केस एवं कानूनी सारांश (Overview Matrix)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (August 2026) |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति टी. माधवी देवी (तेलंगाना उच्च न्यायालय) |
| मामला नाम | P. Rajgopal v. The State of Telangana |
| संबंधित कानून | Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita (BNSS) — Section 94 (दस्तावेज या जानकारी प्रस्तुत करने का समन/नोटिस) |
| मुख्य विधिक सिद्धांत | 1. एफआईआर या जांच में प्राथमिक साक्ष्य/उल्लेख के बिना सोशल मीडिया यूजर डेटा मांगना अवैध है। 2. बिना विधिक प्रक्रिया के नागरिक के विरुद्ध कोई भी उत्पीड़नकारी कदम (Coercive Steps) नहीं उठाया जा सकता। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | ‘X’ को भेजा गया पुलिस नोटिस रद्द (Quashed)। |
Coercive Steps: तेलंगाना हाईकोर्ट ने हैदराबाद पुलिस द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) को जारी किए गए एक नोटिस को रद्द (Quash) कर दिया है।
न्यायमूर्ति टी. माधवी देवी (Justice T. Madhavi Devi) की पीठ ने पाया कि संबंधित एफआईआर (FIR) में इस उपयोगकर्ता या उसके ‘X’ अकाउंट का कोई उल्लेख ही नहीं था। अतः भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 94 के तहत ऐसा नोटिस जारी करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता था। इस नोटिस के जरिए पुलिस ने हत्या के प्रयास (Attempt to Murder) के एक मामले के संबंध में एक विशिष्ट उपयोगकर्ता (User) के अकाउंट की विस्तृत जानकारी मांगी थी।
कोर्ट ने अपने 7 अगस्त (2026) के आदेश में कहा: “प्रतिवादियों (पुलिस) को निर्देश दिया जाता है कि वे बिना किसी आधार के और कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई भी दंडात्मक या उत्पीड़नकारी कार्रवाई (Coercive Steps) न करें।”
मामला क्या था? (Case Background)
- पुलिस नोटिस (6 अगस्त 2026):
- हैदराबाद के फलकनुमा पुलिस स्टेशन (Faraknuma Police Station) में दर्ज हत्या के प्रयास के एक मामले में, पुलिस ने 6 अगस्त को ‘X’ प्लेटफॉर्म को एक नोटिस जारी किया था।
- पुलिस ने ‘X’ हैंडल
@rajkarsewakसे जुड़े उपयोगकर्ता की मूल जानकारी (Basic User Information), पंजीकरण विवरण, लिंक किया गया मोबाइल नंबर, ई-मेल आईडी, लॉगिन उपकरणों का विवरण और आईपी लॉग्स (IP Logs) की मांग की थी।
- हाई कोर्ट में चुनौती:
- इस नोटिस को पी. राजगोपाल (P. Rajgopal) ने हाई कोर्ट में चुनौती दी। उनके वकील ने तर्क दिया कि एफआईआर में याचिकाकर्ता को न तो आरोपी बनाया गया है और न ही कहीं उनके ‘X’ अकाउंट का जिक्र है।
- याचिकाकर्ता ने आशंका जताई कि पुलिस बिना किसी वैध आधार के उन्हें इस गंभीर मामले में फंसाने की कोशिश कर सकती है।
- अदालत का निर्णय (7 अगस्त 2026):
- हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों को स्वीकार करते हुए माना कि केवल काल्पनिक आधार पर या बिना एफआईआर में नाम के, BNSS की धारा 94 के तहत किसी की निजी सोशल मीडिया जानकारी मांगना गैर-कानूनी है।
- कोर्ट ने पुलिस नोटिस को खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता को राहत दी।

