Thursday, October 1, 2026
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Family Dispute: गुड़ के बर्तन पर अगर सास-बहू के बीच झगड़ा होता है तो वह IPC की धारा 498A के तहत क्रूरता नहीं…वैवाहिक विवाद का फैसला पढ़ें

Family Dispute: झारखंड हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों और सास-बहू के झगड़ों में धारा 498A के दुरुपयोग को लेकर यह महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है।

हाईकोर्ट जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने लाखी देवी बनाम झारखंड राज्य मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए आरोपी सास की दोषसिद्धि (Conviction) और 3 साल की जेल की सजा के आदेश को पूरी तरह से निरस्त (Set Aside) कर दिया है। कहा, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत क्रूरता साबित करने के लिए ऐसे आचरण का सबूत होना जरूरी है जो महिला को आत्महत्या के लिए उकसाए या उसे गंभीर चोट पहुँचाए, या फिर वह प्रताड़ना किसी अवैध संपत्ति या दहेज की मांग से जुड़ी हो। घरेलू कहासुनी की एक अकेली घटना को इस धारा के तहत क्रूरता नहीं माना जा सकता।

मामला क्या है?: ‘गुड़ की चाशनी’ (Treacle) के बर्तन पर हुआ था विवाद

यह अजीबोगरीब और दुखद मामला जनवरी 2001 का है, जो रांची के एक परिवार में घटित हुआ था।

झगड़े की वजह: मृतका परमिला देवी की शादी को लगभग 7 साल हो चुके थे। एक दिन उसने रसोई में ऊंचे शेल्फ पर रखा गुड़ की चाशनी (Treacle) का एक बर्तन नीचे जमीन पर रख दिया। इस बात से नाराज होकर उसकी सास लाखी देवी ने उसे कथित तौर पर अपशब्द कहे और डांट दिया।

बहू की आत्महत्या और केस: इस बहस से आहत होकर परमिला ने खुद को आग लगा ली और इलाज के दौरान अस्पताल में उसकी मौत हो गई। मरने से पहले पुलिस को दिए बयान में परमिला ने आरोप लगाया कि उसकी सास शादी के शुरुआती दिनों से ही उसके साथ क्रूरता करती आ रही थी। पुलिस ने सास के खिलाफ धारा 498A (क्रूरता) और मौत के बाद धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत केस दर्ज किया।

निचली अदालत का फैसला: ट्रायल कोर्ट ने सुनवाई के बाद सास लाखी देवी को ‘आत्महत्या के लिए उकसाने’ (धारा 306) के आरोप से तो बरी कर दिया, लेकिन उसे धारा 498A के तहत दोषी पाते हुए 3 साल के सश्रम कारावास की सजा सुना दी। इस सजा के खिलाफ सास ने हाई कोर्ट में अपील की।

हाई कोर्ट का रुख: घरेलू बहस क्रूरता के कानूनी दायरे में नहीं आती

झारखंड हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का बारीकी से अध्ययन किया और पाया कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) धारा 498A के विधिक तत्वों को साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है।

पूर्व में प्रताड़ना का कोई सबूत नहीं

अदालत ने रेखांकित किया कि गुड़ के बर्तन को लेकर हुई बहस के अलावा, अभियोजन पक्ष सास के खिलाफ पहले की किसी भी क्रूरता या मारपीट का कोई ठोस सबूत या गवाह पेश नहीं कर सका। कोर्ट ने कहा, “वर्तमान मामले में, जमीन पर गुड़ बिखरने या रखने पर सास द्वारा मृतका को गाली देने के अलावा कोई अन्य कृत्य सामने नहीं आया है। पूर्व में किसी भी उत्पीड़न का कोई प्रदर्शन नहीं है, जिससे यह सिद्ध हो कि 7 साल तक ससुराल में रहने के दौरान उसे लगातार परेशान किया गया था।

दहेज या अवैध संपत्ति की कोई मांग नहीं थी

जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने स्पष्ट किया कि इस पूरे विवाद में न तो मायके वालों की तरफ से और न ही मृतका के बयान में कभी किसी प्रकार की दहेज (Dowry Demand) या अवैध धन/संपत्ति की मांग का कोई जिक्र था। यह विशुद्ध रूप से एक क्षणिक और आकस्मिक घरेलू कलह थी।

गवाहों ने नहीं दिया साथ

अदालत ने यह भी पाया कि अभियोजन पक्ष के कई महत्वपूर्ण गवाहों ने ट्रायल के दौरान कहानी का समर्थन नहीं किया और उनके बयानों में भारी विरोधाभास थे। निचली अदालत ने इन विधिक खामियों को नजरअंदाज कर के गलत तरीके से सास को दोषी ठहराया था।

अदालत का अंतिम आदेश

झारखंड उच्च न्यायालय ने माना कि केवल एक इकलौती बहस या गाली-गलौज की घटना के आधार पर किसी बुजुर्ग महिला को 3 साल की जेल भेजना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। कोर्ट ने लाखी देवी की अपील को स्वीकार करते हुए उनकी दोषसिद्धि को रद्द कर दिया और उन्हें सभी आरोपों से ससम्मान बरी कर दिया।

केस मैट्रिक्स: झारखंड हाई कोर्ट का आदेश

विधिक और प्रशासनिक श्रेणियांझारखंड उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति
संबंधित अदालतझारखंड उच्च न्यायालय, राँची
माननीय न्यायाधीशजस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव (एकल पीठ)
केस संदर्भलाखी देवी बनाम झारखंड राज्य (Lakhi Devi v. State of Jharkhand)
विवाद का मूल कारणजनवरी 2001 में गुड़ की चाशनी के बर्तन को लेकर सास-बहू में कहासुनी।
संबद्ध विधिक धाराभारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A (वैवाहिक क्रूरता)
बचाव पक्ष के वकीलएडवोकेट ओम प्रकाश
राज्य के वकील (APP)तरुण कुमार
अदालत का अंतिम निर्णयअपील मंजूर; ट्रायल कोर्ट का 3 साल की सजा का फैसला रद्द, सास बरी।
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