Friday, July 31, 2026
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Grave Misconduct: 3 साल तक बिना बताए क्यों ड्यूटी से गायब रहा RBI कर्मचारी…अनिवार्य सेवानिवृत्ति का मिला जवाब, जानिए केस

Grave Misconduct: रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) जैसे देश के शीर्ष बैंकिंग संस्थान में बिना किसी पूर्व सूचना या मंजूरी के लंबे समय तक ड्यूटी से गायब रहने वाले कर्मचारियों को बॉम्बे हाई कोर्ट से कोई राहत नहीं मिलेगी।

आरबीआई के एक पूर्व वरिष्ठ सहायक के खिलाफ फैसला

हाई कोर्ट के जस्टिस आर. आई. छागला और जस्टिस अद्वैत एम. सेठना की खंडपीठ ने 10 जून 2026 को पूर्व कर्मचारी अनिमेष बाकुली की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने 13 फरवरी 2023 को जारी कंपलसरी रिटायरमेंट के आदेश को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता ने बैंक द्वारा रोकी गई सैलरी, भत्ते और अन्य लाभों को भी बहाल करने की मांग की थी, जिसे अदालत ने नामंजूर कर दिया। बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) ने आरबीआई के एक पूर्व वरिष्ठ सहायक (Senior Assistant) को अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त करने के केंद्रीय बैंक के फैसले को पूरी तरह सही ठहराया है। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि आरबीआई जैसे जिम्मेदार संस्थान में बिना अनुमति के गायब रहना निश्चित रूप से ‘जनहित के लिए हानिकारक’ (Detrimental to Public Interest) है।

यह रही पीठ की टिप्पणी

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए अपने आदेश में कहा, याचिकाकर्ता प्रतिवादी (RBI) के अधीन ‘वरिष्ठ सहायक’ के पद पर कार्यरत थे। वे एक जिम्मेदार पद पर आसीन थे, जहां से उन्होंने लगभग तीन साल तक खुद को अनधिकृत रूप से अनुपस्थित रखा। जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी माना है, इस तरह की अनधिकृत अनुपस्थिति निःसंदेह जनहित के लिए हानिकारक है और इसे ‘गंभीर कदाचार’ (Grave Misconduct) की श्रेणी में रखा जाएगा, जिसके लिए सेवा से बर्खास्तगी तक की सजा दी जा सकती है।

मामला क्या था? (ट्रांसफर नहीं मिला तो 3 साल तक नहीं आए ऑफिस)

अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, अनिमेष बाकुली की नियुक्ति 28 जनवरी 2013 को आरबीआई में अस्थायी तौर पर सहायक (Class III) के पद पर हुई थी।

स्थायीकरण और प्रमोशन: 6 महीने का प्रोबेशन पूरा होने के बाद 1 अगस्त 2013 को उन्हें स्थायी कर्मचारी बना दिया गया। बाद में 31 जनवरी 2018 को उन्हें पदोन्नत कर ‘वरिष्ठ सहायक’ नामित किया गया।

ट्रांसफर की जिद: 2017 और 2018 के बीच याचिकाकर्ता ने कोलकाता ट्रांसफर किए जाने के लिए आरबीआई प्रबंधन से कई बार अनुरोध किया। प्रशासनिक कारणों से आरबीआई ने उनके ट्रांसफर अनुरोध को खारिज कर दिया।

2020 से गायब: ट्रांसफर न मिलने से नाराज होकर याचिकाकर्ता 19 मार्च 2020 से बिना किसी पूर्व सूचना या अनुमति के ड्यूटी से गायब हो गए। वे लगातार तीन साल तक अपने रिपोर्टिंग ऑफिसर को बताए बिना काम से दूर रहे।

बैंक ने दिए कई मौके, पर कर्मचारी ने साधी चुप्पी

आरबीआई की ओर से पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एस. यू. कामदार ने अदालत को बताया कि बैंक ने याचिकाकर्ता को वापस काम पर लौटने या मेडिकल सर्टिफिकेट के साथ छुट्टी का औपचारिक आवेदन देने के लिए कई ईमेल भेजे थे।

लेकिन कर्मचारी की तरफ से न तो इन संचारों का कोई जवाब दिया गया और न ही अनुपस्थिति का कोई स्पष्टीकरण दिया गया। इसके बाद बैंक ने इसे ‘पद का परित्याग’ (Abandonment of Post) मानते हुए अनुशासनात्मक कार्यवाही (Disciplinary Proceedings) शुरू की और ३१ जनवरी २०२३ को उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सजा दे दी।

कर्मचारी का बचाव: खुद अपनी पैरवी कर रहे याचिकाकर्ता ने दलील दी कि यह फैसला मनमाना, अनैतिक और असंवैधानिक है। उन्होंने अपनी अनुपस्थिति के पीछे कोविड-19 महामारी, माता-पिता की खराब सेहत और कोलकाता ट्रांसफर न किए जाने को मुख्य वजह बताया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि दिसंबर 2020 से उनकी सैलरी और भत्ते बिना किसी नोटिस के रोक दिए गए थे, जो कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) का उल्लंघन है।

विश्लेषण: बॉम्बे हाई कोर्ट का विधिक निर्णय

अदालत ने याचिकाकर्ता की सभी दलीलों को खारिज करते हुए साफ किया कि महामारी या पारिवारिक कारणों का बहाना बनाकर कोई भी कर्मचारी तीन साल तक संस्थान को बिना बताए लापता नहीं रह सकता।

मुख्य बिंदु / केस फैक्ट्सअदालत का विधिक निष्कर्ष (Legal Verdict)
याचिकाकर्ताअनिमेष बाकुली (पूर्व वरिष्ठ सहायक, RBI)
अनधिकृत अनुपस्थिति की अवधिमार्च 2020 से जनवरी 2023 तक (लगभग 3 वर्ष)।
आरबीआई की दंडात्मक कार्रवाईसेवा से अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement)।
हाई कोर्ट का फैसलाआरबीआई का फैसला बरकरार; सैलरी और भत्ते बहाल करने की याचिका खारिज।
कानूनी सिद्धांतजब कोई कर्मचारी खुद ड्यूटी पर नहीं आ रहा हो, तो उसे सस्पेंशन (निलंबन) पर रखने या जबरन वेतन देने का कोई कानूनी औचित्य नहीं बनता।
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