Coordinate Bench: देश की शीर्ष अदालत ने आपराधिक न्याय प्रणाली और हाई कोर्ट के क्षेत्राधिकार से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मामले में बड़ी व्यवस्था दी है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया कि एक बेंच द्वारा दी गई जमानत को दूसरी को-ऑर्डिनेट बेंच रद्द नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी आरोपी ने अदालत के सामने गलत या झूठे तथ्य पेश करके जमानत (Bail) हासिल की है, तो हाई कोर्ट की कोई भी समपीठ या को-ऑर्डिनेट बेंच (Coordinate Bench – समान अधिकार वाली दूसरी बेंच) उस जमानत को रद्द कर सकती है। शीर्ष अदालत ने साफ लहजे में कहा, हम यह समझ पाने में असमर्थ हैं कि हाई कोर्ट ऐसा क्यों कहता है कि एक को-ऑर्डिनेट बेंच सह-आरोपी को दी गई जमानत को रद्द नहीं कर सकती। अगर हाई कोर्ट के सामने गलत तथ्य रखकर जमानत हासिल की गई है, तो अदालत हमेशा इस मामले को देख सकती है और उचित आदेश पारित कर सकती है।
क्या था पूरा मामला? (NDPS एक्ट और समानता का दावा)
आरोपी और धाराएं: यह कानूनी विवाद इलाहाबाद हाई कोर्ट के समक्ष आए एक ड्रग्स तस्करी से जुड़े मामले से शुरू हुआ था। आरोपी सूरज महानंदा (Suraj Mahananda) के खिलाफ स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act) की धारा 21(c) (व्यावसायिक मात्रा में प्रतिबंधित नशीली दवाएं रखना) और धारा 29 (आपराधिक साजिश) के तहत मामला दर्ज था।
समानता (Parity) के आधार पर मांग: सूरज ने हाई कोर्ट में इस आधार पर जमानत मांगी थी कि उसके सह-आरोपी बाबू चटर्जी (Babu Chatterjee) को हाई कोर्ट की ही एक अन्य को-ऑर्डिनेट बेंच से पहले ही जमानत मिल चुकी है, इसलिए उसे भी समानता के सिद्धांत (Parity) पर रिहा किया जाए।
हाई कोर्ट का तकनीकी पेंच और सुप्रीम कोर्ट की फटकार
- सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट के सामने एक चौंकाने वाला तथ्य आया। अदालत को बताया गया कि सह-आरोपी बाबू चटर्जी ने कोर्ट को गुमराह करके और गलत तथ्य रखकर जमानत ली थी। बाबू ने अदालत से झूठ बोला था कि केस में अभी लगभग 25 गवाहों की जांच होनी बाकी है (जिससे ट्रायल लंबा खिंचने की संभावना बने), जबकि असलियत यह थी कि केवल 13 गवाह ही बचे थे।
- इस धोखाधड़ी के सामने आने के बावजूद, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बाबू की जमानत रद्द करने के आवेदन पर विचार करने से इनकार कर दिया। हाई कोर्ट का तर्क था कि चूंकि जमानत किसी दूसरी बेंच (Coordinate Bench) ने दी है, इसलिए वे तकनीकी रूप से इसे रद्द नहीं कर सकते। हालांकि, हाई कोर्ट ने सूरज को भी जमानत देने से मना कर दिया।
- जब सूरज ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की, तो शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के इस रवैये पर गंभीर सवाल उठाए। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धोखाधड़ी या तथ्यों को गलत तरीके से पेश करके (Misrepresentation of facts) प्राप्त किया गया कोई भी न्यायिक आदेश कानून की नजर में टिक नहीं सकता, और उसे सुधारने का अधिकार उसी स्तर की दूसरी बेंच के पास भी होता है।
विश्लेषण: सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और अंतिम आदेश
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में खुद सह-आरोपी बाबू चटर्जी की जमानत को तकनीकी कारणों से रद्द नहीं किया, लेकिन उसने मुख्य याचिकाकर्ता सूरज महानंदा की वास्तविक स्थिति को देखते हुए उसे बड़ी राहत दी।
| पक्ष और परिस्थितियां | सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्देश |
| याचिकाकर्ता (सूरज) की कस्टडी | अदालत ने नोट किया कि सूरज पहले ही 1 साल और 10 महीने से अधिक समय जेल में काट चुका है। |
| ट्रायल की कछुआ चाल | इतनी लंबी अवधि बीत जाने के बाद भी निचली अदालत (Trial Court) में अब तक केवल 1 गवाह का ही परीक्षण हो सका था। |
| अदालत का फैसला | कस्टडी की लंबी अवधि और ट्रायल की धीमी गति को आधार बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सूरज महानंदा की जमानत मंजूर कर ली। |
| निचली अदालत को निर्देश | सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट को सख्त निर्देश दिया कि इस मामले की सुनवाई में तेजी लाई जाए (Expedite the trial)। |

