Friday, July 10, 2026
HomeHigh CourtOld Age Parents: बुजुर्ग माता-पिता की सेवा करना भारतीय संस्कृति है…पत्नी से...

Old Age Parents: बुजुर्ग माता-पिता की सेवा करना भारतीय संस्कृति है…पत्नी से क्यों कहा पति को छोड़कर गुजारा भत्ता नहीं मांग सकती, केस जान लें

Old Age Parents: वैवाहिक विवादों, पारिवारिक दायित्वों और गुजारा भत्ता के नियमों की व्याख्या करते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

पत्नी के लिए ससुराल छोड़ने और फिर भरण-पोषण का दावा वैध नहीं

हाईकोर्ट के जस्टिस जय कुमार पिल्लई की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि कोई पत्नी बिना किसी ठोस या वैध कारण के केवल इस बात से नाराज होकर ससुराल छोड़ देती है कि उसका पति अपने माता-पिता की सेवा करता है, तो वह कानूनी तौर पर अपने पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं है। अदालत ने कहा, भारतीय संस्कृति, लोकाचार और पारिवारिक मूल्यों में एक बेटे द्वारा अपने वृद्ध माता-पिता की देखभाल और सेवा करना पूरी तरह से स्वाभाविक और सामान्य बात है। किसी पत्नी की यह इच्छा या अपेक्षा कि उसका पति अपने माता-पिता से सारे संबंध तोड़ ले या उनसे ध्यान हटाकर केवल उसे खुश करने में लगा रहे, कानूनी रूप से पूरी तरह अनुचित है। सास-ससुर के साथ अनबन होना या पति का अपने परिवार को समय देना, पत्नी के लिए ससुराल छोड़ने और फिर भरण-पोषण (Maintenance) का दावा करने का वैध आधार नहीं हो सकता।

मामला क्या है?: फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ पति की अपील

यह पूरा कानूनी विवाद एक पति द्वारा फैमिली कोर्ट (पारिवारिक न्यायालय) के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा था, जिसमें उसे अपनी अलग रह रही पत्नी और दो बच्चों को हर महीने 20,000 रुपये गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था।

फैमिली कोर्ट का तर्क: निचली अदालत ने यह नोट करते हुए पत्नी के पक्ष में फैसला सुनाया था कि महिला की उसके ससुराल वालों के साथ अनबन थी और उसका पति अपनी पत्नी से ज्यादा अपने परिवार के अन्य सदस्यों और माता-पिता पर ध्यान देता था। पत्नी ने अलग रहने का यही एकमात्र कारण बताया था।

पति की दलील (CrPC की धारा 125(4)): पति ने अपने वकील नीलेश दवे के माध्यम से हाई कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि उनकी पत्नी बिना किसी पर्याप्त कारण (Sufficient Cause) के अपनी मर्जी से घर छोड़कर गई है। उन्होंने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125(4) का हवाला दिया, जो कहती है कि यदि पत्नी बिना किसी ठोस कारण के पति से अलग रहती है, तो वह भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती।

हाई कोर्ट की टिप्पणियां: ‘पति के चरित्र हनन’ पर कोर्ट सख्त

हाई कोर्ट ने मामले के तथ्यों और दोनों पक्षों की दलीलों को गहराई से परखने के बाद पाया कि पत्नी द्वारा लगाए गए आरोप न सिर्फ बेबुनियाद थे, बल्कि वे मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आते थे।

माता-पिता की सेवा करना अपराध या क्रूरता नहीं

जस्टिस जय कुमार पिल्लई ने अपने 8 जुलाई, 2026 के आदेश में भारतीय पारिवारिक ताने-बाने को रेखांकित करते हुए कहा, वैवाहिक कानून के दायरे में, सास-ससुर के साथ तालमेल की कमी या पति का अपने माता-पिता और परिवार के सदस्यों के प्रति समर्पित होना और उनकी देखभाल करना, किसी भी परिस्थिति में पत्नी के लिए वैवाहिक घर छोड़ने और बाद में भरण-पोषण का दावा करने का न्यायसंगत या पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।

झूठे मुकदमों और आरोपों की खुली पोल

अदालत ने पाया कि पत्नी ने पहले पति और उसके परिवार के खिलाफ IPC की धारा 498-A (दहेज उत्पीड़न) के तहत आपराधिक मुकदमा दर्ज कराया था, जिसमें पति और उसका परिवार अदालत से पूरी तरह बरी (Acquit) हो चुका था। कोर्ट ने कहा कि इस बरी होने के फैसले ने पत्नी के उस तर्क को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया कि उसके साथ ससुराल में क्रूरता होती थी। इसके अलावा, पत्नी ने दीवानी मुकदमों के दौरान पति पर उसकी भाभी के साथ अवैध संबंध होने के भी बेबुनियाद आरोप लगाए थे। इस पर अदालत ने तल्ख टिप्पणी की, इस तरह का निराधार चरित्र हनन (Character Assassination) कानूनन किसी भी व्यक्ति के प्रति की गई सबसे गंभीर मानसिक क्रूरता (Severe form of mental cruelty) माना जाता है।

अदालत का अंतिम फैसला

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि पत्नी यह साबित करने में पूरी तरह विफल रही है कि वह किस वैध वजह से अपने पति से अलग रह रही थी। इसलिए, अदालत ने फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को गुजारा भत्ता दिए जाने के आदेश को कानूनी रूप से अस्थिर (Legally Unsustainable) पाते हुए पूरी तरह से रद्द कर दिया। हालांकि, अदालत ने बच्चों के हितों को सर्वोपरि रखा: हाई कोर्ट ने साफ किया कि पति-पत्नी के विवाद का असर बच्चों पर नहीं पड़ना चाहिए। इसलिए, कोर्ट ने दोनों नाबालिग बच्चों के कल्याण के लिए तय किए गए गुजारे भत्ते के हिस्से में कोई बदलाव नहीं किया और उसे बरकरार रखा। इस मामले में याचिकाकर्ता पति की ओर से अधिवक्ता नीलेश दवे और प्रतिवादी पत्नी की ओर से अधिवक्ता नीलेश अग्रवाल पेश हुए।

केस शीट: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय निर्णय (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय
संबंधित अदालतमध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (जबलपुर)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस जय कुमार पिल्लई (एकल पीठ)
मूल वैधानिक प्रावधानCrPC की धारा 125(4) (बिना कारण अलग रहने पर भरण-पोषण पर रोक)
विवाद का मुख्य बिंदुक्या पति का माता-पिता की देखभाल करना पत्नी के अलग रहने का वैध कारण है?
अदालत का अंतिम आदेशपत्नी का गुजारा भत्ता रद्द; बच्चों का भरण-पोषण जारी रहेगा। कोर्ट ने माता-पिता की सेवा को भारतीय संस्कृति का मूल हिस्सा बताया।
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
overcast clouds
34.4 ° C
34.4 °
34.4 °
53 %
1.7kmh
100 %
Fri
37 °
Sat
32 °
Sun
32 °
Mon
31 °
Tue
33 °

Recent Comments