Friday, August 14, 2026
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Deficiency in Service: 1995 में दिए थे ₹25 लाख, 30 साल बाद भी नहीं मिला कब्जा; बिल्डर को ब्याज और मुआवजे पर यह रहा आदेश, जानिए

Deficiency in Service: पैसे लेकर ग्राहकों को दशकों तक चक्कर कटवाने और प्रोजेक्ट का निर्माण न करने वाले बिल्डरों के खिलाफ महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने एक कड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग की पीठ, जिसमें सदस्य पूनम महर्षि और सदस्य डॉ. निशा अमोल चव्हाण शामिल थीं, ने बिल्डर को सेवा में गंभीर कमी (Deficiency in Service) और अनुचित व्यापार व्यवहार (Unfair Trade Practice) का दोषी पाते हुए यह फैसला सुनाया। आयोग ने एक डेवलपर को आदेश दिया है कि वह खरीदार से साल 1995 में वसूले गए ₹25 लाख की पूरी रकम 12% सालाना ब्याज के साथ वापस करे। इसके साथ ही बिल्डर पर ₹2 लाख का मानसिक प्रताड़ना हर्जाना भी लगाया गया है।

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मामला क्या है?: 1995 का निवेश और 3 दशकों का इंतजार

यह कानूनी लड़ाई करीब 31 साल पुरानी है, जिसने एक छोटे कारोबारी के सब्र का कड़ा इम्तिहान लिया।

11 कमर्शियल यूनिट्स की बुकिंग: साल 1995 में ‘मोदी ट्रेडिंग कॉर्पोरेशन’ के मालिक अमीश अनंतराय मोदी ने अपने मौजूदा व्यवसाय को बढ़ाने और स्वरोजगार (Self-employment) के जरिए आजीविका कमाने के लिए एक प्रोजेक्ट में 11 कमर्शियल दुकानें/यूनिट्स बुक की थीं। इसके लिए उन्होंने बिल्डर को कुल ₹25 लाख का भुगतान किया था।

बिल्डिंग का निर्माण ही नहीं हुआ: पूरी रकम डकारने के बावजूद बिल्डर ने कभी प्रोजेक्ट का निर्माण कार्य शुरू ही नहीं किया। खरीदार सालों तक कब्जे (Possession) के लिए चक्कर काटता रहा।

2018 में स्टैम्प पेपर पर धोखा: सालों की भागदौड़ के बाद, 2018 में बिल्डर ने खरीदार को स्टैम्प पेपर पर एक लिखित आश्वासन तो दिया, लेकिन उसमें बिक्री समझौते (Sale Agreement) पर हस्ताक्षर करने या कब्जे की कोई तारीख तय नहीं की। थक-हारकर खरीदार ने 2018 में ही राज्य उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।

बिल्डर कोर्ट से भागा: आयोग द्वारा नोटिस भेजे जाने के बावजूद बिल्डर सुनवाई के दौरान कभी पेश नहीं हुआ। नतीजतन, अदालत ने एकतरफा (Ex-parte) कार्रवाई करते हुए सबूतों के आधार पर यह फैसला सुनाया।

क्या कमर्शियल प्रॉपर्टी खरीदने वाला ‘उपभोक्ता’ है? आयोग की अहम व्यवस्था

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यह था कि क्या कमर्शियल (व्यावसायिक) दुकानें खरीदने वाला व्यक्ति उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (Consumer Protection Act) के तहत ‘उपभोक्ता’ माना जाएगा? आयोग ने इस पर बहुत स्पष्ट विधिक रुख अपनाया:

निवेश बनाम आजीविका का अंतर: आयोग ने पाया कि इन 11 यूनिट्स को खरीदने का मकसद कोई सट्टा व्यापार, रीसेल (दोबारा बेचना) या महज वित्तीय निवेश (Investment) नहीं था।

सच्चा उपभोक्ता माना: आयोग ने अपने आदेश में कहा, “शिकायतकर्ता ने इन इकाइयों को मुनाफा कमाने या निवेश के इरादे से नहीं, बल्कि पूरी तरह से अपना खुद का व्यवसाय चलाने और स्वरोजगार के माध्यम से अपनी आजीविका कमाने के लिए खरीदा था। इसलिए, वह कानूनन एक वैध उपभोक्ता हैं।”

बिल्डर की घोर लापरवाही: आयोग ने नोट किया कि तीन दशक से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी इमारत का अस्तित्व ही नहीं है और भविष्य में भी कब्जा मिलने की कोई निश्चितता नहीं है। बिल्डर ने पैसे लेने के बावजूद सेल डीड रजिस्टर न करके अपने संविदात्मक दायित्वों (Contractual Obligations) का घोर उल्लंघन किया है।

Deficiency in Service को लेकर कोर्ट का अंतिम आदेश: बिल्डर को क्या-क्या चुकाना होगा?

  • महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता आयोग ने बिल्डर को आदेश की प्रति मिलने के 45 दिनों के भीतर निम्नलिखित भुगतान करने का सख्त निर्देश दिया है।
  • मूल रकम की वापसी: ₹25 लाख का पूरा रिफंड।
  • भारी ब्याज: वर्ष 1995 में किए गए भुगतानों की तारीख से लेकर वास्तविक वसूली की तारीख तक 12% प्रति वर्ष की दर से ब्याज (30 साल का ब्याज जोड़ने पर यह राशि मूल रकम से कई गुना अधिक हो जाएगी)।
  • मानसिक प्रताड़ना का हर्जाना: ₹2,00000 (दो लाख रुपये) मानसिक आघात और उत्पीड़न के मुआवजे के रूप में।
  • मुकदमेबाजी का खर्च: ₹25,000 कानूनी खर्च के तौर पर।

Deficiency in Service: केस मैट्रिक्स और खरीदारों के लिए सबक (Case Summary)

विधिक और प्रशासनिक श्रेणियांमहाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता आयोग का फैसला (जून 2026)
संबंधित आयोगमहाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग
पीठ के माननीय सदस्यपूनम महर्षि और डॉ. निशा अमोल चव्हाण
मामले के मुख्य पक्षअमीश अनंतराय मोदी (उपभोक्ता) बनाम डेवलपर/बिल्डर
विवाद की अवधि31 वर्ष (1995 से 2026)
लागू ब्याज दररिफंड राशि पर 12% वार्षिक ब्याज
विधिक takeawayकमर्शियल प्रॉपर्टी भी उपभोक्ता कानून के दायरे में आ सकती है, बशर्ते वह स्वरोजगार और आजीविका (Livelihood) के लिए खरीदी गई हो, न कि रीसेल या निवेश के लिए।
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