Saturday, June 20, 2026
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Insurance Claim: पॉलिसी लेने के महज 5 दिन बाद पत्नी की मौत…बिना सबूत दावों को खारिज करनेवाले बीमा कंपनी के साथ क्या हुआ, यहां जानिए

Insurance Claim: विशाखापत्तनम जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने उपभोक्ता अधिकारों और बीमा दावों (Insurance Claims) के निपटारे को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

आयोग ने पॉलिसीधारक को बीमा दावा भुगतान करने का दिया निर्देश

आयोग की अध्यक्ष डॉ. गुडला तनुजा और सदस्य वर्री कृष्ण मूर्ति की पीठ ने 53 वर्षीय सवारा भास्कर द्वारा दायर शिकायत पर 30 मई को यह आदेश पारित किया। आयोग ने देश की जानी-मानी बीमा कंपनी HDFC लाइफ इंश्योरेंस को निर्देश दिया है कि वह एक मृत महिला के पति को ₹50.30 लाख की कुल राशि का भुगतान करे। कंपनी ने महिला की मौत पॉलिसी शुरू होने के महज पांच दिन बाद हो जाने के आधार पर क्लेम खारिज कर दिया था।

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मामला क्या था? (Death within 5 days of buying policy)

पॉलिसी और रिस्क की शुरुआत: शिकायतकर्ता सवारा भास्कर की पत्नी दिवंगत सवारा राधा ने 10 मार्च 2025 को ₹50,000 का वार्षिक प्रीमियम देकर ‘HDFC लाइफ स्मार्ट प्रोटेक्ट प्लान’ पॉलिसी ली थी। इस पॉलिसी के तहत मृत्यु पर मिलने वाली बीमा राशि (Sum Assured) ₹50 लाख तय की गई थी।

अचानक मौत और कंपनी का इनकार: पॉलिसी शुरू होने के ठीक पांच दिन बाद, यानी 15 मार्च 2025 को सवारा राधा की घर पर दिल का दौरा (Heart Attack) पड़ने से अचानक मृत्यु हो गई। जब पति ने क्लेम के लिए आवेदन किया, तो एचडीएफसी लाइफ ने ‘पॉलिसी बंद करने की पुष्टि’ (Confirmation of policy discontinuance) नामक एक पत्र भेजकर क्लेम खारिज कर दिया।

कंपनी का विधिक तर्क: बीमा कंपनी के वकील के. रामा किरीटी ने दलील दी कि पॉलिसी ‘परम सद्भाव के सिद्धांत’ (Principle of utmost good faith) पर आधारित होती है। कंपनी ने दावा किया कि जांच में पता चला है कि प्रस्ताव फॉर्म (Proposal Form) में प्रोफाइल और महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपाया गया या गलत तरीके से पेश (Misrepresentation) किया गया था। चूंकि कंपनी ने पॉलिसी को ‘फ्री-लुक/शुरुआती अवधि’ के भीतर ही रद्द कर दिया था, इसलिए पति का क्लेम पर कोई विधिक अधिकार नहीं बनता।

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उपभोक्ता आयोग का कड़ा विधिक रुख: ‘बिना सबूत पल्ला नहीं झाड़ सकते’

फोरम ने बीमा कंपनी की दलीलों और क्लेम को खारिज करने के रवैये को ‘सेवा में कमी’ (Deficiency in Service) के साथ-साथ ‘अनुचित व्यापार व्यवहार’ (Unfair Trade Practice) माना।

केवल नियमों की आड़ लेना विधिक रूप से गलत

आयोग ने स्पष्ट किया कि एक बार जब बीमा कंपनी प्रीमियम राशि स्वीकार कर लेती है और पॉलिसी जारी कर देती है, तो वह किसी घटना के घटने के बाद बिना ठोस सबूत के केवल ‘अपवर्जन खंड’ (Exclusionary Clauses) या नियमों की आड़ लेकर अपनी विधिक देनदारी से बच नहीं सकती।

सबूत पेश करने में कंपनी ‘बुरी तरह विफल’

पीठ ने अपने आदेश में तल्ख टिप्पणी की, बीमा कंपनी ने रिकॉर्ड पर ऐसा कोई भी अकाट्य साक्ष्य (Evidence) पेश नहीं किया जिसके आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि प्रस्ताव फॉर्म में दी गई जानकारी गलत थी। कंपनी जोखिम शुरू होने के बाद बिना किसी वैध और न्यायसंगत आधार के पॉलिसी रद्द करके अपनी विधिक जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकती।

धोखाधड़ी वाले दावों पर टिप्पणी

आयोग ने माना कि झूठे और धोखाधड़ी वाले दावों के कारण सार्वजनिक धन की बर्बादी होती है, लेकिन उपभोक्ता फोरम ‘उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम’ (Consumer Protection Act) के दायरे से बाहर जाकर केवल अनुमानों के आधार पर किसी वास्तविक दावेदार का हक नहीं मार सकते।

आयोग का विधिक आदेश और राहत

उपभोक्ता आयोग ने माना कि बीमा कंपनी ने क्लेम का निपटारा करने के बजाय शिकायतकर्ता को मानसिक प्रताड़ना दी और उसे कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर किया।

मूल बीमा राशि और ब्याज: HDFC लाइफ इंश्योरेंस शिकायतकर्ता को ₹50 लाख की मूल बीमा राशि का भुगतान करे। इसके साथ ही, पत्नी की मृत्यु की तारीख (15 मार्च 2025) से लेकर पैसे के वास्तविक भुगतान की तारीख तक 6 प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज भी दिया जाए।

मानसिक उत्पीड़न का हर्जाना: कंपनी को मानसिक प्रताड़ना के मुआवजे के रूप में ₹25,000 देने का आदेश दिया गया।

मुकदमेबाजी का खर्च: शिकायतकर्ता को कानूनी खर्च के रूप में ₹5,000 अलग से दिए जाएं।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक/मुख्य बिंदुउपभोक्ता आयोग का महत्वपूर्ण विधिक निर्णय
शिकायतकर्तासवारा भास्कर (उम्र 53 वर्ष), मृतका के पति और नॉमिनी।
प्रतिवादी पक्षHDFC लाइफ इंश्योरेंस (HDFC Life Smart Protect Plan)।
फोरम/आयोगजिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश)।
मुख्य विधिक सिद्धांतपॉलिसी लेने के तुरंत बाद मौत होने मात्र से बीमा कंपनी क्लेम खारिज नहीं कर सकती; तथ्य छुपाने का आरोप लगाने पर कंपनी को ही सबूत देना होगा।
कुल देय राहत₹50 लाख + 6% वार्षिक ब्याज + ₹25,000 हर्जाना + ₹5,000 अदालती खर्च।
विधिक प्रतिनिधित्वशिकायतकर्ता की ओर से एडवोकेट डी. सुब्रह्मण्यम; कंपनी की ओर से एडवोकेट के. रामा किरीटी।
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