याचिकाकर्ता और राज्य सरकार के बीच कानूनी बहस
- याचिकाकर्ता का पक्ष (अधिवक्ता अंगद कामथ):
- केंद्र बनाम राज्य का अधिकार क्षेत्र: संसद ने हाल ही में ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) अधिनियम, 2026’ पारित कर वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत के रूप में वैधानिक संरक्षण दिया है। राज्य सरकार को किसी राष्ट्रीय प्रतीक या राष्ट्रीय गीत की सामग्री (Content) तय करने का कोई अधिकार नहीं है।
- अनुच्छेद 256 और 257 का उल्लंघन: संविधान के अनुच्छेद 256 और 257 के अनुसार राज्य सरकारें केंद्रीय कानूनों का अनुपालन करने के लिए बाध्य हैं और वे केंद्र की कार्यकारी शक्तियों में बाधा नहीं डाल सकतीं।
- अनौपचारिक कैबिनेट फैसला: राज्य कैबिनेट ने बिना किसी आधिकारिक कैबिनेट नोट या कानूनी सलाह के केवल ‘अनौपचारिक चर्चा’ के आधार पर यह फैसला ले लिया।
- कर्नाटक राज्य सरकार का पक्ष (एडवोकेट जनरल शशी किरण शेट्टी):
- 1932 से चली आ रही परंपरा: 1932 से लेकर आज तक आधिकारिक तौर पर वंदे मातरम के केवल पहले दो पद ही गाए जाते रहे हैं।
- कोई अनिवार्यता नहीं: गृह मंत्रालय (MHA) के संचार केवल मार्गदर्शन के लिए हैं और यह राष्ट्रीय गीत गाने के लिए कोई अनिवार्य बाध्यता पैदा नहीं करते।
- संविधान में अंतर: संविधान में राष्ट्रगान (National Anthem) की तरह ‘राष्ट्रीय गीत’ का अलग से उल्लेख नहीं है और न ही नए संशोधित कानून में राष्ट्रीय गीत की स्पष्ट परिभाषा दी गई है।
गलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस विवादित आदेश के खिलाफ दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई तीन सप्ताह के लिए टाल दी है, जिसके तहत राज्य के सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ के केवल पहले दो अंतरों (First Two Stanzas) को ही गाने का निर्देश दिया गया था।
न्यायमूर्ति अनु शिवरामन और न्यायमूर्ति टी.पी. विवेकानन्द की खंडपीठ ने अधिवक्ता गिरीश भारद्वाज द्वारा अधिवक्ता अंगद कामथ के माध्यम से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए निर्देश दिया कि मामले को तीन सप्ताह बाद पुनः सूचीबद्ध किया जाए। उच्च न्यायालय ने यह कदम राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) द्वारा यह सूचित किए जाने के बाद उठाया कि इसी राष्ट्रीय प्रतीक और 2026 के राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण संशोधन कानून से जुड़ा एक बड़ा विधिक विवाद पहले से ही देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के समक्ष विचाराधीन है।
जनहित याचिका (PIL) में उठाए गए प्रमुख विधिक व संवैधानिक प्रश्न
1. ‘राष्ट्रीय प्रतीक का स्वरूप तय करने का विशेषाधिकार किसका?’: याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता अंगद कामथ ने राज्य सरकार के 8 सितंबर के शासनादेश पर कड़े विधिक सवाल खड़े किए:
- केंद्र बनाम राज्य का विधायी क्षेत्राधिकार: याचिका में पूछा गया कि किसी राष्ट्रीय प्रतीक या राष्ट्रीय गीत के आधिकारिक प्रारूप को निर्धारित या विनियमित करने का अधिकार किसके पास है—केंद्र सरकार के पास या राज्य सरकार के पास?
- अवशिष्ट शक्तियां (Entry 97, List I): दलील दी गई कि संविधान की 7वीं अनुसूची की राज्य सूची (List II) या समवर्ती सूची (List III) में राष्ट्रीय प्रतीकों या राष्ट्रीय गीत से संबंधित कोई प्रविष्टि नहीं है। यह विषय संविधान के अनुच्छेद 248 और संघ सूची की प्रविष्टि 97 के तहत संसद के अनन्य विधायी अधिकार क्षेत्र में आता है।
- अनुच्छेद 256 और 257 का उल्लंघन: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि संसद ने ‘राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2026’ पारित कर वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समान दर्जा और वैधानिक संरक्षण दिया है। संविधान के अनुच्छेद 256 और 257 के अनुसार राज्य सरकारें संसद द्वारा पारित कानूनों का अनुपालन करने के लिए बाध्य हैं और वे केंद्र की कार्यपालिका शक्तियों (Union’s Executive Powers) के क्रियान्वयन में अवरोध उत्पन्न नहीं कर सकतीं।
2. बिना कानूनी सलाह और अनौपचारिक कैबिनेट चर्चा पर सवाल
- याचिका में रेखांकित किया गया कि 8 सितंबर 2026 का यह शासनादेश 3 सितंबर की कैबिनेट बैठक में मद संख्या 37 के तहत एक ‘अनौपचारिक चर्चा’ (Informal Discussion) के आधार पर पारित किया गया।
- इसके लिए न तो प्रशासनिक विभाग की ओर से कोई आधिकारिक कैबिनेट नोट तैयार किया गया था और न ही कोई औपचारिक विधिक राय (Legal Advice) ली गई थी।
