Saturday, June 20, 2026
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Abusing Phrase: झगड़े के दौरान ‘महज मारो साले को’ कहना क्या हत्या की नीयत को दर्शाना है…42 साल पुराने मर्डर केस से मिलेगा यह जवाब

Abusing Phrase: दिल्ली हाईकोर्ट ने देश की राजधानी में करीब 42 साल पहले (वर्ष 1983 में) दिल्ली परिवहन निगम (DTC) की बस के भीतर हुए एक जघन्य हत्याकांड के मामले में एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक विधिक निर्णय सुनाया है।

ट्रायल कोर्ट की दी गई उम्रकैद की सजा को पलट दिया

हाईकोर्ट के जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की खंडपीठ (Division Bench) ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा को पलटते हुए, मुख्य आरोपी मुकेश कुमार को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) देते हुए सभी आरोपों से विधिक रूप से बरी (Acquit) कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि भारत में आम बोलचाल या आपसी झगड़े के दौरान इस्तेमाल होने वाले शब्द ‘मारो’ का मतलब केवल शारीरिक रूप से ‘पीटना’ या ‘चोट पहुंचाना’ भी हो सकता है, न कि अनिवार्य रूप से ‘जान से मार देना’।

1983 का बस हत्याकांड: विवाद की पृष्ठभूमि (The Incident)

यह मामला 1 दिसंबर 1983 का है, जब दिल्ली की रूट नंबर 431 की एक डीटीसी बस में कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ी थीं।

छेड़खानी का विरोध और हत्या: अभियोजन पक्ष (Prosecution) के अनुसार, बस में युवकों के एक समूह ने दो महिला यात्रियों के साथ बदसलूकी की। जब विनोद कुमार नामक व्यक्ति और उसके दोस्तों ने इसका कड़ा विरोध किया, तो बस के भीतर ही खूनी संघर्ष शुरू हो गया।

चाकूबाजी और ललकारने का आरोप: इस लड़ाई के दौरान, सह-आरोपी बलविंदर सिंह ने विनोद कुमार पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर दिए, जिससे बाद में उसकी मृत्यु हो गई। पुलिस ने आरोप लगाया कि बस के पिछले हिस्से में खड़े मुकेश कुमार ने हमलावरों को “मारो साले को” चिल्लाकर उकसाया (Exhortation) था।

ट्रायल कोर्ट का फैसला: वर्ष 2004 में (घटना के 21 साल बाद), दिल्ली की एक निचली अदालत ने मुकेश कुमार को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या) और धारा 34 (समान मंशा/Common Intention) के तहत दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। मुकेश ने इस फैसले के खिलाफ उसी वर्ष (22 साल पहले) हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: ‘मारो’ शब्द की व्याख्या

दिल्ली उच्च न्यायालय ने मुकेश कुमार की अपील को स्वीकार करते हुए अभियोजन पक्ष की विधिक कड़ियों में कई गंभीर कमियां और विरोधाभास पाए।

‘मारो’ शब्द का अर्थ केवल हत्या नहीं है

अदालत ने ‘समान मंशा’ (Section 34 IPC) के सिद्धांत की व्याख्या करते हुए कहा, झगड़े के वक्त केवल ‘मारो साले को’ शब्दों का इस्तेमाल करने मात्र से यह सिद्ध नहीं होता कि आरोपी की नीयत जान से मारने की थी। इन शब्दों को सामने वाले को केवल चोट पहुंचाने या पीटने की मंशा (Intention to hurt) से भी जोड़कर देखा जा सकता है।

पूर्व नियोजित साजिश या हथियारों की जानकारी का अभाव

पीठ ने नोट किया कि मुकेश कुमार के पास कोई हथियार नहीं था और न ही उसने किसी पर शारीरिक हमला किया। ऐसा कोई विधिक साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि मुकेश को पहले से पता था कि उसके साथी अपने पास चाकू रखे हुए हैं, या उनकी विनोद की हत्या करने की कोई पूर्व योजना (Prior Plan) थी।

शिनाख्त परेड (TIP Procedure) पर गंभीर विधिक संदेह

अदालत ने पाया कि घटना के बाद हुई ‘टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड’ (Test Identification Parade) पूरी तरह संदिग्ध थी। गवाहों के बयानों से संकेत मिला कि पहचान की औपचारिक प्रक्रिया से पहले ही गवाहों को आरोपी दिखा दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में, सालों बाद अदालत के भीतर गवाह द्वारा की गई पहचान (Dock Identification) विधिक रूप से पूरी तरह अविश्वसनीय हो जाती है।

अदालत का अंतिम विधिक आदेश

उच्च न्यायालय ने माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि मुकेश कुमार की मंशा अन्य आरोपियों के साथ मिलकर हत्या करने की थी। इसके अलावा चश्मदीद गवाहों के बयानों में समय और परिस्थितियों को लेकर भारी विरोधाभास थे।

अदालत ने मुकेश कुमार की दोषसिद्धि (Conviction) के आदेश को पूरी तरह निरस्त (Set Aside) कर दिया और उन्हें केस से बाइज्जत बरी कर दिया।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक/मुख्य बिंदुदिल्ली उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण विधिक निर्णय
मामला/केस का नाममुकेश कुमार बनाम राज्य (दिल्ली सरकार) [Mukesh Kumar v. State of Delhi]
माननीय न्यायाधीशजस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा (खंडपीठ)
घटना और विधिक न्याय की अवधिघटना: 1983 (42 साल पहले) | हाई कोर्ट में अपील लंबित रही: 22 वर्ष (2004 से)।
मुख्य कानूनी धाराएंतत्कालीन आईपीसी (IPC) की धारा 302, 307 और 34 (समान मंशा)।
स्थापित विधिक सिद्धांतबिना किसी ठोस हथियार या पूर्व योजना के, केवल “मारो” जैसे शब्दों के प्रयोग से आईपीसी की धारा 34 (समान आशय) के तहत हत्या का दोषी नहीं बनाया जा सकता।
विधिक प्रतिनिधित्वअपीलकर्ता की ओर से एडवोकेट हिमांशु आनंद गुप्ता, मानसी यादव आदि; राज्य की ओर से एपीपी अमन उस्मान।
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