Law Officers: मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु में सरकारी वकीलों यानी लॉ ऑफिसर्स (Law Officers) की नियुक्तियों में राजनीतिक दखल और सिफारिशों के गंभीर आरोपों को लेकर सख्त रुख अपनाया है।
राज्य सरकार स्टेटस रिपोर्ट जल्द दाखिल करें: अदालत
हाई कोर्ट की मदुरै पीठ के जस्टिस सतीश कुमार और जस्टिस जोथिरामन की खंडपीठ ने वकील सी. सेल्वकुमार द्वारा दायर एक अंतरिम याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। यह याचिका मद्रास हाई कोर्ट और उसकी मदुरै पीठ में सरकारी वकीलों की नियुक्ति की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली एक लंबित जनहित याचिका (PIL) का हिस्सा है। अदालत ने राज्य सरकार को एक स्टेटस रिपोर्ट (स्थिति रिपोर्ट) दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि क्या इन नियुक्तियों में किसी राजनीतिक दल की भूमिका है। मदरास हाई कोर्ट ने इन दलीलों को गंभीरता से लेते हुए सरकार से इस पूरे मामले की सच्चाई और प्रक्रिया पर स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।
क्या है पूरा विवाद? (सोशल मीडिया पर वायरल हुई 181 वकीलों की सूची)
याचिकाकर्ता का दावा: यह पूरा कानूनी और राजनीतिक विवाद सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक कथित दस्तावेज़ से शुरू हुआ है। याचिकाकर्ता सी. सेल्वकुमार ने अदालत को बताया कि वर्तमान में सोशल मीडिया पर एक सूची/दस्तावेज़ धड़ल्ले से घूम रहा है। यह दस्तावेज़ कथित तौर पर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के लॉ डिपार्टमेंट (कानूनी विभाग) द्वारा तैयार किया गया है।
राजनीतिक सिफारिश का आरोप: इस सूची में तमिलनाडु के विभिन्न न्यायालयों, मद्रास हाई कोर्ट और यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व करने के लिए 181 अधिवक्ताओं के नामों की सिफारिश की गई है। इन पदों में एडिशनल एडवोकेट जनरल (AAG), स्टैंडिंग काउंसिल, स्पेशल गवर्नमेंट प्लीडर, सरकारी वकील और एडिशनल पब्लिक प्रोसिक्यूटर (APP) जैसे महत्वपूर्ण पद शामिल हैं।
अदालती आदेशों का उल्लंघन: याचिका में आरोप लगाया गया है कि तमिलनाडु सरकार (जो कि द्रमुक-DMK के नेतृत्व वाली है और कांग्रेस उसकी सहयोगी है) नियमित नियुक्तियों के लिए इस राजनीतिक सूची पर सक्रियता से विचार कर रही है, जो पूरी तरह से गैर-कानूनी है।
याचिका में यह स्पष्ट रूप से कहा गया
यह सिफारिश योग्यता (Meritocracy) और पारदर्शिता के उन सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन करती है, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने ‘ममता मोहंती बनाम ओडिशा राज्य’ मामले में अनिवार्य घोषित किया था। यदि इस तरह की सिफारिशों के आधार पर नियुक्तियाँ की गईं, तो यह मद्रास हाई कोर्ट लॉ ऑफिसर्स (नियुक्ति) नियम, 2017 का खुला उल्लंघन होगा।
अंतरिम नियुक्तियों के बीच उठा विवाद
15 मई की नियुक्तियां: यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब तमिलनाडु सरकार ने मई महीने में हाई कोर्ट में कई अस्थायी और अंतरिम नियुक्तियां की थीं। राज्य सरकार ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं—पी.वी. बालसुब्रमण्यम और टी. गौथमन को अस्थायी रूप से एडिशनल एडवोकेट जनरल (AAG) नियुक्त किया था। इसके अलावा वरिष्ठ अधिवक्ता आर. जॉन सत्यन को आपराधिक मामलों के लिए राज्य का काउंसिल बनाया गया था। ये नियुक्तियां 2017 के नियमों की धारा 5(11) के तहत नियमित नियुक्तियाँ होने तक की गई थीं।
26 मई का आदेश: सरकार ने दीवानी (Civil) मामलों के लिए भी 17 अस्थायी वकीलों की नियुक्ति का आदेश जारी किया था।
नई भर्तियों की प्रक्रिया चालू: इस बीच, 25 मई को तमिलनाडु के गृह विभाग ने आपराधिक मामलों के लिए ‘गवर्नमेंट एडवोकेट’ के पदों पर आवेदन मंगाने के लिए एक अधिसूचना भी जारी की है।
विश्लेषण: याचिकाकर्ता की मुख्य कानूनी दलीलें
याचिकाकर्ता ने अदालत से इस भर्ती प्रक्रिया पर तुरंत रोक लगाने या रिपोर्ट मांगने की गुहार लगाई थी, जिसके पीछे निम्नलिखित कानूनी तर्क दिए गए।
| याचिकाकर्ता की मुख्य आपत्तियाँ | प्रशासनिक और कानूनी प्रभाव |
| पारदर्शिता का अभाव | लॉ ऑफिसर्स राज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं, न कि किसी राजनीतिक दल का। राजनीतिक विंग (AICC) की लिस्ट से नाम चुनना न्यायिक निष्पक्षता को प्रभावित करता है। |
| तीसरे पक्ष के अधिकारों का निर्माण (Third-Party Rights) | यदि मुख्य जनहित याचिका (PIL) के लंबित रहने के दौरान ही सरकार ने राजनीतिक प्रभाव में वकीलों की नियमित नियुक्तियाँ कर दीं, तो उन वकीलों के ‘तीसरे पक्ष के अधिकार’ स्थापित हो जाएंगे। इसके बाद उन्हें हटाना या प्रक्रिया को सुधारना और मुश्किल हो जाएगा, जिससे मुख्य केस का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। |

