Saturday, June 20, 2026
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Property Dealer: दूसरे को बेच दिया वादा किया हुआ प्लॉट…तो बिल्डर को मिला जवाब ‘एग्रीमेंट के बाद रकम दबाकर बैठना सेवा में गंभीर कमी’

Property Dealer: विशाखापत्तनम जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने रियल एस्टेट क्षेत्र में बिल्डरों द्वारा पैसे लेकर भी प्लॉट की रजिस्ट्री न करने और उसे किसी तीसरे पक्ष (Third Party) को बेच देने की धोखाधड़ी पर कड़ा रुख अपनाया है।

पीड़ित खरीदार को ₹8 लाख से अधिक की कुल राशि का भुगतान

आयोग की अध्यक्ष डॉ. गुडला तनुजा और सदस्य वर्री कृष्ण मूर्ति की पीठ ने गांगू कामेश्वर राव द्वारा दायर शिकायत पर 12 जून 2026 को यह महत्वपूर्ण आदेश पारित किया। आयोग ने एक रियल एस्टेट डेवलपर को आदेश दिया है कि वह पीड़ित खरीदार को ₹8 लाख से अधिक की कुल राशि का भुगतान करे।

मामला क्या था? (9 Years of Waiting for a Plot)

प्लॉट का सौदा: शिकायतकर्ता गांगू कामेश्वर राव ने विशाखापत्तनम में ‘हासिनी एस्टेट्स एंड कंस्ट्रक्शंस’ (Hasini Estates and Constructions) के प्रोजेक्ट ‘ग्लोरियस गार्डन्स फेज-II’ में ₹18.37 लाख के कुल प्रतिफल (Consideration) पर एक आवासीय प्लॉट बुक किया था।

लाखों का भुगतान: खरीदार ने अक्टूबर 2017 से फरवरी 2018 के बीच कुल ₹6 लाख का भुगतान किया, और 15 दिसंबर 2017 को उनके बीच ‘एग्रीमेंट ऑफ सेल’ (बिक्री समझौता) निष्पादित हुआ।

बिल्डर के बहाने और धोखाधड़ी: इसके बाद जब भी ग्राहक ने रजिस्ट्री की मांग की, बिल्डर ने विशाखापत्तनम महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण (VMRDA/VUDA) से अनुमति न मिलने का बहाना बनाकर मामला टाला। थक-हारकर खरीदार ने पुलिस में भी शिकायत की। पुलिस ने बिल्डर के मैनेजिंग पार्टनर के साथ बैठकें कीं, जहां बिल्डर ने 3 महीने में रजिस्ट्री का आश्वासन दिया, लेकिन कुछ नहीं किया। अंततः ग्राहक को पता चला कि बिल्डर ने वह प्लॉट किसी तीसरे व्यक्ति को बेच दिया है।

बिल्डर का विधिक बचाव: ‘सिविल कोर्ट का मामला’

शुरुआत में नोटिस मिलने के बाद भी बिल्डर प्रक्रिया से गायब रहा और मामला एकपक्षीय (Ex-Parte) बढ़ा। हालांकि, बाद में बिल्डर ने एडवोकेट कृष्णा येर्नी के माध्यम से लिखित दलीलें पेश करते हुए विधिक तर्क दिए। यह विवाद ‘विशिष्ट अनुतोष अधिनियम’ (Specific Relief Act) के तहत आता है, जिसे केवल सिविल कोर्ट तय कर सकता है, उपभोक्ता फोरम नहीं। यह मामला समय-बाधित (Barred by Limitation) है और खरीदार ने कोर्ट फीस से बचने के लिए झूठे दावों के साथ फोरम का रुख किया है। चूंकि खरीदार ने बाकी की 50% रकम समय पर नहीं दी, इसलिए बिल्डर ने एग्रीमेंट की शर्तों के तहत उसकी एडवांस रकम को जब्त (Forfeit) कर लिया और प्लॉट किसी और को बेच दिया।

उपभोक्ता आयोग का विधिक रुख: ‘रकम दबाने का कोई विधिक अधिकार नहीं’

आयोग ने बिल्डर की सभी दलीलों को खारिज करते हुए उसे ‘सेवा में कमी’ (Deficiency in Service) का गंभीर दोषी पाया।

सेल डीड के बजाय रिफंड ही सही विधिक उपाय

आयोग ने स्पष्ट किया कि चूंकि बिल्डर ने विवादित प्लॉट पहले ही किसी तीसरे पक्ष को बेच दिया है, इसलिए अब सेल डीड (रजिस्ट्री) निष्पादित करने का आदेश देने से कानूनी पेचीदगियां और मुकदमा और बढ़ेगा। ऐसी स्थिति में खरीदार अपनी पूरी रकम ब्याज सहित वापस पाने का हकदार है।

अपनी शर्त पूरी न करने पर जब्ती अवैध

पीठ ने कड़ा विधिक सिद्धांत रेखांकित करते हुए कहा, चूंकि बिल्डर समझौते के तहत अपनी विधिक बाध्यताओं (Obligations) को पूरा करने में पूरी तरह विफल रहे, इसलिए उन्हें शिकायतकर्ता द्वारा भुगतान की गई एडवांस राशि को जब्त करने या अपने पास रखने का कोई विधिक अधिकार नहीं है।”

आयोग का विधिक आदेश और राहत

उपभोक्ता आयोग ने माना कि खरीदार को पिछले 9 वर्षों से मानसिक प्रताड़ना, उत्पीड़न और असुविधा का सामना करना पड़ा है।

मूल राशि पर 9% ब्याज: बिल्डर कंपनी शिकायतकर्ता को ₹6 लाख की मूल रकम वापस करे। यह रिफंड राशि भुगतान की शुरुआत यानी अक्टूबर 2017 से लेकर वास्तविक भुगतान की तारीख तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ दी जाएगी (जो ब्याज मिलाकर ₹10.5 लाख से अधिक हो जाएगी)।

मानसिक उत्पीड़न का मुआवजा: खरीदार को हुई मानसिक प्रताड़ना और असुविधा के लिए बिल्डर ₹2 लाख का हर्जाना अलग से देगा।

मुकदमेबाजी का खर्च: पीड़ित ग्राहक को कानूनी लड़ाई का खर्च उठाने के लिए ₹10,000 का भुगतान किया जाए।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक/मुख्य बिंदुउपभोक्ता आयोग का महत्वपूर्ण विधिक निर्णय
शिकायतकर्तागांगू कामेश्वर राव (क्रेता)।
प्रतिवादी पक्षहासिनी एस्टेट्स एंड कंस्ट्रक्शंस (बिल्डर)।
फोरम/आयोगजिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश)।
मुख्य विधिक सिद्धांतयदि बिल्डर अपनी गलती से प्लॉट तीसरे पक्ष को बेचता है, तो वह खरीदार का एडवांस पैसा जब्त नहीं कर सकता। उपभोक्ता आयोग को रिफंड और हर्जाना देने का पूरा अधिकार है।
कुल देय राहत₹6 लाख (9% वार्षिक ब्याज के साथ) + ₹2 लाख हर्जाना + ₹10,000 अदालती खर्च।
विधिक प्रतिनिधित्वशिकायतकर्ता की ओर से एडवोकेट एस. सुकन्या प्रिया; बिल्डर की ओर से एडवोकेट कृष्णा येर्नी।
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