Sexual Assault: मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै खंडपीठ ने नाबालिगों के बीच कथित सहमति वाले प्रेम संबंधों और पॉक्सो कानून के सख्त विधिक प्रावधानों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है।
किसी भी प्रकार की ‘सहमति’ का कानून की नजर में कोई मूल्य नहीं
हाईकोर्ट के जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश और जस्टिस के.के. रामकृष्णन की खंडपीठ ने इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया कि यह कानून उन किशोरों या युवाओं को दंडित करने के लिए नहीं है जो आपसी समझ के साथ रिश्ते में आते हैं। अदालत ने साफ कर दिया है कि पॉक्सो अधिनियम के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे द्वारा दी गई किसी भी प्रकार की ‘सहमति’ का कानून की नजर में कोई मूल्य नहीं है, और ऐसे मामलों में “रोमांटिक रिलेशनशिप” को बचाव का आधार नहीं बनाया जा सकता।
पॉक्सो एक्ट कहीं भी ऐसे रोमांटिक संबंधों की परिकल्पना नहीं करता
अदालत ने कानून के मूल उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए अपने आदेश में कहा, यह दलील सुनने में बहुत आकर्षक और रोमांटिक लग सकती है, लेकिन पॉक्सो एक्ट कहीं भी ऐसे रोमांटिक संबंधों की परिकल्पना नहीं करता और न ही ऐसी कोई छूट देता है जहां किसी बच्चे को यौन उत्पीड़न (Sexual Assault) का शिकार बनाया गया हो। कानून की नजर में 18 वर्ष से कम उम्र का बच्चा सहमति देने के लिए पूरी तरह अक्षम (Incapable) है। यदि सहमति को बचाव का आधार मान लिया जाए और अदालतें इस पर अमल करने लगें, तो इसके बहुत गंभीर परिणाम होंगे और यह पॉक्सो अधिनियम के मूल उद्देश्य के ही खिलाफ होगा।
मामले की पृष्ठभूमि: प्रेम संबंध से लेकर आत्महत्या के प्रयास तक
यह मामला एक युवक (अरुमुगम) द्वारा दायर अपील पर आधारित था, जिसे निचली अदालत (अतिरिक्त महिला एवं सत्र न्यायालय, श्रीविल्लीपुत्तुर) ने प्राकृतिक जीवन के अंत (उम्रकैद) की सजा सुनाई थी।
अभियोजन का मामला: आरोपी और पीड़िता एक-दूसरे को तब से जानते थे जब लड़की 8 वीं कक्षा में थी। जब वह 11 वीं कक्षा में आई, तो आरोपी ने शादी का झांसा देकर उसके साथ बार-बार शारीरिक संबंध बनाए, जिसके कारण वह गर्भवती हो गई।
शादी से इनकार और विवाद: जब लड़की ने शादी के लिए कहा, तो आरोपी ने कथित तौर पर उसकी जातीय पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए शादी से मना कर दिया और उससे “जाकर मर जाने” को कहा। प्रताड़ना से तंग आकर लड़की ने जहर खाकर आत्महत्या का प्रयास किया। बाद में अस्पताल में इलाज के दौरान उसने एक बच्चे को जन्म दिया। इसके बाद उसकी मां ने पॉक्सो के तहत मामला दर्ज कराया।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण और सजा में संशोधन
हाई कोर्ट ने मामले के विभिन्न विधिक और संवैधानिक पहलुओं की गहन समीक्षा की और सजा को संशोधित करते हुए महत्वपूर्ण निर्णय दिए।
पॉक्सो और सहमति का सिद्धांत
अदालत ने दोहराया कि भले ही अभियोजन पक्ष की कहानी के अनुसार दोनों के बीच संबंध सहमति से बने थे, लेकिन चूंकि पीड़िता नाबालिग थी, इसलिए यह विधिक रूप से ‘मजबूरन प्रवेशीय यौन हमला’ (Aggravated Penetrative Sexual Assault) के दायरे में ही आएगा। आरोपी को इस कानून के तहत भुगतना ही होगा।
एससी/एसटी एक्ट (SC/ST Act) के आरोपों से बरी
अदालत ने आरोपी को एससी/एसटी अधिनियम के आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट का विधिक निष्कर्ष था कि उनके बीच के शारीरिक संबंध या यौन कृत्य पीड़िता की जाति के कारण या उसे अपमानित करने के लिए नहीं किए गए थे, बल्कि यह समय के साथ विकसित हुए एक व्यक्तिगत संबंध का परिणाम थे।
आत्महत्या के लिए उकसाने (Abetment of Suicide) से बरी
कोर्ट ने आरोपी को आईपीसी की धारा 306/511 (आत्महत्या के प्रयास के दुष्प्रेरण) के आरोप से भी बरी किया। अदालत ने माना कि केवल यह कह देना कि “जाकर मर जाओ”, कानूनन आत्महत्या के लिए उकसाना (Instigation) नहीं माना जा सकता। साथ ही, मेडिकल गवाहों के बयानों में भी इस बात को लेकर संशय था कि लड़की ने वास्तव में जहर खाया था या नहीं।
भूतलक्षी प्रभाव’ (Retrospective Effect) पर संवैधानिक रोक
निचली अदालत ने आरोपी को उसके पूरे प्राकृतिक जीवन (शेष जीवनकाल) के लिए जेल की सजा सुनाई थी। हाई कोर्ट ने इस पर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक बिंदु रेखांकित किया। कथित अपराध 16 अगस्त 2019 से पहले हुआ था, जिस दिन पॉक्सो एक्ट में कड़ा संशोधन लागू हुआ था। अनुच्छेद 20(1) (Constitution of India): भारत का संविधान यह व्यवस्था देता है कि किसी भी व्यक्ति को अपराध के समय लागू कानून में तय सजा से अधिक सजा नहीं दी जा सकती (Criminal laws cannot be applied retrospectively)। इसलिए, कोर्ट ने उम्रकैद की सजा को घटाकर 10 वर्ष के कठोर कारावास (Rigorous Imprisonment) और ₹5,000 के जुर्माने में बदल दिया।
विधिक सारांश (Case Summary)
| विधिक बिंदु | निचली अदालत का फैसला | मद्रास हाई कोर्ट का अंतिम विधिक आदेश (2026) |
| पॉक्सो एक्ट (POCSO) | दोषी (प्राकृतिक जीवन की उम्रकैद) | दोषसिद्धि बरकरार; लेकिन सजा घटाकर 10 वर्ष का कठोर कारावास की गई (संवैधानिकता के आधार पर)। |
| एससी/एसटी एक्ट | दोषी | पूरी तरह बरी; संबंध जातिगत दुर्भावना पर आधारित नहीं थे। |
| आत्महत्या का उकसावा | दोषी | पूरी तरह बरी; “जाकर मर जाओ” कहना विधिक रूप से उकसाना नहीं है। |
| सहमति की दलील | खारिज | पूरी तरह खारिज; नाबालिग की सहमति कानूनन शून्य है। |

