Saturday, June 20, 2026
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Surrender Value: खुद की 11 साल पुरानी गलती के लिए ग्राहक को प्रताड़ित नहीं कर सकती LIC…जीवन सरल पॉलिसी लेने वाले का हाल देखिए

Surrender Value: चंडीगढ़ जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) द्वारा अपने ही सिस्टम की तकनीकी खामी का बोझ एक आम उपभोक्ता पर डालने के रवैये पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है।

पॉलिसीधारक को मानसिक प्रताड़ना का मामला

आयोग के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह सिद्धू और सदस्य बृज मोहन शर्मा की पीठ ने एलआईसी को आदेश दिया कि वह पॉलिसीधारक को मानसिक प्रताड़ना के एवज में ₹20,000 का हर्जाना दे और उसकी पॉलिसी की सरेंडर वैल्यू (Surrender Value) का तुरंत भुगतान करे। आयोग ने स्पष्ट विधिक व्यवस्था दी है कि कोई भी बीमा कंपनी अपनी आंतरिक प्रशासनिक लापरवाही या तकनीकी गलती (Internal Technical Lapse) के लिए पॉलिसीधारक को दंडित नहीं कर सकती।

मामला क्या था? (LIC’s 11-Year-Old Clerical Error)

यह मामला बीमा क्षेत्र की सबसे बड़ी सरकारी कंपनी एलआईसी की एक गंभीर वित्तीय और प्रशासनिक चूक से जुड़ा था।

पॉलिसी की शुरुआत: शिकायतकर्ता ने 28 मार्च 2011 को एलआईसी से 20 वर्ष की अवधि के लिए ‘जीवन सरल पॉलिसी’ (Jivan Saral Policy) ली थी। इसका सम एश्योर्ड (Sum Assured) ₹5 लाख था और पॉलिसी बॉण्ड पर मासिक प्रीमियम ₹2,042 अंकित था।

11 साल तक नियमित भुगतान: पॉलिसीधारक लगातार 11 वर्षों तक (फरवरी 2023 तक) एलआईसी को तय प्रीमियम ₹2,042 प्रति माह चुकाता रहा, जिसे कंपनी बिना किसी आपत्ति के स्वीकार करती रही। कुल मिलाकर ग्राहक ने लगभग ₹2.94 लाख प्रीमियम जमा किया।

सरेंडर के समय ₹83,541 की विधिक मांग: अप्रैल 2022 में जब पॉलिसीधारक ने अपनी पॉलिसी को बीच में ही बंद करने (Surrender) और उसके तहत मिलने वाले लाभों को प्राप्त करने के लिए आवेदन किया, तो एलआईसी ने 6 मई 2022 को एक पत्र भेजकर उसे चौंका दिया। कंपनी ने दावा किया कि पॉलिसी की शुरुआत से ही प्रीमियम की गणना गलत हुई थी, इसलिए ग्राहक पर ₹83,541 का बकाया (Arrears) निकलता है।

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एलआईसी का विधिक पक्ष: ‘सिस्टम की तकनीकी त्रुटि’

एलआईसी ने उपभोक्ता फोरम के समक्ष अपना लिखित पक्ष रखते हुए दलील दी कि पॉलिसी लेते समय शिकायतकर्ता के स्वास्थ्य इतिहास (Health History) को देखते हुए यह तय हुआ था कि उन्हें सामान्य प्रीमियम पर पॉलिसी नहीं मिल सकती। ‘क्लास IV हेल्थ एक्स्ट्रा’ (Class IV Health Extra) के कारण उनका वास्तविक मासिक प्रीमियम ₹2,670 होना चाहिए था, न कि ₹2,042। हालांकि, सिस्टम में एक “तकनीकी खराबी” (Technical Error) के कारण पॉलिसी बॉण्ड पर ₹2,042 अंकित हो गया। एलआईसी ने तर्क दिया कि वह सरेंडर वैल्यू देने से इनकार नहीं कर रही है, लेकिन नियमानुसार इस बकाया प्रीमियम की राशि को या तो ग्राहक जमा करे या इसे उसकी सरेंडर वैल्यू से काटा (Deduct) जाए।

उपभोक्ता आयोग का कड़ा विधिक रुख: ‘कुंभकर्णी नींद से अचानक नहीं जाग सकती कंपनी’

चंडीगढ़ उपभोक्ता आयोग ने एलआईसी के इस तर्क को पूरी तरह ‘मेरिट विहीन’ और ‘सेवा में कमी’ (Deficiency in Service) तथा ‘अनुचित व्यापार व्यवहार’ (Unfair Trade Practice) माना।

11 साल की चुप्पी के बाद Retroactive मांग अवैध

आयोग ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, एक बार जब एलआईसी ने खुद पॉलिसी बॉण्ड जारी किया, जिसमें स्पष्ट रूप से मासिक प्रीमियम ₹2,042 लिखा था, और 11 लंबे वर्षों तक बिना किसी आपत्ति या सुधार के इसे स्वीकार भी किया, तो वह एक दिन अचानक अपनी कुंभकर्णी नींद (Slumber) से जागकर यह नहीं कह सकती कि प्रीमियम गलत चार्ज किया गया था। वह भी तब, जब कंपनी के पास इसके समर्थन में कोई पुख्ता दस्तावेजी सबूत नहीं है।”

उपभोक्ता को बलि का बकरा नहीं बनाया जा सकता

पीठ ने विधिक सिद्धांत रेखांकित किया कि एक दशक से अधिक समय तक नीतिगत नियमों का ईमानदारी से पालन करने वाले उपभोक्ता को बीमा कंपनी की आंतरिक तकनीकी खामियों का शिकार नहीं बनाया जा सकता। प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा उपभोक्ता भुगतने के लिए बाध्य नहीं है।

आयोग का विधिक आदेश और राहत

उपभोक्ता शिकायत को पूरी तरह सही पाते हुए आयोग ने एलआईसी को सख्त निर्देश जारी किए।

ब्याज सहित सरेंडर वैल्यू: एलआईसी बिना किसी कटौती या बकाया ₹83,541 की मांग के, पॉलिसीधारक की वास्तविक सरेंडर वैल्यू की गणना करे और उस पर 6 प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज लगाकर भुगतान करे।

मानसिक प्रताड़ना का हर्जाना: उपभोक्ता को मानसिक उत्पीड़न और असुविधा पहुंचाने के लिए एलआईसी ₹20,000 का हर्जाना देगी।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक/मुख्य बिंदुचंडीगढ़ उपभोक्ता आयोग का महत्वपूर्ण विधिक निर्णय
फोरम/आयोगजिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, चंडीगढ़।
पीठ (Bench)अध्यक्ष अमरिंदर सिंह सिद्धू और सदस्य बृज मोहन शर्मा।
विवादित बीमा योजनाएलआईसी जीवन सरल पॉलिसी (प्रारंभ तिथि: 28 मार्च 2011)।
मुख्य विधिक सिद्धांतबीमा कंपनी अपनी क्लर्कल या तकनीकी गलती के लिए एक दशक बाद उपभोक्ता से एकमुश्त बकाया राशि नहीं मांग सकती।
घोषित विधिक आचरणएलआईसी की इस मांग को ‘सेवा में गंभीर कमी’ और ‘अनुचित व्यापार व्यवहार’ घोषित किया गया।
कुल देय राहतसंपूर्ण सरेंडर वैल्यू + 6% वार्षिक ब्याज + ₹20,000 मानसिक उत्पीड़न हर्जाना।
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