Sunday, July 5, 2026
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PIL Case: अखबारों व यूट्यूब लिंक की गठरी जनहित याचिका संग रख दी…डिजिटल गॉसिप व असत्यापित मीडिया रिपोर्ट पर सुनवाई कैसे हो, पढ़ें मामला

PIL Case: मद्रास हाईकोर्ट ने जनहित याचिकाओं के बढ़ते दुरुपयोग और घटते स्तर पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कड़ा और मार्गदर्शक फैसला सुनाया है।

अदालतें किसी चल रही कानूनी प्रक्रिया या जांच को सनसनीखेज बनाने का जरिया नहीं बन सकतीं

हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एस.ए. धर्माधिकारी और जस्टिस अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने 30 जून 2026 को दिए अपने आदेश में ‘श्री वेंकटेश्वर कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी’ के खिलाफ दायर एक पीआईएल को पूरी तरह खारिज कर दिया। कहा, जनहित याचिकाएं (PIL) सोशल मीडिया की अफवाहों, ‘डिजिटल गॉसिप’, यूट्यूब (YouTube) के वीडियो, अखबारों की कतरनों और असत्यापित आरोपों के सहारे नहीं खड़ी की जा सकतीं। जब कोई जनहित याचिका बिना किसी स्वतंत्र शोध (Independent Research) या जमीनी पड़ताल के दाखिल की जाती है, तो उसे शुरुआती स्तर पर ही बेरहमी से खारिज (Throttled at the Threshold) कर दिया जाना चाहिए। अदालतें किसी चल रही कानूनी प्रक्रिया या जांच को सनसनीखेज बनाने का जरिया नहीं बन सकतीं।

मामला क्या है?: कॉलेज की मान्यता के खिलाफ ‘यूट्यूब’ और ‘FIR’ के सहारे याचिका

यह कानूनी विवाद तमिलनाडु के तिरुवल्लूर में स्थित एक तकनीकी शिक्षण संस्थान की प्रशासनिक और शैक्षणिक साख को चुनौती देने से जुड़ा था।

याचिकाकर्ता की मांग: डी. राधाकृष्णन नामक याचिकाकर्ता ने मद्रास हाई कोर्ट में एक रिट याचिका (PIL) दायर की थी। इसमें उन्होंने केंद्र सरकार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (NAAC), अन्ना यूनिवर्सिटी और तमिलनाडु तकनीकी शिक्षा निदेशालय को निर्देश देने की मांग की थी कि वे ‘श्री वेंकटेश्वर कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी’ (प्रतिवादी संख्या 7) के खिलाफ एक स्वतंत्र जांच समिति का गठन करें।

आरोप और आधार: याचिकाकर्ता का आरोप था कि कॉलेज ने अपनी स्वायत्तता (Autonomous Status), मान्यता (Accreditation) और संबद्धता (Affiliation) हासिल करने और उसे बनाए रखने के लिए फर्जी या हेरफेर किए गए दस्तावेज जमा किए थे। अपने इन आरोपों को साबित करने के लिए याचिकाकर्ता ने कोर्ट के सामने अखबारों की कुछ कतरनें, यूट्यूब वीडियो के हवाले और सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक निदेशालय (DVAC) द्वारा दर्ज एक प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) पेश की थी।

हाई कोर्ट का रुख: ” bundling (गठरी बांधना) शोध का विकल्प नहीं है”

मुख्य न्यायाधीश एस.ए. धर्माधिकारी की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने याचिकाकर्ता के तौर-तरीकों पर सख्त ऐतराज जताया और जनहित याचिकाओं के लिए ‘सख्त विधिक लक्ष्मण रेखा’ तय की। कोर्ट के मुख्य विधिक निष्कर्ष इस प्रकार हैं।

