Thursday, October 1, 2026
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DRDA Bokaro Peon: कार्यालय से चपरासी कुछ चाय- बिस्कुट घर लेकर चला गया…तो उसे बर्खास्त करेंगे, यह कहां का दया से जुड़ा न्याय है, पढ़ें फैसला

DRDA Bokaro Peon: झारखंड हाईकोर्ट ने एक बेहद मानवीय और विधिक महत्व का फैसला सुनाया है।

17 वर्षों से संविदा पर कार्यरत चपरासी को बर्खास्त करना पूरी तरह असंगत: अदालत

हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एम.एस. रामचंद्र राव और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने अपने आदेश में जिला ग्रामीण विकास एजेंसी (DRDA), बोकारो द्वारा एक चपरासी की सेवा समाप्ति के आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया और उसे तुरंत बहाल करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा, यदि हम यह मान भी लें कि कर्मचारी कार्यालय से कुछ चाय और बिस्कुट अपने घर ले गया था (जिसका हम समर्थन नहीं करते), तो भी पिछले 17 वर्षों से संविदा (contractual) पर काम कर रहे एक कम वेतन पाने वाले चपरासी को बर्खास्त करना पूरी तरह से असंगत (grossly disproportionate) है और अंतरात्मा को झकझोर देने वाला है। यह दया से जुड़ा न्याय नहीं, बल्कि संवेदनहीनता से भरा घोर अन्याय है।

मामला क्या था?: 17 साल की सेवा और ‘चाय-बिस्कुट’ का आरोप

यह कानूनी विवाद बोकारो के एक बेहद गरीब संविदा कर्मचारी रंजीत कुमार हिमांशु की आजीविका से जुड़ा है।

लंबा सेवाकाल: रंजीत कुमार हिमांशु को दिसंबर 2005 में DRDA बोकारो में एक संविदा चपरासी (Contractual Peon) के रूप में नियुक्त किया गया था। उन्होंने लगभग 17 वर्षों तक वहां अपनी सेवाएं दीं।

अस्पष्ट कारण बताओ नोटिस: 16 मार्च 2022 को उन्हें एक कारण बताओ (Show-Cause) नोटिस जारी किया गया, जिसमें बेहद धुंधले और अस्पष्ट आरोप लगाए गए कि वे “कार्यालय से कुछ सामग्री अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिए ले गए थे और उसका एक हिस्सा बाद में वापस कर दिया गया था।” हालांकि, नोटिस में यह कहीं नहीं लिखा था कि वह ‘सामग्री’ क्या थी।

माफी की गुहार और बर्खास्तगी: रंजीत ने नोटिस के जवाब में कहा कि उनका पूरा परिवार उनकी इस मामूली आय पर निर्भर है। उन्होंने अनुरोध किया कि यदि उनसे अनजाने में कोई गलती हुई हो तो उन्हें माफ कर दिया जाए और आश्वासन दिया कि ऐसा दोबारा नहीं होगा। इसके बावजूद, 2 मई 2022 को प्रशासन ने उनके जवाब को “असंतोषजनक” बताते हुए उनकी सेवा समाप्त (Terminate) कर दी।

हाई कोर्ट में अपील: एकल पीठ (Single Judge) द्वारा बर्खास्तगी में हस्तक्षेप करने से इनकार करने के बाद, रंजीत ने डिवीजन बेंच के समक्ष अपील दायर की। सुनवाई के दौरान रंजीत के वकील ने स्पष्ट किया कि उन पर लगा आरोप केवल कार्यालय से ‘चाय पत्ती और बिस्कुट’ ले जाने का था।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की धज्जियां उड़ीं

खंडपीठ ने राज्य सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों की इस कार्रवाई को कानूनी और नैतिक दोनों मोर्चों पर पूरी तरह गलत माना।

अस्पष्ट नोटिस का कोई विधिक मूल्य नहीं: अदालत ने कहा कि कारण बताओ नोटिस “इतना अस्पष्ट था जितना अस्पष्ट कोई नोटिस हो सकता है।” कानून की नजर में ऐसे नोटिस का कोई अस्तित्व नहीं होता क्योंकि जब कर्मचारी को यह पता ही नहीं होगा कि उस पर आरोप क्या है, तो वह अपना बचाव कैसे करेगा? यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत (Principles of Natural Justice) का सीधा उल्लंघन है।

आनुपातिकता का सिद्धांत (Doctrine of Proportionality): कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि सजा हमेशा अपराध के अनुपात में होनी चाहिए। चाय-बिस्कुट जैसे बेहद मामूली आरोप के लिए किसी व्यक्ति की 17 साल की नौकरी छीन लेना और उसके परिवार को भुखमरी के कगार पर धकेलना प्रशासनिक क्रूरता है।

पिछले रिकॉर्ड की अनदेखी: प्रशासन ने सेवा समाप्ति का आदेश जारी करते समय रंजीत के पिछले 17 साल के बेदाग रिकॉर्ड और विभिन्न उप विकास आयुक्तों (DDCs) द्वारा उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए दिए गए प्रशंसा पत्रों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।

हाई कोर्ट का सख्त निर्देश और समय सीमा

अदालत ने पीड़ित कर्मचारी को पूर्ण न्याय देते हुए बोकारो प्रशासन को निम्नलिखित सख्त निर्देश जारी किए हैं।

तत्काल सेवा में बहाली

समय सीमा: 1 जुलाई 2026-अदालत ने रंजीत कुमार हिमांशु की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द करते हुए उन्हें 1 जुलाई 2026 तक सेवा में वापस बहाल करने का आदेश दिया।

2.50% पिछले वेतन (Back Wages) का भुगतान

समय सीमा: 31 जुलाई 2026-राज्य सरकार को निर्देश दिया गया है कि रंजीत को उनकी बर्खास्तगी की अवधि का 50 प्रतिशत पिछला वेतन 31 जुलाई 2026 तक अनिवार्य रूप से भुगतान किया जाए। कोर्ट ने माना कि बाकी का 50% वेतन न मिलना ही उनके कथित कदाचार के लिए पर्याप्त सजा है।

अधिकारियों को व्यक्तिगत जिम्मेदारी

जवाबदेही-बोकारो के जिला मजिस्ट्रेट (DC) और उप विकास आयुक्त (DDC) को व्यक्तिगत रूप से इस आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने और कोर्ट में अनुपालन हलफनामा (Compliance Affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।

अदालत इस मामले में अनुपालन रिपोर्ट की समीक्षा के लिए 13 जुलाई और 13 अगस्त 2026 को दोबारा सुनवाई करेगी।

केस मैट्रिक्स: झारखंड हाई कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश (Case Summary)

विधिक और प्रशासनिक श्रेणियांझारखंड उच्च न्यायालय की विधिक व्यवस्था (२०२६)
संबंधित अदालतझारखंड उच्च न्यायालय, राँची (खंडपीठ)
मामला/केस संदर्भरंजीत कुमार हिमांशु बनाम झारखंड राज्य (Ranjeet Kumar Himanshu v. State of Jharkhand)
प्रासंगिक कानूनी सिद्धांतप्राकृतिक न्याय का सिद्धांत और आनुपातिकता का सिद्धांत (Doctrine of Proportionality)
याचिकाकर्ता के वकीलएडवोकेट कृष्णा प्रजापति
राज्य सरकार के वकीलवरिष्ठ स्थायी अधिवक्ता अशोक कुमार यादव और एडवोकेट आदित्य कुमार
अदालत का अंतिम निर्णयबर्खास्तगी आदेश रद्द; ५०% पिछले वेतन के साथ नौकरी में तत्काल बहाली का आदेश।
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