Friday, June 12, 2026
HomeHigh CourtBar-Bench Guideline: यौन अपराध पीड़ितों की पहचान छिपाने के लिए क्या बने...

Bar-Bench Guideline: यौन अपराध पीड़ितों की पहचान छिपाने के लिए क्या बने वकीलों और कोर्ट के स्टाफ के लिए नियम

Bar-Bench Guideline: उड़ीसा हाई कोर्ट ने यौन अपराधों और पोक्सो एक्ट के पीड़ितों की गोपनीयता और सामाजिक सम्मान की रक्षा के लिए एक बेहद कड़ा और व्यापक स्टैंडिंग ऑर्डर जारी किया है।

डिजिटल सिस्टम में पीड़िता की पहचान उजागर नहीं होगी

हाई कोर्ट का यह कदम सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में स्टेट ऑफ हिमाचल प्रदेश बनाम हुकम चंद उर्फ मोनू (2026) मामले में व्यक्त की गई गंभीर चिंता के बाद आया है, जिसमें शीर्ष अदालत ने पीड़ितों की पहचान उजागर होने पर मातहत अदालतों (Lower Courts) और रजिस्ट्री के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई थी। इस प्रशासनिक आदेश के तहत अब अदालत के रिकॉर्ड, फैसलों, याचिकाओं या डिजिटल सिस्टम में किसी भी स्तर पर पीड़िता की पहचान (नाम, पता, या पारिवारिक विवरण) को उजागर करने पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है।

विभिन्न हितधारकों (Stakeholders) के लिए तय की गई नई जिम्मेदारियां

उड़ीसा हाई कोर्ट ने इस आदेश के जरिए वकीलों से लेकर कोर्ट के प्रशासनिक स्टाफ तक, हर स्तर पर जवाबदेही तय की है।

वकीलों (Advocates) के लिए अनिवार्य नियम: अब वकीलों को अपनी याचिका/पिटीशन के पहले ही पृष्ठ (First Page) पर सबसे ऊपर स्पष्ट रूप से लिखना होगा कि मामला किस श्रेणी का है—यानी वह पोक्सो एक्ट (POCSO Act) का है, या आईपीसी/भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत किसी यौन अपराध से जुड़ा है। वकीलों के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि वे संवेनशील जानकारी को हटाकर दस्तावेजों का एक संशोधित/हटाया हुआ संस्करण (Redacted Version) एडिशनल डिप्टी रजिस्ट्रार के सामने पेश करें।

स्टैम्प रिपोर्टर्स (Stamp Reporters) के लिए निर्देश: यदि किसी याचिका, एफिडेविट (हलफनामे), वकालतनामे या संलग्न दस्तावेजों (Annexures) में पीड़िता का नाम, पता या कोई भी पहचान छुपाने वाली जानकारी पाई जाती है, तो स्टैम्प रिपोर्टर उसे तुरंत ‘डिफेक्ट’ (कानूनी त्रुटि/Defect) मानकर केस को आगे बढ़ने से रोक देंगे।

पुराने और लंबित मामलों (Existing/Pending Cases) के लिए नियम: यह आदेश केवल नए मामलों पर ही नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले निपुण सक्सेना बनाम भारत संघ (2018) से पहले के लंबित पड़े सभी मामलों पर भी लागू होगा। रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया है कि जिन पुराने फैसलों या आदेशों में पीड़िता का नाम दर्ज है, उनकी मूल कॉपी को ‘सील कवर’ (Sealed Cover) में सुरक्षित रखा जाए और कोर्ट या पार्टियों के उपयोग के लिए उसका एक मास्क/अनाम संस्करण (Masked and Anonymized Version) तैयार किया जाए।

पेपरलेस कोर्ट (Paperless Court) और डिजिटल सुरक्षा

चूंकि उड़ीसा हाई कोर्ट देश में पेपरलेस (डिजिटल) अदालती प्रणाली को अपनाने में सबसे आगे रहा है, इसलिए डिजिटल रिकॉर्ड को लेकर भी सख्त गाइडलाइन दी गई है। सुनवाई के दौरान बेंच (जज), सरकारी वकीलों और संबंधित पक्षों के स्क्रीन पर केवल रेडैक्टेड (पहचान मिटाई हुई) डिजिटल कॉपियां ही दिखाई देंगी। जब तक कोर्ट का कोई विशेष निर्देश न हो, मूल अनरेडैक्टेड फाइल को किसी के लिए भी डिजिटल रूप से सुलभ (Accessible) नहीं बनाया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: ‘अदालतों की उदासीनता और अज्ञानता’

सुप्रीम कोर्ट ने हुकम चंद (2026) मामले में आईपीसी की धारा 228-ए (जो अब बीएनएस की धारा 72 है) के बार-बार होने वाले उल्लंघन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए देश के सभी हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश जारी किए थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह कानून में एक बहुत पुराना और स्थापित प्रावधान है, लेकिन इसके बावजूद इसका पालन नहीं किया जा रहा है। इसका मुख्य कारण निचली अदालतों की सामान्य उदासीनता (General Indifference) और शायद इस बात की जागरूकता की कमी (Lack of Awareness) है कि पहचान उजागर होने से पीड़ित को समाज में कितने गहरे कलंक (Stigma) का सामना करना पड़ता है।

विश्लेषण: जस्टिस एस.के. साहू का ‘कटक मॉडल’ (Dabu Case, 2024)

उड़ीसा हाई कोर्ट के इस स्टैंडिंग ऑर्डर की नींव असल में जस्टिस संगम कुमार साहू (तत्कालीन जज) द्वारा दाबू उर्फ संतोष कुमार मुंडा बनाम ओडिशा राज्य (2024) में दी गई एक बेहद नवोन्मेषी और अनूठी प्रक्रिया (Innovative Procedure) पर टिकी है। जस्टिस साहू ने अदालती रिकॉर्ड में पीड़ितों के हस्ताक्षर और गवाही दर्ज करने के लिए एक अभूतपूर्व व्यवस्था दी थी, जिसे अब पूरी तरह लागू किया जा रहा है।

अदालती प्रक्रिया (Stage)नया नियम और सुरक्षात्मक ढांचा (The Dynamic Grid)
गवाही शीट (Deposition Sheet)मुख्य गवाही या जिरह के दौरान पीड़िता का नाम कहीं नहीं लिखा जाएगा। उसे केवल ‘Victim’ (पीड़िता) के रूप में संबोधित किया जाएगा।
पीड़िता के हस्ताक्षर (Victim’s Signature)पीड़िता के हस्ताक्षर गवाही शीट पर नहीं लिए जाएंगे। इसके बजाय एक ‘अलग कागज’ (Separate Sheet) पर ट्रायल जज की मौजूदगी में हस्ताक्षर कराए जाएंगे।
सील कवर सुरक्षाजज के प्रमाण पत्र और तारीख के साथ उस हस्ताक्षर वाले अलग कागज को तुरंत सील कवर में बंद कर दिया जाएगा, जिसे केवल कोर्ट ही देख सकेगा।
मजिस्ट्रेट के सामने बयान (Sec 164)यही सील कवर वाली प्रक्रिया धारा 164 (अब नए कानून के तहत संबंधित धारा) के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज होने वाले बयानों पर भी अनिवार्य रूप से लागू होगी।
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
clear sky
35.7 ° C
35.7 °
35.7 °
38 %
7.1kmh
6 %
Fri
36 °
Sat
43 °
Sun
43 °
Mon
44 °
Tue
45 °

Recent Comments