Tuesday, August 4, 2026
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Civil Imprisonment: प्रशासनिक अधिकारी का ऐसा अड़ियल रवैया पहले कभी नहीं देखा…HIV+ व्यक्ति की अवैध हिरासत का क्या है मामला, पढ़ें

Civil Imprisonment: राजस्थान हाईकोर्ट ने शासकीय शक्तियों के दुरुपयोग, अमानवीयता और वरिष्ठ अधिकारियों के विधिक आदेशों की खुली अवहेलना करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों पर अब तक का सबसे सख्त रुख अपनाया है।

हाई कोर्ट के जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने तहसीलदार तेजपाल पारीक के इस कृत्य को कानून के शासन के लिए एक गंभीर खतरा माना। अदालत ने एक गंभीर रूप से बीमार (HIV पीड़ित) व्यक्ति को जमानत/सजा निलंबन के बावजूद 53 दिनों तक जेल में बंद रखने के मामले में संबंधित तहसीलदार के खिलाफ न केवल विभागीय अनुशासनात्मक जांच (Disciplinary Inquiry) का आदेश दिया है, बल्कि अपनी जेब से ₹2लाख का हर्जाना (Compensation) भरने का भी ऐतिहासिक निर्देश दिया है।

यह रही अदालत की टिप्पणी

अदालत ने कार्यपालिका की निरंकुशता पर बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए अपने आदेश में कहा, राजस्व प्रशासन के एक अधिकारी द्वारा एक बीमार और असहाय व्यक्ति को उसके वरिष्ठ अधिकारी द्वारा सजा निलंबन (Suspension of Sentence) का आदेश पारित होने, बंदी की पत्नी द्वारा बार-बार दिए गए ज्ञापनों और हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर होने के बावजूद हिरासत में रखना… तहसीलदार द्वारा कानून के शासन के प्रति दिखाई गई यह हठधर्मिता, अड़ियल रवैया और अवज्ञा ऐसी है जिसका इस अदालत ने पहले कभी सामना नहीं किया है और उम्मीद है कि भविष्य में कभी ऐसा नहीं देखना पड़ेगा।

मामले की पृष्ठभूमि: भूमि अतिक्रमण से लेकर अवैध हिरासत तक

यह मामला राजस्थान के एक स्थानीय क्षेत्र में सरकारी भूमि पर अतिक्रमण से जुड़ा था।

सजा का आदेश: राजस्व अधिकारियों द्वारा अतिक्रमण का दोषी पाए जाने के बाद, पीड़ित व्यक्ति को 5 मार्च 2026 को राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम (Rajasthan Land Revenue Act) के तहत तीन महीने के नागरिक कारावास (Civil Imprisonment) की सजा सुनाई गई थी। जिला कलेक्टर ने भी उसकी अपील खारिज कर दी थी।

वरिष्ठ कोर्ट से राहत: इसके बाद, पीड़ित ने अतिरिक्त संभागीय आयुक्त (Additional Divisional Commissioner) के समक्ष अपील की। वहां 15 अप्रैल 2026 को पीड़ित द्वारा अतिक्रमण हटाने की सहमति देने के बाद उसकी सजा को निलंबित (Suspend) करने और उसे रिहा करने का आदेश जारी किया गया।

तहसीलदार की लापरवाही: वरिष्ठ न्यायालय का स्पष्ट आदेश होने के बावजूद, स्थानीय तहसीलदार तेजपाल पारीक ने उसे जेल से रिहा नहीं किया। हताश होकर पीड़ित की पत्नी ने हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर की, जिसके बाद अदालत के कड़े हस्तक्षेप पर उसे 8 जून 2026 को आखिरकार रिहा किया गया।

मानवीय त्रासदी: पति HIV पीड़ित, पत्नी कैंसर की मरीज

जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने इस मामले का अंतिम विधिक आदेश पारित करते हुए इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया कि एक गंभीर बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति को 53 दिनों तक विधिक प्रक्रिया के खिलाफ जाकर काल कोठरी में रखा गया। बंदी को एचआईवी (HIV) के लिए निरंतर चिकित्सा उपचार की आवश्यकता थी, जबकि उसकी याचिकाकर्ता-पत्नी, जो खुद एक कैंसर रोगी है, को इस अवैध कृत्य के कारण अपने पति के साथ, देखभाल और सहयोग से वंचित होना पड़ा। इसलिए, इस अवैध हिरासत के परिणाम केवल शारीरिक स्वतंत्रता के हनन तक सीमित नहीं थे; बल्कि वे मानवीय पीड़ा, चिकित्सीय संवेदनशीलता और पारिवारिक संकट के दायरे तक फैले हुए थे।

“यह प्रशासनिक विफलता नहीं, संविधान के अनुच्छेद 21 का क्रूर उल्लंघन है”

अदालत ने तहसीलदार के उस विधिक तर्क को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने दावा किया था कि उन्हें 15 अप्रैल के सजा निलंबन आदेश की जानकारी ही नहीं थी।

अदालत का निष्कर्ष: कोर्ट ने कहा कि अपीलीय प्राधिकारी के आदेश आमतौर पर अधीनस्थ प्राधिकारी को तुरंत भेजे जाते हैं और ऐसी कार्यवाही सरकारी वकीलों की मौजूदगी में होती है।

जानबूझकर की गई देरी: तहसीलदार ने खुद कोर्ट में स्वीकार किया कि उन्हें 1 जून 2026 को इस आदेश की जानकारी मिल गई थी। इस पर कोर्ट ने सवाल उठाया कि जानकारी मिलने के बाद भी अधिकारी ने उसे रिहा करने में 7 दिन (8 जून 2026 तक) क्यों लगाए?

विधिक टिप्पणी: कोर्ट ने कहा, “यह निरंतर नजरबंदी प्रशासनिक विफलता नहीं है। यह वरिष्ठ प्राधिकारी के आदेश की अवहेलना में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक सचेत, जानबूझकर किया गया क्रूर हनन है। संवैधानिक कानून की भाषा में कहें तो यह अनुच्छेद 21 (Article 21 – Right to Life and Liberty) का घोर उल्लंघन है।”

विधिक एवं प्रशासनिक निर्देश (Court’s Directives)

हाई कोर्ट ने अधिकारी के इस आचरण को सिविल सोसाइटी के लिए एक गंभीर खतरा मानते हुए निम्नलिखित दंडात्मक और प्रशासनिक आदेश जारी किए हैं।

विधिक/प्रशासनिक बिंदुराजस्थान हाई कोर्ट का अंतिम आदेश
मुख्य आरोपी अधिकारीतेजपाल पारीक, तत्कालीन तहसीलदार।
वित्तीय दंड (Compensation)₹2,00,000 (दो लाख रुपये) पीड़ित व्यक्ति को देने का आदेश।
जुर्माने की शर्तकोर्ट ने सख्त हिदायत दी है कि यह राशि तहसीलदार को अपनी व्यक्तिगत जेब से देनी होगी, राज्य सरकार किसी भी तरह से इसका भुगतान नहीं करेगी।
प्रशासनिक कार्रवाईअधिकारी के खिलाफ तुरंत विभागीय अनुशासनात्मक जांच शुरू की जाए।
पद से अटैचमेंटजांच लंबित रहने तक, तहसीलदार को उनके वर्तमान पद से हटाकर राजस्व मुख्यालय (Revenue Headquarters) से संबद्ध (Attached) रखा जाएगा ताकि वे रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ न कर सकें।
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