Thursday, August 20, 2026
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Labor Laws: कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत तीसरे पक्ष को भुगतान का आदेश नहीं दिया जा सकता…सरकारी कर्मी का यह केस पढ़ें

Labor Laws: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने औद्योगिक और श्रम कानून (Labor Laws) के एक महत्वपूर्ण वित्तीय और कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए मार्गदर्शक व्यवस्था दी है।

कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 की व्याख्या की गई

हाईकोर्ट के जस्तित रवींद्र मैठानी की एकल पीठ ने उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPCL) द्वारा दायर एक अपील को स्वीकार करते हुए कर्मचारी मुआवजा आयुक्त (Commissioner) के उस आदेश को बदल दिया, जिसमें बिजली विभाग को मुआवजे का भुगतान करने के लिए कहा गया था। कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 (Employees’ Compensation Act, 1923) का एकमात्र उद्देश्य किसी दुर्घटना की स्थिति में नियोक्ता (Employer) द्वारा अपने कर्मचारी को मुआवजा दिलाना है। इसका अपकृत्य कानून (Law of Torts) या किसी अन्य तीसरे पक्ष की कथित लापरवाही (Negligence) से कोई लेना-देना नहीं है। भले ही दुर्घटना किसी अन्य विभाग या व्यक्ति की गलती से हुई हो, लेकिन इस अधिनियम के तहत मुआवजे की देनदारी केवल और केवल मृतक के वास्तविक नियोक्ता पर ही तय की जा सकती है।”

मामला क्या है?: वन विभाग के चौकीदार की करंट लगने से मौत और बिजली विभाग पर जुर्माना

यह विधिक विवाद साल 2012 में हुई एक दुखद घटना और उसके बाद ट्रिब्यूनल द्वारा क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर दिए गए फैसले से उपजा है।

हादसा (अक्टूबर 2012): दिनेश प्रसाद डिमरी नाम के एक व्यक्ति रुद्रप्रयाग के अगस्तमुनि स्थित ‘फॉरेस्ट गेस्ट हाउस’ (वन विश्राम गृह) में चौकीदार (Watchman) के रूप में कार्यरत थे। 21 अक्टूबर 2012 को जब गेस्ट हाउस के नलों में पानी आना बंद हो गया, तो वह जांच करने गए। इसी दौरान बिजली के करंट (Electrocution) की चपेट में आने से उनकी मौत हो गई।

आयुक्त का फैसला: मृतक की पत्नी ने कर्मचारी मुआवजा आयुक्त (रुद्रप्रयाग) के समक्ष दावा दायर किया। आयुक्त ने मामले की सुनवाई करते हुए माना कि मौत करंट लगने से हुई है, इसलिए इसके लिए बिजली विभाग (उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड) की लापरवाही जिम्मेदार है। आयुक्त ने ₹4,15,480 का मुआवजा तय किया और इसे चुकाने की जिम्मेदारी बिजली विभाग पर डाल दी।

हाई कोर्ट में अपील: इस फैसले से असंतुष्ट होकर उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPCL) ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका मुख्य तर्क यह था कि मृतक कर्मचारी उनका कर्मचारी नहीं था, बल्कि वह वन विभाग (Forest Department) के तहत काम कर रहा था। इसलिए, इस विशिष्ट अधिनियम के तहत उन पर कोई देनदारी नहीं बनती।

हाई कोर्ट का रुख: यह एक्ट लापरवाही तय करने का माध्यम नहीं है

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने इस मामले में ‘कानून के सारभूत प्रश्न’ (Substantial Question of Law) पर विचार करते हुए आयुक्त के फैसले को कानूनी रूप से गलत माना। कोर्ट के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं।

अधिनियम का दायरा केवल ‘नियोक्ता-कर्मचारी’ तक सीमित

अदालत ने स्पष्ट किया कि कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 को विशेष रूप से नियोक्ताओं द्वारा अपने कर्मचारियों को काम के दौरान होने वाली चोट या दुर्घटना के लिए वित्तीय सुरक्षा देने के उद्देश्य से बनाया गया है। कोर्ट ने कहा, …मृतक दिनेश प्रसाद डिमरी वन विभाग (संबंधित प्रभागीय वनाधिकारी/DFO) के अधीन कार्यरत थे। उनकी मृत्यु उनके रोजगार के दौरान (In the course of employment) हुई थी। इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत मुआवजे की देनदारी नियोक्ता के अलावा किसी अन्य व्यक्ति या तीसरे पक्ष पर नहीं लादी जा सकती।

‘टॉर्ट’ (Tortious Liability) और ‘वर्कर क्लेम’ दो अलग बातें हैं

जस्टिस रवींद्र मैठानी ने रेखांकित किया कि यदि करंट लगने के पीछे बिजली विभाग की लापरवाही थी, तो उसके लिए हर्जाना मांगने का कानूनी रास्ता अलग होता है (जैसे सिविल कोर्ट में टॉर्ट के तहत मुकदमा)। लेकिन जब दावा विशेष रूप से कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत किया गया है, तो कोर्ट केवल यह देखेगा कि ‘मालिक कौन था’। सिर्फ इसलिए कि मौत करंट लगने से हुई, एक ऐसे विभाग को भुगतान करने का आदेश नहीं दिया जा सकता जो उसका नियोक्ता नहीं था।

अदालत का अंतिम आदेश

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने बिजली विभाग (UPCL) की अपील को मंजूर (Allowed) कर लिया और निचले ट्रिब्यूनल के आदेश में महत्वपूर्ण संशोधन किया।
कोर्ट ने यूपीसीएल को मुआवजे की देनदारी से पूरी तरह मुक्त कर दिया। कोर्ट ने आदेश दिया कि तय की गई मुआवजे की राशि (4,15,480 रुपए) ब्याज सहित, मृतक के वास्तविक नियोक्ता यानी प्रभागीय वनाधिकारी (Divisional Forest Officer – DFO) द्वारा पीड़ित परिवार को दी जाएगी।

केस मैट्रिक्स: उत्तराखंड हाई कोर्ट का आदेश

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउत्तराखंड उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति
संबंधित अदालतउत्तराखंड उच्च न्यायालय (Uttarakhand High Court), नैनीताल
माननीय न्यायाधीशजस्टिस रवींद्र मैठानी (एकल पीठ)
अपीलकर्ताउत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPCL)
मृतक का नियोक्ताप्रभागीय वनाधिकारी (DFO) / वन विभाग
मुआवजे की राशि₹4,15,480 (ब्याज सहित)
न्यायालय का मुख्य सिद्धांतकर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत केवल ‘नियोक्ता’ उत्तरदायी है, लापरवाही के आधार पर ‘तीसरा पक्ष’ नहीं।
अदालत का अंतिम निर्णयअपील स्वीकार; मुआवजा देने की जिम्मेदारी वन विभाग (DFO) पर स्थानांतरित।
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