Sessions Courts: पटना हाईकोर्ट से देश में आपराधिक मामलों की जांच और केंद्रीय एजेंसियों के क्षेत्राधिकार को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक विधिक फैसला आया है।
Sessions Courts को सीबीआई जांच के निर्देश देने के मामले पर सुनवाई
हाईकोर्ट के जस्तित जितेंद्र कुमार की एकल पीठ ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा दायर रिट याचिका को स्वीकार करते हुए यह व्यवस्था दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सीबीआई जांच का निर्देश देने की यह असाधारण शक्ति केवल संवैधानिक अदालतों (Constitutional Courts) यानी सुप्रीम कोर्ट के (अनुच्छेद 32 के तहत) और उच्च न्यायालयों (अनुच्छेद 226 के तहत) के पास ही सुरक्षित है। इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि कोई भी सत्र न्यायालय अपनी जमानत क्षेत्राधिकार (Bail Jurisdiction) का प्रयोग करते हुए ऐसा कोई निर्देश नहीं दे सकता। अदालत ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि सत्र न्यायालयों (Sessions Courts) और मजिस्ट्रेटों सहित किसी भी जिला अदालत (District Court) के पास केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को किसी अपराध की जांच करने का निर्देश देने की विधिक शक्ति नहीं है।
मामला क्या था? भर्ती परीक्षा में युवक की मौत और सत्र न्यायालय का आदेश
दुखद घटना: यह कानूनी विवाद किशनगंज के एक संवेदनशील मामले से शुरू हुआ था। साल 2015 में अमरेंद्र नारायण के बेटे श्याम नारायण उर्फ सीकू किशनगंज स्थित बीएसएफ कैंप में एसएससी जीडी (SSC GD) भर्ती की शारीरिक परीक्षा देने गया था। वहां वह बेहोश हो गया। घर लौटने पर उसने अपने पिता को बताया कि पुलिसकर्मियों ने उसकी बेरहमी से पिटाई की थी। इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई, जिसके बाद प्राथमिकी (FIR) में धारा 302 (हत्या) जोड़ी गई।
सत्र न्यायालय का क्षेत्राधिकार से बाहर जाना: जांच के दौरान, कुछ आरोपियों ने किशनगंज के सत्र न्यायालय में अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) की अर्जी दाखिल की। इस जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए, सत्र न्यायाधीश ने 26 सितंबर 2017 को एक बेहद अप्रत्याशित आदेश पारित किया। उन्होंने पहले इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) को जांच का जिम्मा सौंपा, और जब आईबी ने क्षेत्राधिकार न होने की बात कही, तो न्यायाधीश ने आदेश को संशोधित कर CBI को इस मामले की स्वतंत्र जांच करने और प्रारंभिक रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दे दिया।
CBI की विधिक चुनौती: इस आदेश के खिलाफ सीबीआई ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सीबीआई का मुख्य तर्क था कि जिला अदालतों के पास ऐसा कोई वैधानिक अधिकार नहीं है और जमानत अर्जी सुनते समय ऐसा आदेश देना जमानत क्षेत्राधिकार के विधिक दायरे से कोसों दूर है।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: संविधान का संघीय ढांचा और कानून
जस्टिस जितेंद्र कुमार ने सीबीआई के तर्कों को पूरी तरह कानून सम्मत माना और सत्र न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण विधिक बिंदु तय किए।
कानून की सुस्थापित स्थिति (The settled legal position)
