NEET Paper Leak: दिल्ली हाईकोर्ट ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की विधिक जवाबदेही और सरकारी नियंत्रण को लेकर एक बेहद युगांतरकारी और दूरगामी फैसला सुनाया है।
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 69A के तहत अधिकार
हाईकोर्ट के वेकेशन जज जस्टिस तेजस कड़िया की पीठ ने दिग्गज मैसेजिंग प्लेटफॉर्म ‘टेलीग्राम’ (Telegram) द्वारा केंद्र सरकार के आपातकालीन ब्लॉकिंग ऑर्डर को चुनौती देने वाली याचिका को पूरी तरह खारिज करते हुए यह विधिक व्यवस्था दी। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 69A के तहत केंद्र सरकार के पास न केवल किसी विशिष्ट मैसेज, पोस्ट या चैनल को हटाने का अधिकार है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता या लोक व्यवस्था (Public Order) के हित में वह पूरे के पूरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म या मोबाइल एप्लिकेशन को ब्लॉक कर सकती है।
मामला क्या था? (NEET-UG 2026 और टेलीग्राम पर आपातकालीन कार्रवाई)
यह पूरा विधिक विवाद NEET-UG 2026 की पुनः परीक्षा (Re-exam) से ठीक पहले पेपर लीक और भ्रामक सूचनाओं को फैलने से रोकने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों से जुड़ा है।
सरकारी आदेश: इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने धारा 69A के तहत एक आपातकालीन आदेश जारी कर भारत में टेलीग्राम प्लेटफॉर्म को 22 जून 2026 तक अस्थायी रूप से ब्लॉक कर दिया था। साथ ही, टेलीग्राम की ‘मैसेज-एडिटिंग’ (Message-editing) फीचर को भी 30 जून 2026 तक अक्षम (Disable) करने का निर्देश दिया था।
टेलीग्राम की विधिक चुनौती: टेलीग्राम ने इस आदेश को अदालत में चुनौती दी। उनका तर्क था कि आईटी एक्ट की धारा 69A केवल विशिष्ट “सूचना” (Information) या अवैध कंटेंट/लिंक को ब्लॉक करने की शक्ति देती है, न कि पूरे प्लेटफॉर्म पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की। टेलीग्राम ने यह भी दावा किया कि उन्होंने सरकार द्वारा बताए गए 900 से अधिक लिंक्स को तुरंत हटा दिया था और वे AI/ML टूल्स के जरिए कंटेंट मॉडरेट कर रहे थे, इसलिए यह कार्रवाई मनमानी और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है।
दिल्ली हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण और व्याख्या
न्यायालय ने टेलीग्राम के सभी तर्कों को खारिज करते हुए सूचना प्रौद्योगिकी कानून के प्रावधानों की अत्यंत व्यापक और तकनीकी रूप से तटस्थ (Technologically Neutral) व्याख्या की।
“सूचना” (Information) के दायरे में पूरा ऐप/सॉफ्टवेयर शामिल है
अदालत ने आईटी एक्ट की धारा 2(1)(v) का हवाला दिया, जिसमें “सूचना” को परिभाषित किया गया है। कोर्ट ने कहा कि इस परिभाषा में ‘कोड्स’ (Codes), ‘कंप्यूटर प्रोग्राम’ (Computer Programmes) और ‘सॉफ्टवेयर’ (Software) को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है। चूंकि कोई भी मोबाइल एप्लिकेशन या प्लेटफॉर्म मूल रूप से एक सॉफ्टवेयर या कंप्यूटर प्रोग्राम ही होता है, इसलिए उसे ‘सूचना’ के दायरे से बाहर रखने का कोई विधिक कारण नहीं है।
संकीर्ण व्याख्या कानून को ‘अप्रासंगिक’ (Otiose) बना देगी
जस्टिस तेजस कड़िया ने अपने निर्णय में दर्ज किया, यदि ‘सूचना’ शब्द की व्याख्या केवल व्यक्तिगत यूजर अकाउंट, इमेज, पोस्ट या फाइलों तक ही सीमित कर दी जाएगी, तो यह धारा 69A के विधिक दायरे को बेहद संकीर्ण कर देगी और आपातकालीन स्थितियों में यह पूरी धारा ही अप्रासंगिक या निरर्थक (Otiose) हो जाएगी। विधायिका का उद्देश्य इस शब्द को एक व्यापक और तकनीकी रूप से तटस्थ अर्थ देना था।
टेलीग्राम का आर्किटेक्चर और ‘मिरर चैनल्स’ का खतरा
अदालत ने पाया कि टेलीग्राम का तकनीकी ढांचा ऐसा है जहां बॉट्स, क्लाउड स्टोरेज और यूजर की गोपनीयता (Anonymity) के कारण अवैध कंटेंट बहुत तेजी से फैलता है। सरकार ने पहले कम सख्त कदम उठाते हुए कई चैनलों को ब्लॉक करने का निर्देश दिया था, लेकिन जैसे ही एक चैनल ब्लॉक होता, अपराधी तुरंत ‘मिरर चैनल्स’ (Mirror Channels) या बैकअप चैनल्स बनाकर सब्सक्राइबर्स को वहां शिफ्ट कर देते थे। इसलिए विशिष्ट चैनलों को हटाना पूरी तरह बेअसर साबित हो रहा था।
‘मैसेज एडिटिंग’ फीचर का दुरुपयोग
कोर्ट ने माना कि पहले से पोस्ट किए गए मैसेजेस को एडिट करने की टेलीग्राम की खूबी का दुरुपयोग परीक्षा के संबंध में यह झूठा भ्रम फैलाने के लिए किया जा सकता है कि पेपर परीक्षा से पहले ही लीक हो गया था, जिससे कानून-व्यवस्था की गंभीर स्थिति पैदा हो सकती थी।
आनुपातिकता का सिद्धांत (Principle of Proportionality)
अदालत ने कहा कि चूंकि लगभग 22 लाख छात्र NEET की री-एग्जाम में शामिल होने वाले थे, इसलिए इतने बड़े पैमाने पर सार्वजनिक हित और छात्रों के भविष्य को देखते हुए सरकार द्वारा पूरे प्लेटफॉर्म को अस्थायी रूप से ब्लॉक करना ‘आनुपातिक’ (Proportionate) और पूरी तरह विधिक था।
विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)
| विधिक/मुख्य बिंदु | दिल्ली उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक विधिक रुख (जून 2026) |
| याचिकाकर्ता | टेलीग्राम (सॉफ्टवेयर/इंटरमीडियरी प्लेटफॉर्म)। |
| विपक्षी पक्ष | इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), भारत सरकार। |
| सुनवाई करने वाले जज | वेकेशन जज जस्टिस तेजस कड़िया (दिल्ली हाई कोर्ट)। |
| विवादित विधिक धारा | सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69A और धारा 2(1)(v)। |
| न्यायालय का मुख्य निष्कर्ष | धारा 69A के तहत सरकार को पूरा ऐप/प्लेटफॉर्म ब्लॉक करने का पूर्ण विधिक अधिकार है। |
| अस्थायी प्रतिबंध की अवधि | टेलीग्राम ऐप पर 22 जून 2026 तक और मैसेज एडिटिंग फीचर पर 30 जून 2026 तक रोक। |
| विधिक अनुपालन न करने पर सजा | यदि कोई मध्यस्थ (Intermediary) ऐसे आदेशों का पालन नहीं करता, तो 7 साल तक की कैद और जुर्माने का विधिक प्रावधान है। |