डिजिटल गॉसिप ‘पुख्ता शोध’ का विकल्प नहीं

अदालत ने साफ किया कि केवल विजिलेंस (DVAC) की जांच या सोशल मीडिया पर चल रही बहसों के आधार पर कोई भी नागरिक कोर्ट में पीआईएल लेकर नहीं दौड़ सकता। खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा, केवल भ्रष्टाचार निरोधक निदेशालय (DVAC) की जांच या ‘डिजिटल गॉसिप’ पर भरोसा करना, जनहित याचिका दायर करने के लिए अनिवार्य ‘पर्याप्त शोध’ (Sufficient Research) के कड़े मापदंडों को पूरा नहीं करता है। जब कोई जनहित याचिका बिना किसी स्वतंत्र शोध के दाखिल की जाती है, तो उसे चौखट पर ही खत्म कर देना चाहिए।

याचिका के कानूनी प्रारूप में बुनियादी खामी (Writ of Mandamus)

हाई कोर्ट ने याचिका की विधिक कमियों को उजागर करते हुए नोट किया कि कोर्ट आने से पहले याचिकाकर्ता ने 29 अप्रैल को संबंधित अधिकारियों को जो प्रतिवेदन (Representation) दिया था, उसमें उन्होंने कॉलेज की स्वायत्तता और मान्यता को ‘तुरंत रद्द’ करने की मांग की थी। लेकिन जब वे हाई कोर्ट आए, तो उन्होंने ‘स्वतंत्र जांच समिति’ बनाने की मांग की। कोर्ट ने कहा कि आप प्रशासनिक अधिकारियों के सामने एक चरम दंडात्मक उपाय (Punitive Remedy) की मांग करते हैं और फिर अदालत में आकर पूरी तरह से एक नया मुखौटा ओढ़कर जांच तंत्र की मांग करने लगते हैं। कोर्ट ने याद दिलाया कि ‘रिट ऑफ मैंडमस’ (Writ of Mandamus – परमादेश याचिका) का स्थापित नियम है कि अदालत आने से पहले संबंधित अधिकारियों के समक्ष न्याय की मांग (Prior Demand for Justice) की गई हो और अधिकारियों ने उसे देने से इनकार (Refusal) कर दिया हो। यहाँ दोनों मांगें अलग-अलग थीं।

मामला विचाराधीन (Sub Judice) होने के कारण सनसनी फैलाने का प्रयास

अदालत ने कहा कि चूंकि इस मामले में पहले से ही एक आपराधिक जांच (Criminal Investigation) चल रही है, इसलिए यह मामला ‘सब-जुडिस’ (न्यायालय के विचाराधीन) है। बुनियादी तथ्यों की पुष्टि किए बिना पीआईएल दाखिल करना और कुछ नहीं बल्कि एक लंबित कानूनी प्रक्रिया को सनसनीखेज (Sensationalise) बनाने का प्रयास मात्र है।

अदालत का अंतिम आदेश

मद्रास उच्च न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता ने अदालत का रुख करने से पहले कोई भी स्वतंत्र सत्यापन (Independent Verification) या जमीनी शोध नहीं किया था, बल्कि केवल अखबारों और यूट्यूब के लिंक की एक ‘गठरी’ (Bundle) बनाकर अदालत के सामने रख दी थी। इन आधारों पर खंडपीठ ने जनहित याचिका को पूरी तरह से खारिज (Dismiss) कर दिया।

केस मैट्रिक्स: मद्रास हाई कोर्ट का आदेश (जून 2026)

विधिक और प्रशासनिक श्रेणियांमद्रास उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति
संबंधित अदालतमद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court), चेन्नई
माननीय न्यायाधीशमुख्य न्यायाधीश एस.ए. धर्माधिकारी और जस्टिस अरुल मुरुगन (खंडपीठ)
केस का नामराधा कृष्णन बनाम भारत संघ और अन्य
याचिका का आधारयूट्यूब वीडियो, अखबार की कतरनें और डीवीएसी (DVAC) की एफआईआर
मुख्य कानूनी सिद्धांतपीआईएल के लिए स्वतंत्र शोध अनिवार्य है; मीडिया रिपोर्ट या डिजिटल गॉसिप सीधे विधिक आधार नहीं बन सकते।
अदालत का अंतिम निर्णययाचिका खारिज; इसे अदालती प्रक्रिया को सनसनीखेज बनाने का प्रयास माना गया।
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