Saturday, August 15, 2026
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Maintenance Case: क्या सरकारी योजना में घर मिलने पर पत्नी का भरण-पोषण बंद हो सकता है?… इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला: ‘बिल्कुल नहीं’

Maintenance Case: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा, कल्याणकारी सरकारी योजना के तहत मिला घर रहने के लिए छत तो दे सकता है, लेकिन वह आजीविका (Livelihood) का साधन नहीं बन सकता।

Maintenance Case के मामले में पति ने दायर की थी पुनरीक्षण याचिका

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस गरिमा प्रशांत की एकल पीठ ने यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। ने वैवाहिक विवादों और भरण-पोषण के मामलों में महिलाओं के पक्ष में एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील कानूनी व्यवस्था दी है। कहा, सिर्फ सिर पर छत होने को वित्तीय स्वतंत्रता नहीं माना जा सकता और न ही इसके आधार पर एक पति अपनी पत्नी को भरण-पोषण देने की विधिक जिम्मेदारी से बच सकता है। अदालत ने पति की पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) को पूरी तरह खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पति को अपनी पत्नी को प्रति माह भरण-पोषण राशि देने का निर्देश दिया गया था।

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मामला क्या है?: दहेज प्रताड़ना और ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ का बहाना

दहेज उत्पीड़न का आरोप: जोड़े की शादी दिसंबर 2016 में हुई थी। शादी के कुछ समय बाद ही पत्नी ने आरोप लगाया कि उसे अतिरिक्त दहेज के लिए प्रताड़ित और क्रूरता का शिकार बनाया गया, जिसके कारण आखिरकार उसे अपना ससुराल छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। इसके बाद पत्नी ने फैमिली कोर्ट में धारा 125 CrPC (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की प्रासंगिक धारा) के तहत भरण-पोषण का मुकदमा दायर किया।

पति के दो अजीब तर्क: पति ने कोर्ट में पत्नी को पैसे न देने के लिए दो मुख्य दलीलें रखीं। उसने दावा किया कि उसकी पत्नी सिलाई-कढ़ाई (Sewing and Embroidery) का काम करती है और खुद का खर्च उठाने में सक्षम है। उसने सबसे बड़ा तर्क यह दिया कि उसकी पत्नी को सरकार की ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ (PMAY) के तहत एक पक्का मकान आवंटित हुआ है, इसलिए अब उसे भरण-पोषण की कोई जरूरत नहीं है।

खुद को बताया बेरोजगार ड्राइवर: इसके साथ ही पति ने रोना रोया कि वह एक अनपढ़ ड्राइवर है जो पहले बमुश्किल ₹5,000 महीना कमाता था और अब पूरी तरह बेरोजगार है।

हाई कोर्ट की दोटूक: छत मिलना अलग बात है, हाथ में पैसा आना अलग

फैमिली कोर्ट द्वारा पति के दावों को खारिज किए जाने के बाद मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा, जहां जस्टिस गरिमा प्रशांत ने पति की दोनों दलीलों को कानूनन खोखला पाया।

सरकारी घर आजीविका नहीं: हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोक कल्याणकारी योजनाओं (Welfare Schemes) के तहत किसी गरीब या जरूरतमंद महिला को घर मिलना उसकी सुरक्षा के लिए है। कोर्ट ने कहा, एक आवासीय मकान महिला को रहने की जगह देता है, लेकिन वह उसके हाथ में नकद पैसा या भोजन नहीं डालता। कल्याणकारी योजना के तहत घर के आवंटन को आजीविका का साधन नहीं माना जा सकता और इसके आधार पर पत्नी को भरण-पोषण के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

सिर्फ हवा-हवाई दावों से कुछ नहीं होता: सिलाई-कढ़ाई से पत्नी की कमाई होने के दावे पर कोर्ट ने कहा कि पति ने अपनी पत्नी की नियमित आय का कोई ठोस विधिक सबूत (Solid Evidence) पेश नहीं किया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि याचिका या हलफनामे में लिखी कोरी बातें, जब तक सबूतों से साबित न हों, वित्तीय स्वतंत्रता का प्रमाण नहीं मानी जा सकतीं।

बेरोजगारी का बहाना नामंजूर: पति के बेरोजगार होने की दलील को ठुकराते हुए कोर्ट ने कहा कि एक स्वस्थ और सक्षम पुरुष केवल यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं भाग सकता कि वह कमा नहीं रहा है। चूंकि वह एक कुशल ड्राइवर है और शारीरिक रूप से स्वस्थ है, इसलिए उसे अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने के लिए कमाना ही होगा।

कोर्ट का अंतिम आदेश: कितना देना होगा गुजारा भत्ता?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निचली अदालत (Family Court) के आदेश में किसी भी प्रकार की विधिक अवैधता या त्रुटि न पाते हुए पति को निम्नलिखित भुगतान तुरंत करने का निर्देश दिया:

आवेदन की तारीख से: भरण-पोषण की अर्जी दाखिल करने की तिथि से ₹4,000 प्रति माह का बकाया (Arrears)।

आदेश की तारीख से: फैमिली कोर्ट के आदेश की तिथि से नियमित रूप से ₹5,000 प्रति माह का भुगतान।

केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Key Takeaways)

विधिक श्रेणियांइलाहाबाद उच्च न्यायालय की विधिक व्यवस्था (जून २०२६)
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस गरिमा प्रशांत (एकल पीठ)
मूल अधिनियम/धाराधारा 125 दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) / भरण-पोषण का अधिकार
विवाद का मुख्य बिंदुक्या प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) का घर मिलना गुजारे भत्ते को रोकने का आधार है?
अदालत का फैसलानहीं। आश्रय (Shelter) और वित्तीय स्वतंत्रता (Financial Independence) दो अलग विधिक पहलू हैं।
पति की देनदारीआवेदन की तिथि से ₹4,000/माह और आदेश की तिथि से ₹5,000/माह देना अनिवार्य।
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