और बाद के सत्रों में अपनी इस कानूनी व्याख्या को दोहराया, जब बहस दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित महिला खतना (Female Genital Mutilation – FGM) की प्रथा पर केंद्रित हो गई।

बहस का मुख्य बिंदुवकीलों की दलीलें और सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण
महिला खतना (FGM) और बहिष्कार का डरवरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने दलील दी कि समुदाय के परिवार केवल इसलिए इस दर्दनाक प्रथा (FGM) को मानने के लिए मजबूर हैं क्योंकि उन्हें समाज से बहिष्कृत (Excommunicate) किए जाने का डर रहता है। दूसरी ओर, बचाव पक्ष के वकील निजाम पाशा ने दावा किया कि इस प्रथा को न मानने पर समाज से बाहर नहीं किया जाता।
पृथक्करणीयता का सिद्धांत (Severability)सीजेआई ने स्पष्ट किया कि यदि कोर्ट ‘डॉक्ट्रिन ऑफ सेवेरेबिलिटी’ लगाता, तो कानून का वह हिस्सा बच जाता जो नागरिकों को सामाजिक और नागरिक अधिकारों से वंचित होने से रोकता है। कानून को पूरी तरह खारिज करने के बजाय केवल उसके ‘अतार्किक’ हिस्से को अलग किया जाना चाहिए था।
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