Indian Citizenship: असम में नागरिकता (Citizenship) और विदेशी ट्रिब्यूनल से जुड़े मामलों पर गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए ३८ वर्षीय एक व्यक्ति की याचिका को खारिज कर दिया है।
हाईकोर्ट जस्तित कल्याण राय सुराणा और जस्टिस शमीमा जहां की खंडपीठ ने [अमीनुल होक बनाम भारत संघ व अन्य] मामले की सुनवाई करते हुए फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल (Foreigners Tribunal) के उस 2019 के आदेश को सही ठहराया है, जिसमें याचिकाकर्ता को ‘विदेशी’ (Foreigner) घोषित किया गया था।
कहा, “यह कानूनी रूप से पूरी तरह स्थापित हो चुका है कि पैन कार्ड (PAN Card) और वोटर आईडी (EPIC) नागरिकता का अकाट्य प्रमाण नहीं हैं। केवल पहचान पत्र जारी होने से कोई भारतीय नागरिक सिद्ध नहीं हो जाता।”
मामला क्या है?: कट-ऑफ तारीख और 15 कागजातों की कानूनी जंग
यह मामला गुवाहाटी के निवासी 38 वर्षीय अमीनुल होक से जुड़ा है, जिन्होंने खुद को जन्म से भारतीय नागरिक बताते हुए विदेशी ट्रिब्यूनल के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
दावे का आधार: अमीनुल ने असम में नागरिकता साबित करने की तय कट-ऑफ तारीख (24 मार्च 1971) से पहले अपने परिवार की मौजूदगी दिखाने के लिए 15 अलग-अलग दस्तावेज कोर्ट के सामने रखे। इनमें 1951 का एनआरसी (NRC) डेटा, 1966 के बाद की मतदाता सूचियां, 1973 की जमीन की रजिस्ट्री (Sale Deed), पैन कार्ड, वोटर आईडी और स्कूल सर्टिफिकेट शामिल थे।
तर्कों की विसंगतियां: अमीनुल ने कोर्ट को बताया कि अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड में उसके माता-पिता और दादा-दादी के नामों की स्पेलिंग में अंतर लिपिकीय त्रुटियों (Clerical Errors) के कारण था। उसने यह भी दलील दी कि ब्रह्मपुत्र नदी के कटाव (Erosion) के कारण उसके परिवार को एक गांव से दूसरे गांव पलायन करना पड़ा था, इसलिए अलग-अलग वर्षों की वोटर लिस्ट में उनके नाम अलग-अलग जगहों से दर्ज हुए।
हाई कोर्ट का रुख: दस्तावेज तो हैं, पर वंशावली की कड़ी गायब है
हाई कोर्ट ने अमीनुल के सभी 15 दस्तावेजों की गहन कानूनी जांच की और पाया कि वह फॉरेनर्स एक्ट, 1964 की धारा 9 के तहत खुद को भारतीय नागरिक साबित करने का कानूनी बोझ (Burden of Proof) उठाने में पूरी तरह नाकाम रहा। कोर्ट ने अपने फैसले में निम्नलिखित विधिक कमियां बताईं:
पूर्वजों से वंशावली लिंक (Documentary Link) का न होना
अदालत ने कहा कि उसे नाम की स्पेलिंग में मामूली अंतर से कोई आपत्ति नहीं है। मुख्य समस्या यह है कि याचिकाकर्ता यह साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं दे पाया कि अलग-अलग गांवों की वोटर लिस्ट में दिखने वाले नाम वास्तव में एक ही परिवार के हैं। नदी के कटाव के कारण पलायन करने के दावे का भी कोई स्वतंत्र सरकारी रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया।
तकनीकी और कानूनी रूप से खारिज हुए दस्तावेज
1951 एनआरसी एक्सट्रैक्ट: कोर्ट ने कंप्यूटर से निकले 1951 के एनआरसी डेटा को खारिज कर दिया, क्योंकि इसे इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड से जुड़े साक्ष्य कानून (Information Technology Act) के तहत प्रमाणित नहीं किया गया था।
1973 की जमीन रजिस्ट्री: यह दस्तावेज केवल यह दिखाता था कि अमीनुल के कथित दादा ने जमीन खरीदी थी, लेकिन यह याचिकाकर्ता और उस दादा के बीच के वास्तविक संबंध को स्थापित नहीं करता था।
स्कूल सर्टिफिकेट: स्कूल के सर्टिफिकेट को इसलिए अमान्य माना गया क्योंकि इसे जारी करने वाले प्राधिकारी (Author) का कोर्ट में परीक्षण नहीं कराया गया और न ही मूल स्कूल प्रवेश रजिस्टर (Admission Register) पेश किया गया।
पहचान पत्र बनाम नागरिकता
हाई कोर्ट ने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा, यह पूरी तरह से तय नियम है कि पैन कार्ड और वोटर आईडी (EPIC) नागरिकता का सबूत नहीं हैं, ये केवल पहचान और पते के दस्तावेज हैं। इसके अलावा, पिता की केवल मौखिक गवाही (Oral Testimony) कि ‘यह मेरा बेटा है’, तब तक नागरिकता सिद्ध नहीं कर सकती जब तक कि परिवार का भारतीय पूर्वजों से जुड़ाव दिखाने वाला अकाट्य दस्तावेजी प्रमाण मौजूद न हो।
केस मैट्रिक्स: गुवाहाटी हाई कोर्ट का आदेश (जुलाई 2026)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | गुवाहाटी उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति |
| संबंधित अदालत | गुवाहाटी उच्च न्यायालय, असम |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस कल्याण राय सुराणा और जस्टिस शमीमा जहां (खंडपीठ) |
| केस संदर्भ | अमीनुल होक बनाम भारत संघ व अन्य (Aminul Hoque v Union of India & Ors.) |
| विधिक धारा | फॉरेनर्स एक्ट, १९६४ की धारा 9 (नागरिकता साबित करने का बोझ नागरिक पर) |
| खारिज होने का कारण | पूर्वजों के साथ वंशावली कड़ियों (Linkage) को जोड़ने में दस्तावेजों की विफलता। |
| याचिकाकर्ता के वकील | एडवोकेट एम.यू. महमूद |
| भारत सरकार के वकील | सेंट्रल गवर्नमेंट काउंसिल (CGC) बी. डेका |
| अदालत का अंतिम निर्णय | याचिका खारिज। ट्रिब्यूनल का ‘विदेशी घोषित करने’ का फैसला बरकरार और कानूनी परिणाम भुगतने का आदेश। |

