Saturday, August 15, 2026
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What is the uniform system of law?: गाजियाबाद के जज से 7 दिनों में मांगा जवाब…एक जैसे आरोपों में एक को जेल और दूसरे को बेल

What is the uniform system of law?: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया में एकरूपता (Consistency) और निष्पक्षता को सर्वोपरि रखते हुए गाजियाबाद के जज के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है।

गाजियाबाद के एक एडिशनल सेशंस जज को शोकॉज

हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि विधिक सिद्धांतों का समान अनुप्रयोग (Uniform Application of Law) और न्यायिक निरंतरता संस्थागत महत्व के विषय हैं। कोर्ट ने साफ किया कि एक ही अपराध में समान परिस्थितियों वाले दो आरोपियों के साथ अलग-अलग व्यवहार न्यायसंगत नहीं है। हाई कोर्ट ने गाजियाबाद के एक एडिशनल सेशंस जज (अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश) से स्पष्टीकरण (Explanation) तलब किया है कि उन्होंने एक ही मामले में बिल्कुल एक जैसी भूमिका (Identical Role) वाले दो आरोपियों में से एक को जमानत देने से इनकार क्यों किया, जबकि दूसरे को राहत दे दी।

मामला क्या है?: चाकुओं से हमला और जमानत का दोहरा मापदंड

यह मामला गाजियाबाद की एक अदालत और आरोपी मोहम्मद रफ़ीक उर्फ रफ़ीकुल इस्लाम द्वारा दायर जमानत याचिका से जुड़ा है।

क्या थे आरोप?: मोहम्मद रफ़ीक के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 109(1), 352, 351(2), 115(2), 191(2) और 3(5) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि रफ़ीक ने नौशाद नामक व्यक्ति पर चाकू से हमला किया।

वकील की दलील: रफ़ीक के वकील ने मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि पीड़ित के शरीर पर 10 चोटें थीं, लेकिन चाकू की केवल 1 ही चोट थी जो रफ़ीक से जोड़ी गई थी। यह चोट कंधे के पिछले हिस्से पर थी और ‘साधारण प्रकृति’ (Simple Nature) की थी, जो जानलेवा नहीं थी।

दूसरे आरोपी को बेल: वकील ने कोर्ट को सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह बताया कि इस मामले में बिल्कुल रफ़ीक जैसी भूमिका वाले एक अन्य सह-आरोपी (अंशु) को, जिस पर दूसरे व्यक्ति पर चाकू से हमला करने का आरोप था, 9 जून, 2026 को उसी अदालत द्वारा जमानत दी जा चुकी थी।

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निचली अदालत के आदेश का विरोधाभास (Disparity)

हाई कोर्ट ने पाया कि गाजियाबाद के अपर सत्र न्यायाधीश (कोर्ट नंबर 7) ने रफ़ीक की जमानत अर्जी खारिज करते समय पुलिस की इस कहानी को आधार बनाया कि उसने “जान से मारने की नीयत” से हमला किया था और उसे मामले का “मुख्य आरोपी” (Primary Role) करार दिया। लेकिन, इसके एक महीने से भी कम समय के भीतर, उसी जज ने सह-आरोपी अंशु को जमानत दे दी, जबकि रिकॉर्ड में पीड़ित का साफ बयान था कि अंशु और रफ़ीक दोनों चाकुओं से लैस होकर आए थे और दोनों ने जान से मारने की नीयत से हमला किया था। अंशु को बेल देते समय जज ने केवल इतना लिखा कि “मामले के तथ्यों, परिस्थितियों और गुण-दोष पर टिप्पणी किए बिना, आरोपी को जमानत पर रिहा करने का पर्याप्त आधार है।”

हाई कोर्ट का आदेश: आरोपी को बेल, जज को कारण बताओ नोटिस

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी किए बिना मोहम्मद रफ़ीक को जमानत पर रिहा करने का आदेश दे दिया। इसके साथ ही, जमानत आदेशों में दिखे इस भारी विरोधाभास पर जज को कटघरे में खड़ा करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए। गाजियाबाद के अपर सत्र न्यायाधीश (कोर्ट नंबर 7) को निर्देश दिया जाता है कि वे इस आदेश की प्राप्ति के सात दिनों के भीतर इस न्यायालय के महानिबंधक (Registrar General) के माध्यम से एक विस्तृत स्पष्टीकरण प्रस्तुत करें। वे बताएं कि ऐसे कौन से अलग तथ्य, परिस्थितियां या कानूनी बिंदु थे, जिनके कारण उन्होंने वर्तमान आवेदक-आरोपी को जमानत देने से इनकार किया, जबकि उसी स्तर पर खड़े सह-आरोपी अंशु को जमानत दे दी।

जस्टिस सिंह ने स्पष्ट किया कि यह आदेश प्रशासनिक उद्देश्यों (Administrative Purposes) के लिए जारी किया जा रहा है और इसे संबंधित न्यायिक आदेशों की योग्यता पर किसी अंतिम राय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Overview)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांइलाहाबाद उच्च न्यायालय की विधिक कार्यवाही (जून 2026)
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस विवेक कुमार सिंह (एकल पीठ)
याचिकाकर्ता (आरोपी)मोहम्मद रफ़ीक उर्फ रफ़ीकुल इस्लाम
जवाबदेह अधिकारीअपर सत्र न्यायाधीश, कोर्ट नंबर 7, गाजियाबाद
मुख्य विधिक विसंगतिएक ही केस में चाकू मारने के समान आरोपी ‘अंशु’ को बेल मिली, लेकिन ‘रफ़ीक’ को जेल में रखा गया।
हाई कोर्ट का अंतिम आदेशरफ़ीक को जमानत मंजूर; निचली अदालत के जज को 7 दिन के भीतर लिखित स्पष्टीकरण देने का कड़ा निर्देश।
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