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह कानूनी सवाल अब ‘रेस इंटेग्रा’ (Res Integra – अछूता या नया) नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की एक लंबी श्रृंखला है जो यह स्थापित करती है कि मौलिक अधिकारों के संरक्षक होने के नाते केवल संवैधानिक अदालतें ही सीबीआई को जांच सौंप सकती हैं। “जिला अदालतें, चाहे वे सत्र न्यायालय हों या मजिस्ट्रेट अदालतें, जो उन्हें शक्ति देने वाले वैधानिक कानूनों (Statutes) के चार कोनों के भीतर काम करती हैं, वे केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को किसी भी अपराध की जांच करने का निर्देश नहीं दे सकती हैं।”
संविधान का संघीय ढांचा (Federal Structure) और DSPE एक्ट
न्यायालय ने इस विधिक मुद्दे को देश के संघीय ढांचे और सीबीआई को नियंत्रित करने वाले ‘दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946’ (DSPE Act) की धारा 6 से जोड़कर समझाया। कोर्ट ने नोट किया कि संविधान की राज्य सूची (State List) की प्रविष्टि 2 (Entry 2) के तहत ‘पुलिस’ एक राज्य का विषय है। राज्य सरकार की सहमति के बिना सीबीआई सामान्यतः किसी राज्य के भीतर अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग नहीं कर सकती। किसी भी जिला अदालत के पास जांच एजेंसी को बदलने (Change of Investigating Agency) की शक्ति नहीं है। यह या तो राज्य सरकार तय कर सकती है या फिर अपनी संवैधानिक शक्तियों के तहत हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट।
गुजरात हाई कोर्ट के विपरीत दृष्टिकोण को खारिज किया
सुनवाई के दौरान, गुजरात हाई कोर्ट के एक पुराने फैसले (अशोक देवेंद्र गोयल बनाम गुजरात राज्य) का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया था कि मजिस्ट्रेट धारा 156(3) CrPC के तहत जांच एजेंसी बदलने की सिफारिश कर सकता है। पटना हाई कोर्ट ने इस विचार से पूरी तरह असहमति जताते हुए कहा, गुजरात उच्च न्यायालय का वह आदेश प्रासंगिक वैधानिक प्रावधानों और हमारे संविधान की संघीय विशेषताओं पर चर्चा किए बिना पारित किया गया था। वह आदेश संक्षिप्त (Cryptic) था और बाध्यकारी न्यायिक मिसालों के विपरीत था।” (अदालत ने इसके स्थान पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले CBI बनाम राजस्थान राज्य (2001) 3 SCC 333 पर भरोसा जताया, जिसमें मजिस्ट्रेटों की ऐसी शक्तियों को पूरी तरह खारिज किया गया था।)
Sessions Courts: जमानत क्षेत्राधिकार का विधिक दायरा
अदालत ने सत्र न्यायाधीश को फटकार लगाते हुए कहा कि यह आदेश इसलिए भी पूरी तरह विधिक रूप से अमान्य (Unsustainable) था क्योंकि यह जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया था। जमानत क्षेत्राधिकार का दायरा केवल यह तय करने तक सीमित होता है कि आरोपी को रिहा किया जाना चाहिए या नहीं; इसका उपयोग जांच की दिशा बदलने या नई एजेंसी नियुक्त करने के लिए नहीं किया जा सकता।
Sessions Courts: केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक श्रेणियां / बिंदु | पटना उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (2026) |
| संबंधित अदालत | पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस जितेंद्र कुमार (एकल पीठ) |
| याचिकाकर्ता | केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) |
| मूल आपराधिक मामला | किशनगंज थाना केस संख्या 257/2015 (धारा 302 IPC) |
| मुख्य कानूनी प्रश्न | क्या कोई सत्र न्यायालय या मजिस्ट्रेट किसी आपराधिक मामले की जांच सीबीआई को सौंप सकता है? |
| अदालत का विधिक स्टैंड | नहीं। जिला अदालतों के पास जांच एजेंसी बदलने या सीबीआई जांच का आदेश देने की कोई वैधानिक शक्ति नहीं है। यह अधिकार केवल सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स के पास है। |
| अदालत का अंतिम आदेश | सीबीआई की रिट याचिका स्वीकार (Allowed); सत्र न्यायालय का आदेश पूरी तरह रद्द (Quashed)। |

