Friday, September 18, 2026
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Pedestrians Rights: फुटपाथों पर कब्जा करने का अधिकार किसी को नहीं…राइट टू वॉक मौलिक अधिकार पर समझिए पूरा केस

Pedestrians Rights: देश की सड़कों पर मोटर वाहनों के बढ़ते दबदबे और पैदल यात्रियों (Pedestrians) की लगातार होती उपेक्षा पर उच्चतम न्यायालय ने एक बेहद कड़ा और युगांतरकारी विधिक कड़ा रुख अपनाया है।

चिह्नित फुटपाथ पर पैदल चलने का अधिकार

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट घोषणा की है कि ‘चिह्नित फुटपाथ पर पैदल चलने का अधिकार’ (Right to Walk on a Demarcated Footpath) संविधान के भाग-III के तहत एक मौलिक अधिकार है। अदालत ने यह विधिक व्यवस्था भी दी है कि यदि फुटपाथ गायब हैं या उन पर अतिक्रमण है, तो नागरिक सीधे नगर निगमों और विकास प्राधिकरणों के खिलाफ मुआवजे (Compensation) और पुनर्स्थापन (Restitution) के लिए सीधे अदालत जा सकते हैं।

पीड़ित पिता का मुआवजा बढ़ाकर ₹11,44,628 किया

यह ऐतिहासिक फैसला जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ ने एक दर्दनाक सड़क दुर्घटना मामले की सुनवाई के दौरान सुनाया, जहां एक 5 वर्षीय मासूम को स्कूल जाते समय टैंकर ने कुचल दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने न केवल पीड़ित पिता का मुआवजा बढ़ाकर ₹11,44,628 किया, बल्कि इस मामले को देश के सभी पैदल यात्रियों के अधिकारों की रक्षा के एक बड़े संवैधानिक मंच में बदल दिया।

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण विधिक टिप्पणियां

‘पहियों’ ने हमारी कल्पना को कुचल दिया (Elitism vs Walkers)

न्यायालय ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि कैसे हमारे नीति-निर्माताओं और नगर निकायों ने केवल अमीर और मोटर वाहनों से चलने वाले लोगों के लिए सड़कें बनाईं और पैदल चलने वालों को ‘अदृश्य’ कर दिया। अदालत ने कहा, यह बेहद अजीब है कि हम पैदल चलने के अधिकार को सुरक्षित करने में पूरी तरह विफल रहे। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि ‘पहियों’ (Wheels) ने हमारी कल्पना को ग्रसित कर लिया था। शुरुआत में यह केवल अमीरों की गाड़ियों का संभ्रांतवाद (Elitism) था, लेकिन जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था बढ़ी, मोटर वाहनों ने सड़कों पर कब्जा कर लिया। स्थिति यह हो गई है कि अब वाहन चालक पैदल चलने वालों को सड़कों पर एक ‘अड़चन’ या ‘बाधा’ (Nuisance) मानने लगे हैं, जो जब चाहे उन्हें और उनके फुटपाथों को रौंदते हुए निकल जाते हैं। इसे अब हर हाल में रोकना होगा।

मोटर वाहन अधिनियम (MVA) पर तीखा विधिक प्रहार

अदालत ने माना कि अब तक लागू मोटर वाहन अधिनियम, 1988 (Motor Vehicles Act) ने कभी भी पैदल यात्रियों के अधिकारों को प्राथमिकता नहीं दी। बेंच के अनुसार, यह कानून कई मायनों में पैदल चलने वालों के कीमती अधिकारों को दबाने का एक जरिया (Impediment) बन गया। यही कारण है कि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फुटपाथ न होने या उनके बाधित होने पर मिलने वाला संवैधानिक मुआवजा, मोटर वाहन अधिनियम के तहत मिलने वाले क्लेम से पूरी तरह स्वतंत्र और अलग होगा।

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फैसले के 3 मुख्य विधिक निष्कर्ष (The Core Legal Rulings)

अदालत ने अपने निर्णय के अंत में तीन अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत (Conclusions) तय किए हैं।

(A) संवैधानिक सुरक्षा: पैदल चलने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) (देश में स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार) के साथ-साथ अनुच्छेद 19(1)(a), (b), (c) और अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) के तहत एक मौलिक अधिकार है। सड़कों पर पैदल यात्रियों का हक मोटर वाहनों के विशेषाधिकार से हमेशा प्राथमिक (Primary) और सर्वोपरि होगा।

(B) प्रशासन की विधिक जवाबदेही (Correlative Duty): यदि कोई सड़क अस्तित्व में है, तो प्रशासन का यह अनिवार्य विधिक कर्तव्य है कि वह उसके साथ एक सुरक्षित और साफ-सुथरा फुटपाथ बनाए। इसके लिए सीधे तौर पर शहरी विकास प्राधिकरण (जैसे DDA, GDA), नगर निगम (Municipal Corporations), नगरपालिकाएं और ग्राम पंचायतें जिम्मेदार (Duty Bearers) होंगी।

(C) मुआवजे का अधिकार (Restitutionary Remedy): यदि कोई नागरिक फुटपाथ की कमी या अतिक्रमण के कारण अपने इस मौलिक अधिकार का उपयोग नहीं कर पाता है, तो वह इन जिम्मेदार प्रशासनिक निकायों के खिलाफ संवैधानिक और कानूनी उपचारों के तहत मुआवजे का दावा करने का हकदार है।

अन्य पीठों के आदेशों का विधिक संदर्भ (Precedents)

सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि पैदल यात्रियों की सुरक्षा न्यायपालिका के लिए एक निरंतर चिंता का विषय रही है।

एस. राजशेखरन बनाम भारत संघ: इस मामले में जस्टिस ए.एस. ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने देश भर में फुटपाथों को पूरी तरह से ‘बाधा-मुक्त’ और दिव्यांग-अनुकूल (Disabled Friendly) बनाने के कड़े निर्देश जारी किए थे।

नियामकीय निगरानी: वर्तमान में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ एक दीर्घकालिक रिट याचिका के माध्यम से इन निर्देशों के कार्यान्वयन की लगातार निगरानी कर रही है। इसमें सड़कों पर पैदल यात्रियों की सुरक्षा, रॉन्ग-साइड ड्राइविंग, हेलमेट और कारों पर अवैध हूटरों के इस्तेमाल जैसे सुरक्षा मुद्दों पर लगातार कड़े आदेश जारी किए जा रहे हैं।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक/मुख्य बिंदुसुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक संवैधानिक घोषणा
माननीय पीठ (Coram)जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर।
संवैधानिक दर्जा‘राइट टू वॉक’ (Right to Walk) अनुच्छेद 19(1)(d) और अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार घोषित।
प्राथमिकता (Priority)फुटपाथों पर पैदल चलने वालों का हक मोटर वाहनों की तुलना में प्राथमिक और सर्वोच्च है।
जवाबदेह निकायविकास प्राधिकरण (Urban Development Authorities), नगर निगम, नगरपालिकाएं और पंचायतें।
विधिक उपचारअधिकार उल्लंघन पर नागरिक प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ ‘रेस्टिट्यूशन और मुआवजे’ के हकदार।
पीड़ित पिता को राहतहाई कोर्ट द्वारा घटाए गए ₹4.70 लाख के मुआवजे को खारिज कर ₹11,44,628 देने का आदेश।
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