Double Standards: जमानत याचिकाओं का आंख मूंदकर विरोध करने और जेलों में विचाराधीन कैदियों (Under-trials) को सालों-साल बंद रखने की पुलिसिया कार्यशैली पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद तल्ख रुख अपनाया है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस शील नागू की वेकेशन/आंशिक कार्य दिवस पीठ ने लगातार दो दिनों के भीतर पंजाब और महाराष्ट्र सरकारों को आड़े हाथों लिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि राज्य मुकदमों की रफ्तार तेज नहीं रख सकते, तो उन्हें नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) को इस तरह अनिश्चितकाल के लिए बंधक बनाने का कोई नैतिक या कानूनी अधिकार नहीं है।
राज्य सरकारें आरोपियों की जमानत (Bail) का कोर्ट में एड़ी-चोटी का जोर लगाकर विरोध करती हैं
अदालत ने कहा, “एक तरफ राज्य सरकारें आरोपियों की जमानत (Bail) का कोर्ट में एड़ी-चोटी का जोर लगाकर विरोध करती हैं, लेकिन जब समय पर मुकदमा (Speedy Trial) चलाने की अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने की बात आती है, तो वे पूरी तरह नाकाम साबित होती हैं। यह राज्य का सरासर ‘दोहरा मापदंड’ (Double Standards) है। कोई व्यक्ति 4-5 साल से जेल में बंद है और चार्जशीट के 45 गवाहों में से सिर्फ 2 गवाहों के बयान दर्ज हुए हैं। हम राज्य के इस ढुलमुल रवैये को जनता के सामने बेनकाब करेंगे।”
पहला मामला (पंजाब): एसएसपी पर ₹50,000 का व्यक्तिगत जुर्माना
अदालत ने अपनी नाराजगी की शुरुआत पंजाब राज्य से की। समय पर ट्रायल पूरा न करने और अदालती निर्देशों की अनदेखी पर सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के एक वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) पर ₹50,000 का व्यक्तिगत जुर्माना (Personal Cost) लगाने का आदेश पारित किया। हालांकि, राज्य सरकार के अनुरोध और उनके जवाब की प्रतीक्षा के मद्देनजर जुर्माने की इस राशि को फिलहाल आस्थगित (Abeyance – होल्ड पर) रखा गया है।
दूसरा मामला (महाराष्ट्र): 4 साल जेल में, 45 में से सिर्फ 2 गवाहों की गवाही
अगले ही दिन कोर्ट के सामने महाराष्ट्र पुलिस का एक ऐसा ही ढीला मामला आया। यह मामला विदेशी नागरिक केल्विन चिन्दोज़िए ओकोरो से जुड़ा है, जिसे महाराष्ट्र पुलिस ने साल 2022 के एक हत्या के मामले (IPC की धारा 302, 364, 201 के तहत) में गिरफ्तार किया था।
हकीकत: आरोपी 7 मई 2022 से (करीब 4 साल से) जेल में सड़ रहा है। चार्जशीट में कुल 45 गवाह दर्ज हैं, लेकिन पुलिस 4 सालों में केवल 2 गवाहों का ही परीक्षण करा पाई है।
अदालती बहस: जब महाराष्ट्र सरकार के वकील ने गवाहों की सुरक्षा या पुराने मामलों का हवाला देने की कोशिश की, तो जस्टिस अमानुल्लाह भड़क गए।
जस्टिस अमानुल्लाह की मौखिक टिप्पणी: “क्या आप गवाहों के बयान दर्ज कराकर कोई एहसान कर रहे हैं? नियमतः 90 दिनों में चार्जशीट दाखिल होनी चाहिए, नहीं तो उसे डिफॉल्ट जमानत मिल जाती। चार्जशीट के बाद के इन 4 सालों में आपने क्या किया? इसकी जिम्मेदारी किसकी है? हर दिन महाराष्ट्र के ऐसे मामले आ रहे हैं। आप बस जमानत का विरोध करते हैं, जमीन पर कुछ नहीं करते।”
राज्य के वकील ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए कहा कि “ये पुराने मामले हैं और अब अभियोजन (Prosecution) में सुधार हो रहा है तथा कोर्ट में आरोपियों की 100% उपस्थिति सुनिश्चित की जा रही है।”
भारत में ऐसा करने की हिम्मत कैसे हुई?: जमानत खारिज, नीति बनाने के निर्देश
हालांकि कोर्ट मुकदमों की सुस्त रफ्तार से बेहद नाराज था, लेकिन अपराध की गंभीरता और आरोपी के विदेशी नागरिक होने के कारण पीठ उसे राहत देने के मूड में नहीं थी। जस्टिस अमानुल्लाह ने सख्त लहजे में कहा, “आप एक विदेशी धरती से हमारे देश में आते हैं और यहां आकर ऐसा (हत्या जैसा संगीन अपराध) करते हैं? आपकी भारत में ऐसा करने की हिम्मत कैसे हुई? आप जमानत के हकदार नहीं हैं।”
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
याचिका खारिज: कोर्ट ने विदेशी आरोपी की जमानत याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया।
मामला पेंडिंग रखा: जमानत खारिज करने के बावजूद, कोर्ट ने मुकदमों में होने वाली देरी के व्यापक मुद्दे पर इस मामले को बंद नहीं किया। नीति (Policy) बनाने का आदेश: महाराष्ट्र सरकार को 24 जुलाई, 2026 तक एक विस्तृत जवाबी हलफनामा (Counter-Affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। राज्य को अदालत के सामने एक ठोस नीति (Specific Policy) पेश करनी होगी कि वह मुकदमों में होने वाली इस अंतहीन देरी से कैसे निपटेगी, ताकि अभियोजन (पुलिस) की लापरवाही के कारण किसी भी आरोपी की स्वतंत्रता का हनन न हो। अब इस मामले को पंजाब वाले मामले के साथ ही 24 जुलाई को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
केस शीट: उच्चतम न्यायालय समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्देश |
| संबंधित अदालत | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस शील नागू |
| मुख्य प्रभावित राज्य | पंजाब (एसएसपी पर ₹50k जुर्माना) और महाराष्ट्र |
| आरोपी/मामला | केल्विन चिन्दोज़िए ओकोरो (विदेशी नागरिक, 2022 का मर्डर केस) |
| अदालत का मुख्य विधिक प्रश्न | क्या राज्य त्वरित मुकदमा (Speedy Trial) चलाए बिना किसी की जमानत का कड़ा विरोध कर सकता है? |
| अंतिम आदेश | आरोपी की जमानत खारिज, लेकिन राज्यों को मुकदमों की देरी रोकने के लिए नीतिगत हलफनामा देने का आदेश। अगली सुनवाई 24 जुलाई। |