कर्नाटक सरकार और महाधिवक्ता का विधिक प्रतिवाद
राज्य सरकार की ओर से पेश महाधिवक्ता (Advocate General) शशिकिरण शेट्टी ने सरकारी आदेश का बचाव करते हुए निम्नलिखित दलीलें प्रस्तुत कीं:
- मार्गदर्शन मात्र, कोई बाध्यकारी अधिदेश नहीं: महाधिवक्ता ने गृह मंत्रालय (MHA) के पत्राचार का हवाला देते हुए कहा कि केंद्र के निर्देश केवल सलाह/दिशानिर्देश (Guidance/Directory) स्वरूप हैं; राष्ट्रीय गीत को गाने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है।
- 1932 से केवल 2 अंतरे गाने की ऐतिहासिक परंपरा: उन्होंने अदालत को बताया कि वर्ष 1932 से लेकर आज तक आधिकारिक और सार्वजनिक रूप से केवल पहले दो अंतरों को ही गाने की निरंतर प्रथा चली आ रही है।
- ‘राष्ट्रीय गीत’ की वैधानिक परिभाषा का अभाव: उन्होंने तर्क दिया कि 2026 के संशोधित अधिनियम में भी ‘राष्ट्रीय गीत’ को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है, और संविधान में राष्ट्रगान की तरह वंदे मातरम का कोई पृथक विशिष्ट उल्लेख नहीं है।
- अनुच्छेद 162 के तहत राज्य की कार्यपालिका शक्ति: राज्य सरकार ने दलील दी कि केंद्र के दिशानिर्देश बाध्यकारी कानून न होने के कारण राज्य को अनुच्छेद 162 के तहत अपने कार्यक्रमों के संचालन हेतु पहले दो अंतरों के गायन का प्रारूप तय करने की पूरी प्रशासनिक छूट प्राप्त है।
सरकारी आदेश की विसंगति (वीआईपी अपवाद)
याचिका में 8 सितंबर के सरकारी आदेश के अंतर्विरोध को भी रेखांकित किया गया:
- आदेश में सामान्य राज्य कार्यक्रमों में केवल पहले दो अंतरों को गाने का नियम बनाया गया है।
- परंतु उसी आदेश में यह अपवाद भी जोड़ा गया है कि यदि किसी कार्यक्रम में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या राज्यपाल उपस्थित रहते हैं, तो वहां सभी 6 अंतरों को गाया जा सकता है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि एक ही राष्ट्रीय गीत के लिए अतिविशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति के आधार पर अलग-अलग मानक तय करना तर्कहीन और असंगत है।
हाईकोर्ट का निर्णय एवं सुप्रीम कोर्ट के साथ लिंक
- सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामला: कर्नाटक उच्च न्यायालय को अवगत कराया गया कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ कर्नाटक गायक टी.एम. कृष्णा की याचिका पर 2026 के संशोधन और गृह मंत्रालय के 6 अंतरों वाले निर्देशों की वैधता पर सुनवाई कर रही है, जहां शीर्ष अदालत ने संकेत दिया है कि वह दंडात्मक प्रावधानों और बिजो इमैनुएल (1986) के सिद्धांतों के आलोक में मामले का परीक्षण करेगी।
- कार्यवाही स्थगित: चूंकि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय इस पूरे विवाद के मूल संवैधानिक आधार को तय करेगा, इसलिए कर्नाटक हाईकोर्ट ने PIL पर गुण-दोष के आधार पर कोई भी अंतिम टिप्पणी किए बिना सुनवाई को तीन सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: गिरीश भारद्वाज बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य [जनहित याचिका (PIL) – कर्नाटक उच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता अंगद कामथ
- कर्नाटक राज्य की ओर से: महाधिवक्ता (Advocate General) शशिकिरण शेट्टी
- प्रासंगिक कानून एवं आदेश: कर्नाटक सरकार का शासनादेश दिनांक 8 सितंबर 2026 (वंदे मातरम के 2 अंतरे); राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण अधिनियम, 1971 सहपठित संशोधन अधिनियम, 2026; गृह मंत्रालय (MHA) का पत्र दिनांक 9 जुलाई 2026 (Orders relating to National Song)
- प्रासंगिक संवैधानिक प्रावधान: भारत का संविधान – अनुच्छेद 162 (राज्य की कार्यपालिका शक्ति), अनुच्छेद 248 सहपठित 7वीं अनुसूची सूची I प्रविष्टि 97 (अवशिष्ट विधायी शक्तियां), अनुच्छेद 256 और 257 (राज्यों और संघ के प्रशासनिक दायित्व)
- पीठ: न्यायमूर्ति अनु शिवरामन और न्यायमूर्ति टी.पी. विवेकानन्द (कर्नाटक उच्च न्यायालय)
- अगली सुनवाई: 3 सप्ताह बाद
Vande Matram: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court) |
| पीठ (Judges) | न्यायमूर्ति अनु शिवरामन और न्यायमूर्ति टी.पी. विवेकानन्द |
| याचिकाकर्ता | अधिवक्ता गिरिश भारद्वाज (अधिवक्ता अंगद कामथ द्वारा प्रतिनिधित्व) |
| राज्य सरकार का पक्ष | एडवोकेट जनरल शशी किरण शेट्टी |
| विवादित आदेश | 8 सितंबर 2026 का राज्य सरकार का आदेश (केवल 2 पद गाने का निर्देश) |
| कोर्ट का निर्देश | सुप्रीम कोर्ट में लंबित केस के कारण सुनवाई 3 सप्ताह के लिए स्थगित |

