Monday, August 10, 2026
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Private Party: यदि निजी वादी के पास एजी की सहमति नहीं है, तो उसे सीधे कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट केस (Criminal) के रूप में नंबर नहीं दें, पढ़ें निर्देश

Private Party: कर्नाटक हाईकोर्ट ने आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की विधिक प्रक्रिया और वैधानिक सुरक्षा उपायों को लेकर एक महत्वपूर्ण और स्पष्ट कानूनी व्यवस्था दी है।

न्यू स्पेस रिसर्च एंड टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम प्रभात शर्मा का मामला

हाईकोर्ट के जस्टिस अनु शिवरामन और जस्टिस वेंकटेश नाइक टी. की खंडपीठ ने न्यू स्पेस रिसर्च एंड टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम प्रभात शर्मा मामले में यह व्यवस्था दी। अदालत ने दोहराया है कि जब कोई निजी पक्ष (Private Party) एडवोकेट जनरल (महाधिवक्ता) की पूर्व लिखित सहमति के बिना आपराधिक अवमानना याचिका दायर करता है, तो उसे सीधे ‘न्यायिक पक्ष’ (Judicial Side) पर एक औपचारिक मुकदमे के रूप में दर्ज या सूचीबद्ध (List) नहीं किया जा सकता।

यह किया अदालत ने स्पष्ट

अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी याचिकाओं को सीधे खारिज (Dismiss) करने की आवश्यकता नहीं है। इस सामग्री को राज्य के नियमों के तहत अदालत के समक्ष मात्र एक “सूचना” (Information) माना जा सकता है, जिसे मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) के समक्ष ‘प्रशासनिक पक्ष’ (Administrative Side) पर पेश किया जाना चाहिए, ताकि वे तय कर सकें कि इस पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लिया जाए या नहीं।

मामले की पृष्ठभूमि: सर्च वारंट की अनदेखी और विधिक विवाद

सर्च एंड सीज़र का आदेश: यह मामला रक्षा और अंतरिक्ष क्षेत्र से जुड़ी एक कंपनी और प्रतिवादियों के बीच बौद्धिक संपदा (Proprietary Information) के कथित दुरुपयोग से शुरू हुआ था। मूल दीवानी मुकदमे में निचली अदालत द्वारा राहत न मिलने पर याचिकाकर्ता कंपनी (New Space Research) ने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी। हाई कोर्ट ने 6 दिसंबर 2024 को एक ‘कोर्ट कमिश्नर’ नियुक्त कर प्रतिवादियों के परिसर की तलाशी और जब्ती (Search and Seizure) का आदेश दिया।

आदेश की अवहेलना: कोर्ट कमिश्नर की रिपोर्ट के अनुसार, आरोपियों ने परिसर में प्रवेश करने से साफ इनकार कर दिया और वारंट का पालन नहीं होने दिया।

सहमति के बिना याचिका: इसके बाद याचिकाकर्ता कंपनी ने इसे अदालत की गंभीर आपराधिक अवमानना मानते हुए कॉन्टेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट, 1971 की धारा 15 और संविधान के अनुच्छेद 215 के तहत सीधे आपराधिक अवमानना याचिका (Criminal Contempt Petition) दायर कर दी।

रजिस्ट्री की आपत्ति और यू-टर्न: हाई कोर्ट की रजिस्ट्री ने एडवोकेट जनरल (AG) की लिखित सहमति न होने के कारण याचिका की विचारणीयता पर आपत्ति उठाई थी। हालांकि, 24 फरवरी 2026 को अदालत ने इस प्रशासनिक आपत्ति को खारिज करते हुए आरोपियों को नोटिस जारी कर दिया। इसके बाद आरोपियों ने इस नोटिस और आदेश को वापस लेने (Recall) के लिए अदालत में आवेदन (I.A.) दाखिल किया।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: एडवोकेट जनरल की सहमति कोई ‘कागजी औपचारिकता’ नहीं

खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों (पी.एन. दुदा बनाम पी. शिवशंकर – 1988) और (बाल ठाकरे बनाम हरीश पिम्पलखुटे – 2005) पर भरोसा जताते हुए रजिस्ट्री की आपत्ति को सही ठहराया और 24 फरवरी 2026 के अपने ही आदेश को वापस ले लिया। अदालत ने निम्नलिखित विधिक सिद्धांत स्पष्ट किए:

धारा 15 के तहत तय तीन रास्ते आपस में बदले नहीं जा सकते

अदालत ने स्पष्ट किया कि अवमानना अधिनियम की धारा 15(1)(b) के तहत आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के केवल तीन स्पष्ट और कानूनी रास्ते हैं, जो एक-दूसरे की जगह नहीं ले सकते। इसमें अदालत द्वारा स्वतः संज्ञान (Suo Motu) के आधार पर, एडवोकेट जनरल (महाधिवक्ता) द्वारा सीधे लाने पर और किसी अन्य निजी व्यक्ति द्वारा एडवोकेट जनरल की लिखित सहमति (Written Consent) के साथ लाने पर।

विधिक तर्क: महाधिवक्ता की सहमति की अनिवार्यता कोई महज ‘प्रक्रियात्मक औपचारिकता’ (Procedural Formality) नहीं है, बल्कि यह एक ठोस वैधानिक सुरक्षा उपाय (Substantive Safeguard) है। इसका उद्देश्य अदालत के कीमती समय को बर्बाद होने से बचाना और तुच्छ या व्यक्तिगत द्वेष से प्रेरित (Frivolous) याचिकाओं को फिल्टर करना है।

याचिका को “सूचना” (Information) की तरह डील करें

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि निजी वादी के पास एजी की सहमति नहीं है, तो उसे सीधे ‘कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट केस (Criminal)’ के रूप में नंबर नहीं दिया जा सकता और न ही आरोपी को सीधे नोटिस जा सकता है। कहा, “ऐसी स्थिति में रजिस्ट्री को उस याचिका को ‘हाई कोर्ट ऑफ कर्नाटक (कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट प्रोसीडिंग्स) रूल्स, 1981’ के नियम 7 के तहत महज एक ‘सूचना’ (Information) के रूप में दर्ज करना चाहिए। इसके बाद इस फ़ाइल को प्रशासनिक स्तर पर माननीय मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश स्वयं या अन्य न्यायाधीशों के साथ परामर्श कर यह तय करेंगे कि क्या उस जानकारी के आधार पर अदालत को संविधान के अनुच्छेद 215 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेना चाहिए या नहीं।”

केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix)

कानूनी बिंदु / श्रेणियांकर्नाटक उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (2026)
संबंधित अदालतकर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस अनु शिवरामन और जस्टिस वेंकटेश नाइक टी. (खंडपीठ)
पक्षकारन्यू स्पेस रिसर्च एंड टेक्नोलॉजीज प्रा. लि. (याचिकाकर्ता) बनाम प्रभात शर्मा व अन्य (प्रतिवादी)
प्रासंगिक वैधानिक कानूनअवमानना अदालत अधिनियम, 1971 की धारा 15; भारतीय संविधान का अनुच्छेद 215; कर्नाटक हाई कोर्ट अवमानना नियम, 1981 का नियम 7
अदालत का अंतिम निर्देश24 फरवरी 2026 का पुराना नोटिस आदेश वापस (Recall) लिया गया। रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि वे इस याचिका को “सूचना” (Information) मानकर प्रशासनिक आदेश के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष पेश करें।
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