Thursday, September 17, 2026
HomeBREAKING INDIAClaim Case: बेटे की मौत के 12 साल बाद मां को मिला...

Claim Case: बेटे की मौत के 12 साल बाद मां को मिला डेथ क्लेम…जानिए LIC से बीमा कराने का नतीजा; कहानी पढ़कर आंखें हो जाएंगी नम

Claim Case: लाइफ इंश्योरेंस क्लेम को पहले से बीमारी (Pre-existing Disease) का बहाना बनाकर खारिज करने वाली बीमा कंपनियों को राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने एक बड़ा और कड़ा संदेश दिया है।

मृत युवक के ₹60 लाख के क्लेम को खारिज करने के फैसले को पूरी तरह गलत

NCDRC के पीठासीन सदस्य डॉ. इंद्र जीत सिंह और सदस्य शशि नंदकेोलियर की पीठ ने 9 जून 2026 को मुंबई निवासी जयश्री सुरेश गंभीर के पक्ष में यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। आयोग ने भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) द्वारा एक मृत युवक के ₹60 लाख के क्लेम को खारिज करने के फैसले को पूरी तरह गलत और अवैध ठहराया है। अदालत ने LIC की इस मनमानी पर तगड़ा जुर्माना लगाते हुए वर्ष 2014 से 9% वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान करने का आदेश दिया है। इस लंबी कानूनी लड़ाई के कारण केवल ब्याज की राशि ही ₹64.8 लाख से अधिक हो गई है, जिससे LIC की कुल देनदारी ₹1.26 करोड़ से पार पहुंच गई है।

बीमा कंपनी के पास ऐसा कोई पुख्ता मेडिकल रिकॉर्ड या सबूत नहीं

आयोग ने बीमा कंपनियों के रवैये पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, मामले के सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद, यह आयोग मानता है कि पॉलिसी लेते समय (प्रस्ताव प्रपत्र में) पॉलिसीधारक ने अपनी किसी भी बीमारी को नहीं छुपाया था। बीमा कंपनी के पास ऐसा कोई पुख्ता मेडिकल रिकॉर्ड या सबूत नहीं है जो यह साबित करे कि पॉलिसी फॉर्म भरने से पहले मृतक किसी बीमारी से पीड़ित था। अतः इन आधारों पर सभी 5 पॉलिसियों के क्लेम को खारिज करने का LIC का फैसला पूरी तरह से अनुचित था।

मामला क्या था? (38 वर्षीय बेटे की मौत और LIC के आरोप)

यह भावुक और लंबी कानूनी लड़ाई मुंबई की एक बुजुर्ग मां, जयश्री सुरेश गंभीर की है, जिनके बेटे नितिन सुरेश गंभीर ने जून २०१० में एलआईसी से ५ अलग-अलग लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसियां ली थीं।

पॉलिसी और कुल सम एश्योर्ड: इन सभी 5 पॉलिसियों की कुल बीमा राशि ₹60 लाख थी और नितिन ने अपनी मां जयशंकर को इसमें नॉमिनी बनाया था।

अचानक मृत्यु: 11 जून 2013 को 38 वर्ष की अल्पायु में नितिन की दिल का दौरा (Cardiac Arrest) पड़ने से मृत्यु हो गई। बेटे की मौत के बाद मां ने क्लेम के लिए आवेदन किया।

LIC द्वारा क्लेम खारिज (2014): 11 जुलाई 2014 को एलआईसी ने यह कहते हुए सभी क्लेम रिजेक्ट कर दिए कि नितिन ने पॉलिसी लेते समय अपनी सेहत से जुड़ी ‘महत्वपूर्ण जानकारी’ छुपाई थी। एलआईसी का दावा था कि नितिन को डायबिटीज (मधुमेह) था और सितंबर 2010 में उन्हें मुंबई के पी.डी. हिंदुजा अस्पताल में पैर के अल्सर और सेल्युलाइटिस के इलाज के लिए भर्ती कराया गया था।

कोर्ट रूम एनालिसिस: क्यों ध्वस्त हो गए LIC के सारे कुतर्क?

