केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक श्रेणियां / बिंदु | कर्नाटक उच्च न्यायालय की कार्यवाही (2026) |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस सूरज गोविंदराज |
| संबंधित कानून | एआरटी अधिनियम, 2021 (Assisted Reproductive Technology Act, 2021) |
| मुख्य विधिक प्रश्न | क्या तलाक के दौरान पति की असहमति के बावजूद पत्नी डोनर स्पर्म से IVF करा सकती है? |
| कोर्ट का अंतरिम रुख | पति को स्पर्म देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, लेकिन महिला के मातृत्व अधिकार के लिए डोनर स्पर्म के इस्तेमाल की कानूनी संभावनाओं की जांच होगी। |
| पति की सुरक्षा | डोनर स्पर्म से पैदा हुए बच्चे पर पति की भरण-पोषण या संपत्ति संबंधी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी। |
Donor Sperm: विवाह संबंधी विवादों, आधुनिक तकनीकों (IVF) और मातृत्व के मौलिक अधिकार से जुड़ा एक बेहद जटिल कानूनी और सामाजिक प्रश्न कर्नाटक हाईकोर्ट के समक्ष आया है।
जस्टिस सूरज गोविंदराज की एकल पीठ इस अनोखे और अभूतपूर्व मामले की सुनवाई कर रही है। उच्च न्यायालय यह परीक्षण करने के लिए तैयार हो गया है कि क्या तलाक का मुकदमा लंबित रहने के दौरान एक विवाहित महिला अपने पति की सहमति के बिना दाता शुक्राणु (Donor Sperm) का उपयोग करके बच्चे को जन्म दे सकती है?
मामला क्या था? (Case Background)
- यह मामला एक दंपति के बीच चल रहे तलाक के मुकदमे और एक महिला के मातृत्व के अधिकार से जुड़ा है।
- IVF की विफलता और विवाद: याचिकाकर्ता (पत्नी) और उसके पति की यह दूसरी शादी थी। प्राकृतिक रूप से बच्चा न होने पर दोनों ने 7-8 बार आईवीएफ (IVF) प्रक्रिया करवाई। दंपति के एग्स (Eggs) और स्पर्म (Sperm) के सैंपल एक आईवीएफ क्लिनिक में सुरक्षित रखे गए हैं।
- सहमति वापस लेना: इस बीच दोनों के बीच वैवाहिक विवाद शुरू हो गया और पति ने तलाक की अर्जी दाखिल कर दी। साथ ही उसने क्लिनिक में रखे अपने स्पर्म के इस्तेमाल के लिए दी गई सहमति (Consent) वापस ले ली।
- समय बीतने का डर: महिला के वकील ने तर्क दिया कि पति की पहली शादी से बच्चा है, लेकिन याचिकाकर्ता अभी तक निःसंतान है। तलाक के मुकदमे में वर्षों लग सकते हैं और तब तक महिला की जैविक उम्र (Biological Clock) निकल जाएगी। इसलिए, यदि पति अपने स्पर्म के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दे रहा, तो महिला को ‘डोनर स्पर्म’ (Donor Sperm) के जरिए मातृत्व सुख पाने की इजाजत दी जाए।
हाई कोर्ट का दृष्टिकोण: “कानून और तकनीक का संतुलन जरूरी”
जस्टिस सूरज गोविंदराज ने सुनवाई के दौरान बेहद मानवीय और प्रगतिशील रुख अपनाते हुए कहा, यह मामला केवल तकनीकी या पूरी तरह से विधिक नहीं है। हम इसे सिर्फ तकनीकी चश्मे से नहीं देख सकते। यह नई तकनीक का युग है और नई समस्याएं सामने आएंगी। हमें कानून की सीमाओं में रहकर समस्या का समाधान खोजना होगा और राहत देनी होगी।
पति को मजबूर नहीं किया जा सकता
अदालत ने माना कि कानून के तहत पति को अपने संरक्षित स्पर्म का उपयोग करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। लेकिन कोर्ट इस बात की जांच करेगा कि क्या कानून महिला के मातृत्व के अधिकार (Right to Motherhood) की रक्षा के लिए वैकल्पिक रास्ते की अनुमति देता है।
पति के कानूनी और वित्तीय अधिकारों का संरक्षण
कोर्ट ने पति के पक्ष से पूछा कि उनकी आपत्ति किस बात पर है—अपने स्पर्म के इस्तेमाल पर या पत्नी के मां बनने पर? पीठ ने सुझाव दिया कि यदि महिला को डोनर स्पर्म से बच्चा पैदा करने की अनुमति दी जाती है, तो पति को उस बच्चे के किसी भी कानूनी, वित्तीय या भरण-पोषण (Maintenance/Property) के दायित्व से पूरी तरह मुक्त कर दिया जाएगा। जन्म लेने वाला बच्चा पति की संपत्ति या उत्तराधिकार का दावा नहीं कर सकेगा।
केंद्र सरकार (Union of India) का रुख
केंद्र सरकार की ओर से उपस्थित अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) साधना देसाई ने सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) अधिनियम, 2021 (ART Act) का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि एक्ट केवल ‘कमीशनिंग कपल्स’ (पति-पत्नी दोनों की सहमति) या ‘एकल महिलाओं’ को ही अनुमति देता है। जब तक वे कानूनी रूप से विवाहित हैं, तब तक वैधानिक ढांचे से बाहर जाकर डोनर IVF की अनुमति देना पितृत्व और जन्म पंजीकरण से जुड़ी कानूनी जटिलताएं पैदा कर सकता है।
उच्च न्यायालय की आगामी दिशा
जस्टिस गोविंदराज ने टिप्पणी की कि अदालतें अक्सर ऐसे मुद्दों का सामना करती हैं जिनके बारे में विधायिका ने पहले से विचार नहीं किया होता। हालांकि, कोई भी राहत कानून के दायरे में ही दी जाएगी।
अदालत ने दोनों पक्षों को आपसी सहमति से समाधान निकालने का भी सुझाव दिया है और मामले की सुनवाई अगली तारीख के लिए स्थगित कर दी है।