NCDRC ने मामले की गहन जांच की और एलआईसी के दावों की धज्जियां उड़ाते हुए निम्नलिखित विधिक निष्कर्ष निकाले।

मेडिकल साक्ष्य का अभाव: एलआईसी ने अस्पताल के डिस्चार्ज समरी में लिखे केवल एक वाक्य—2 महीने से डायबिटीज का इतिहास को आधार बना लिया था। कोर्ट ने कहा कि अस्पताल के पर्चे पर ऐसा लिखा होना इस बात का अकाट्य प्रमाण नहीं है कि जून 2010 में फॉर्म साइन करते समय भी वे डायबिटिक थे। बल्कि, उसी अस्पताल के 2013 के एक अन्य रिकॉर्ड में नितिन को ‘नॉन-डायबिटिक’ बताया गया था।

बीमारी और मौत में कोई संबंध नहीं (No Nexus): सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए आयोग ने कहा कि नितिन की मौत पॉलिसी लेने के तीन साल बाद हार्ट अटैक से हुई थी। कथित तौर पर छुपाई गई बीमारी (डायबिटीज/अल्सर) और मौत के कारण (हार्ट अटैक) के बीच कोई सीधा संबंध या लिंक बीमा कंपनी साबित नहीं कर सकी।

पॉलिसी रिस्क डेट का विवाद सुलझा: राज्य उपभोक्ता आयोग ने 2016 में केवल 3 पॉलिसियों का क्लेम (₹40 लाख) मंजूर किया था और 2 पॉलिसियों को यह कहकर खारिज कर दिया था कि अस्पताल में भर्ती होने (11 सितंबर) के बाद बीमा का रिख रिस्क शुरू हुआ था। लेकिन NCDRC ने प्रीमियम रसीदों की जांच में पाया कि एलआईसी को इन दोनों पॉलिसियों का प्रीमियम 7 सितंबर 2010 को ही मिल चुका था। यानी रिस्क उसी दिन शुरू हो गया था, इसलिए बाद में अस्पताल में भर्ती होने की जानकारी देने का कोई कानूनी दायित्व नीतिधारक पर नहीं था।

विश्लेषण: 12 साल की कानूनी लड़ाई का अंतिम वित्तीय लेखा-जोखा

एलआईसी की अड़ियल नीति और क्लेम टालने की आदत के कारण कंपनी को अब मूल राशि से अधिक तो केवल हर्जाना और ब्याज चुकाना पड़ रहा है।

मुआवजा और भुगतान के मद (The Final Payout Matrix)उपभोक्ता अदालत द्वारा निर्धारित राशि
मूल बीमा राशि (Principal Sum Assured)सभी 5 पॉलिसियों के तहत ₹60,00,000
9% वार्षिक साधारण ब्याज (Accumulated Interest)साल 2014 से 2026 तक (12 वर्ष का संचित ब्याज) ₹64,80,000
मानसिक उत्पीड़न का हर्जाना (Mental Agony)मां को मिले असहनीय कष्ट के एवज में ₹1,00,000
मुकदमेबाजी का खर्च (Litigation Costs)कानूनी लड़ाई के खर्च के लिए ₹50,000
LIC द्वारा देय कुल अंतिम राशि₹1,26,30,000 (1.26 करोड़ रुपये)

अंतिम निष्कर्ष

राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने महाराष्ट्र राज्य आयोग के आधे-अधूरे फैसले को बदलते हुए मां जयश्री गंभीर की अपील को पूरी तरह स्वीकार किया और एलआईसी की क्रॉस-अपील को खारिज कर दिया। इस फैसले के साथ ही एक बुजुर्ग मां का १२ साल का लंबा और थका देने वाला संघर्ष समाप्त हुआ।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
broken clouds
32 ° C
32 °
32 °
66 %
2.6kmh
83 %
Thu
32 °
Fri
35 °
Sat
36 °
Sun
36 °
Mon
36 °

Recent Comments